Israel Palestine: जमीन नहीं मजहब की जंग भी है फिलिस्तीन इजरायल संघर्ष
Israel Palestine: इजरायल का गठन होने के सालभर के भीतर उनकी खुफिया एजेंसी मोसाद अस्तित्व में आ गयी थी। मोसाद के जिम्मे सिर्फ एक काम था 'To prevent another holocaust. यानी मोसाद को दुनियाभर के यहूदियों के लिए ऐसी नीति पर काम करना था कि भविष्य में कभी उनका कत्लेआम न हो। एक राष्ट्र के रूप में इजरायल के कंधे पर सिर्फ यहां रहनेवाले यहूदियों को नहीं बचाना था बल्कि पूरी दुनिया के यहूदियों को संभावित खतरे से बचाना था।
यह आसान काम नहीं था। वह भी तब एक इस्लाम नामक दीन ने उन्हें अपना घोषित दुश्मन बना रखा हो जिनकी जनसंख्या अब ईसाइयों के बाद दूसरे नंबर पर है। लेकिन मोसाद ने लगभग इस लक्ष्य को हासिल करने में सफलता ही पाई है सिवाय छुटपुट झडपों के अलावा। लेकिन 2008 के मुंबई में आतंकी हमले और अब 7 अक्टूबर को हमास के मुजाहिदों द्वारा इजरायल के 22 बस्तियों और रक्षा प्रतिष्ठानों पर हमला करके लगभग 1400 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।

हमास के मुजाहिदों ने जिन यहूदियों की हत्या की वो आम नागरिक थे। कोई अपने घर में था तो कोई उस रात यहूदी पर्व का जश्न मना रहा था। इन हत्याओं में उनकी युद्धनीति नहीं बल्कि यहूदियों से नफरत की आतंक नीति साफ साफ दिखाई देती है। हमास के मुजाहिद उन्हें सिर्फ इसलिए मार रहे थे क्योंकि वो यहूदी थे जिसके यहूदी होने भर से वो नफरत करते हैं और उन्हें पूरी दुनिया से खत्म कर देना चाहते थे। स्वाभाविक है यहां इजरायल के सुरक्षा प्रतिष्ठानों की असफलता के सिर्फ दो संभावित कारण हो सकते हैं। या तो उन्हें पहले कुछ पता नहीं चला या फिर वे अति आत्मविश्वास में आधुनिक तकनीकी पर निर्भर होकर निश्चिंत हो गए थे, और हमास जानबूझकर उन्हें गफलत में रखता गया।
कारण जो भी हो लेकिन 1967 के बाद पहली बार इतनी बड़ी संख्या में यहूदी नागरिक इजरायल की धरती पर आतंकी हमले में मारे गये जिसमें बच्चे, बूढे, महिलाएं और सुरक्षा बलों के लोग, सब शामिल हैं। इस हमले में न केवल इतनी बड़ी संख्या में यहूदी मारे गये बल्कि 200 से अधिक लोग बंधक बनाकर गाजा ले जाये गये जिसमें इजरायल के अलावा अन्य देशों के नागरिक भी शामिल थे। अब तक हमास द्वारा 2 अमेरिकी और 2 इजरायली नागरिकों को स्वास्थ्य कारणों या फिर उम्र को देखते हुए रिहा किया गया है। इसमें जिन दो इजरायली नागरिकों को बुजुर्ग होने के कारण हमास द्वारा रिहा किया गया है उनमें से एक 85 वर्षीय योश्चेव लिफशिट्ज का कहना है कि वो एक नारकीय यातना से बाहर आयी है।
स्वाभाविक है इजरायल पर हमले के दौरान हमास ने जिनको अगवा किया है उनको मानवीय सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है। फिलिस्तीन पर काम करनेवाले सुरक्षा विशेषज्ञ इसका एक और कारण गाजा में बनी सुरंगों को बताते हैं जहां वो युद्ध के दौरान खुद भी छिपते हैं और इन बंधकों को भी छिपा रखा है। इन सुरंगों के बारे में वहां के सुरक्षा जानकार बताते हैं कि मकड़ी के जाले की तरह बनी इन सुरंगों में कोई छिप तो सकता है और हवाई हमलों से भी बच सकता है लेकिन इन सुरंगों में जिन्दा रहना ही एक बड़ी चुनौती है।
इजरायल की रिचमैन यूनिवर्सिटी के असिटेन्ट प्रोफेसर रिचमंड बराक ने एक अमेरिकी मीडिया हाउस को बताया कि "मैं इन सुरंगों में जा चुका हूं। एक बार जब आप सुरंगों में प्रविष्ट हो जाते हैं तो आपकी इंद्रिय चेतना खत्म हो जाती है। आप कहां हैं, और दिन है या रात इसका कुछ आभास नहीं रह जाता।" इन सुरंगों के बारे में कहा जाता है कि गाजा और मिस्र के बीच भी इसी तरह की सुरंग बनायी गयी है जहां से आतंकी अपने लिए हथियारों और अन्य साजो सामान की स्मगलिंग करते हैं। ये सुरंगे इजरायली सुरक्षा बलों के लिए एक चुनौती हैं इसलिए अमेरिका भी इशारों में इजरायल को ग्राउण्ड अटैक करने से रोक रहा है।
इस बात की पूरी संभावना है कि इजरायल में जो बंधक बनाये गये हैं वो इन्हीं सुरंगों में रखे गये हों जिन तक पहुंचना इजरायली सुरक्षा बलों के लिए आसान काम नहीं होगा। हालांकि बमबारी करके और चेतावनी देकर इजरायल पहले ही गाजा सिटी के अधिकांश हिस्सों को खाली करा चुका है। फिर भी जमीनी हमला करके बंधकों को छुड़ाना नर्क से जिन्दा बचकर निकलने जैसा होगा। इस बात का इशारा खुद उस इजरायली बुजुर्ग ने कर दिया है जिसे हमास ने रिलीज किया है।
स्वाभाविक है हमास के मुजाहिद जिन तरीकों से इजरायल से लड़ रहे हैं और उसके नागरिकों के साथ व्यवहार कर रहे हैं वह सिर्फ जमीन का झगड़ा भर नहीं हो सकता। इसकी जड़ें उससे गहरी है जो मजहबी मान्यताओं में निहित हैं। येरुसलेम पर न केवल यहूदियों का दावा है बल्कि मुस्लिम भी लगभग 1400 साल से उस जगह पर दावा करके बैठे हुए हैं। लेकिन बात सिर्फ येरुसलेम पर दावे तक रहती तो इस तरह की दुश्मनी पैदा नहीं होती कि दोनों एक दूसरे के बच्चों तक की परवाह न करते।
बुनियादी फसाद इस्लामिक शिक्षाओं में है जो यहूदियों को अपना खुला दुश्मन बताती है। जब तक यासिर अराफात ने फिलिस्तीन का संघर्ष किया वह जमीन की जद्दोजहद थी इसलिए एक समय के बाद यासिर अराफात ने युद्ध की बजाय शांतिपूर्वक बातचीत का रास्ता चुन लिया। लेकिन अब जो हमास फिलिस्तीन के नाम पर इजरायल से लड़ रहा है उसकी जंग फिलिस्तीन की जमीन से अधिक यहूदियों से मजहबी दुश्मनी है। हमास जिस मुस्लिम ब्रदरहुड नामक संगठन से प्रेरित है उसके मूल में इस्लामिक जिहाद है। हसन अल बन्ना ने इस इस्लामिक ब्रदरहुड की शुरुआत ही गैर मुस्लिमों से जिहाद के लिए की थी जिसमें सबसे ऊपर यहूदी थे।
यहूदी इस बात को जानते भी हैं और समझते हैं कि वह जिस युद्ध में धकेले गये हैं वह सिर्फ जमीन पर दावे का झगड़ा भर नहीं है। यह उनके धरती से समूल सफाये का झगड़ा है। अगर उन्हें बचे रहना है तो उन्हें न केवल लड़ना पड़ेगा बल्कि आक्रामक होकर निपटना पड़ेगा। सिर्फ इजरायल की धरती पर ही नहीं बल्कि इजरायल के बाहर भी उन्हें यह जंग लड़नी होगी तभी वो बचे रह पायेंगे। इसीलिए मोसाद का गठन करते समय लक्ष्य एकदम स्पष्ट रखा गया कि अब भविष्य में हमें होलौकॉस्ट (विध्वंस) से बचना है। इसका सबसे बड़ा खतरा अब उनके सामने किसी ईसाई देश से नहीं आनेवाला। इसका सबसे बड़ा खतरा जिस विचारधारा से आनेवाला है, वो उससे रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक तरीके से लड़ रहे हैं। यही इजरायल फिलिस्तीन संघर्ष का मूल है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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