आईएनएस विक्रांत: भारतीय नौसेना का नया गौरव
अगर हम कहें कि कारगिल युद्ध ने भारत की सैन्य व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया तो गलत नहीं होगा। कारगिल युद्ध के बाद भारतीय सैन्य आधुनिकीकरण की एक दीर्घकालीन योजना शुरु हुई जो आज तक जारी है। हालांकि यूपीए सरकार में रक्षा मंत्री रहे ए के एंटोनी की अनिर्णयता के परिणामस्वरूप दस वर्षों तक भारत की रक्षा तैयारियों पर बुरा असर पड़ा लेकिन फिर भी थल सेना, वायु सेना और जल सेना तीनों ही क्षेत्रों में भारत ने अभूतपूर्व परिवर्तन किये हैं। इस बदलाव की बदौलत आज भारतीय सेना दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति बन गया है।

कारगिल युद्ध के बाद भारत ने न केवल अपनी सेनाओं का आधुनिकीकरण प्रारम्भ किया बल्कि स्थानीय स्तर पर सैन्य क्षमताओं का विकास, शोध और निर्माण को महत्व दिया। इसमें सबसे बड़ा लाभ मिला उस तेजस फाइटर को जो तीन दशक से अटक अटक कर आगे बढ रहा था। कारगिल युद्ध के बाद ही युद्ध स्तर पर इसे पूरा किया गया। तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज की मौजूदगी में 4 जनवरी 2001 को तेजस ने पहली परीक्षण उड़ान भरी थी।
आज 21 साल बाद तेजस मार्क-1 के 40 फाइटर जेट भारतीय वायु सेना में शामिल हो चुके हैं और तेजस मार्क-2 का विकास हो रहा है। छोटे फाइटर जेट में भारत के तेजस ने कुछ ऐसा नाम किया है कि आज इसे खरीदने के लिए दुनिया के दूसरे देशों से भी पूछताछ हो रही है।
लेकिन उसी समय एक और महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। भारत ने तय किया कि वह अपना एयरक्राफ्ट कैरियर बनायेगा। किसी भी देश के लिए फाइटर जेट बनाना और एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण उसकी सर्वोच्च तकनीकी क्षमताओं के विकास के बाद ही संभव हो पाता है। 1999 में भारत सरकार ने पहली बार जब इस परियोजना पर आगे बढने की हरी झंडी दी तो दुनिया के उन देशों के लिए चौंकाने वाली बात थी जो सैन्य क्षमताओं के विकास के शीर्ष पर हैं। यह स्वाभाविक भी था। किसी ऐसे देश के लिए एयरक्राफ्ट कैरियर बनाने का दावा आसान नहीं था जिसके पास न तो ऐसी तकनीकी क्षमता थी और न ही कोई अनुभव।
लेकिन दस साल डिजाइन पर काम करने के बाद 2009 में भारत ने कोच्चि शिपयार्ड में आईएएनएस विक्रांत की कील गाड़ दी। इसके लिए भारत की सरकारी और 510 निजी कंपनियों ने मिलकर काम करना शुरु कर किया। एयरक्राफ्ट कैरियर में हर चीज स्पेशल होती है। इसके स्टील से लेकर इसके लैंडिग डेक तक। इसके इंजन से लेकर इसके अन्य इंजीनियरिंग साजो सामान तक। इसे तैयार करने के लिए निहायत जटिल और उच्च स्तर की तकनीकी की जरूरत पड़ती है।
लेकिन कोच्ची शिपयार्ड ने सभी जरूरतों को पूरा करते हुए कील गाड़ने के दो साल के भीतर दिसंबर 2011 में ड्राई डॉक परीक्षण शुरु कर किया। अगस्त 2013 में आईएनएस विक्रांत (कोडनेम आर-11) को आधिकारिक तौर पर लांच कर दिया गया। इसके बाद करीब सात साल इस एयरक्राफ्ट कैरियर पर तमाम तरह के काम चलते रहे और 4 अगस्त 2021 को इसका समुद्री परीक्षण शुरु हो गया। 28 जुलाई 2022 को कोच्चि शिपयार्ड ने अपने परीक्षण पूरे करके आईएनएस विक्रांत को भारतीय नौसेना को सौंप दिया। अब 2 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे राष्ट्र को समर्पित कर दिया है।
क्या है आईएनएस विक्रांत?
आईएनएस विक्रांत 45000 टन क्षमता वाला एक मिक्स विंग एयरक्राफ्ट कैरियर है जिस पर कुल 30 हवाई जहाज और हेलिकॉप्टर तैनात किये जा सकते हैं। भारतीय नौसेना की योजना है कि वो आईएनएस विक्रांत पर रूस निर्मित 26 मिग-29 को तैनात करेगा। इसके साथ ही इस एयरक्राफ्ट कैरियर पर 2 ध्रुव हेलिकॉप्टर, 4 एमएच-60 रोमियो हेलिकॉप्टर तथा 4 कमोव-31 हेलिकॉप्टर तैनात होंगे। 262 मीटर लंबा, 62 मीटर चौड़ा और 59 मीटर ऊंचा यह एयरक्राफ्ट कैरियर समुद्र में 56 किलोमिटर (30 नॉट) प्रति घंटे की रफ्तार से एक बार में 15,000 किलोमीटर (8,000 नॉटिकल मील) की यात्रा कर सकता है। इस पर एक समय में 196 अधिकारियों सहित 1700 नौसैनिक तैनात रहेंगे। विक्रांत पर 110,000 वर्गफीट का फ्लाइट डेक बनाया गया है जिस पर फाइटर जेट उड़ान भरेंगे और उतरेंगे। आईएनएस विक्रांत के निर्माण पर अब तक कुल 23,000 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं।
भारत में एयरक्राफ्ट कैरियर का इतिहास
भारत का पहला एयरक्राफ्ट कैरियर आईएएनएस व्रिक्रांत था जो 1957 में ब्रिटिश सरकार से खरीदा गया था। यह ब्रिटिश नेवी का 16000 टन क्षमता वाला एक छोटा एयरक्राफ्ट कैरियर था जिसका मूल नाम एचएमएस हरक्यूलिस था। यह एयरक्रॉफ्ट कैरियर दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बनाया गया था लेकिन ब्रिटिश सेना के लिहाज से इसकी सीमित क्षमताओं को देखते हुए इसे भारत को बेच दिया गया था। भारत ने सभी परीक्षणों और सुधार के बाद 1961 में इसे भारतीय नौसेना में शामिल कर लिया था। नौसेना को 36 साल अपनी सेवाएं देने के बाद 1997 में यह एयरक्रॉफ्ट कैरियर भारतीय नौसेना से रिटायर हो गया था।
भारत का दूसरा एयरक्रॉफ्ट कैरियरआईएएनएस विराट था जिसे 1987 में ब्रिटिश नेवी से खरीदा गया था। यह ब्रिटिश नेवी का एयरक्रॉफ्ट कैरियर था जिसे 1943 में बनाया गया था। इसका मूल नाम एचएमएस हर्मीज था। ब्रिटिश नेवी ने अपनी सेवाओं से इसे 1984 में रिटायर कर दिया था जिसके बाद भारत ने 1986 में इसे खरीदा था। यह पहले के आईएनएस विक्रांत से बड़ा एयरक्रॉफ्ट कैरियर था और इसकी वहन क्षमता 28000 टन थी। भारतीय नेवी से यह एयरक्रॉफ्ट कैरियर जुलाई 2013 में रिटायर कर दिया गया था।
भारत का तीसरा एयरक्रॉफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य है जो आज भी अपनी सेवा दे रहा है। आईएनएस विक्रमादित्य रूस में निर्मित एयरक्रॉफ्ट कैरियर है जिसकी वहन क्षमता 45,400 टन है। इसका मूल नाम एडमिरल गोर्शकोव है जिसका निर्माण सोवियत संघ ने 1982 में किया था। 1987 में इसे सोवियत नौसेना में शामिल किया गया और 9 साल की सेवाओं के बाद 1996 में इसे रिटायर कर दिया गया। इसके बाद भारत सरकार ने लंबे समय की बातचीत के बाद जनवरी 2004 में एडमिरल गोर्शकोव को खरीद लिया था। दस साल की मरम्मत और परीक्षण के बाद जून 2014 में इसे भारतीय नौसेना में आईएनएस विक्रमादित्य के नाम से शामिल कर लिया गया था। यह नौसेना को अपनी सेवाएं दे रहा है।
भारत का चौथा एयरक्रॉफ्ट कैरियर स्वदेश निर्मित आईएनएस विक्रांत है जिसे आज देश को समर्पित किया गया है। इसका नाम भारत के पहले एयरक्रॉफ्ट कैरियर के नाम पर ही रखा गया है। कागज से उतरकर भारतीय सीमाओं की सुरक्षा में तैनात होने में इसे 23 साल लगे हैं। हालांकि अभी कुछ महीनों तक इस पर नौसेना अपने परीक्षण करती रहेगी, फिर भी आज का दिन भारत के इतिहास में वैसा ही स्वर्णिम दिन है जब भारतीय वायु सेना को तेजस जेट सौंपा गया था।
भारत ने अपनी क्षमताओं से फाइटर जेट और एयरक्रॉफ्ट कैरियर बनाकर दुनिया के उन देशों को संकेत दे दिया है जो ऐसी जटिल तकनीकी के कारण दुनिया पर अपनी धाक जमाते थे। संसार में सिर्फ 9 देश हैं जिनके पास एयरक्रॉफ्ट कैरियर हैं। इसमें सर्वाधिक 11 एयरक्रॉफ्ट कैरियर अमेरिका के पास है। इसके बाद चीन, इटली और ब्रिटेन ही ऐसे देश हैं जिनके पास दो एयरक्रॉफ्ट कैरियर हैं। अब 23 साल की मेहनत के बाद अपनी क्षमताओं के बल पर भारत भी दो एयरक्रॉफ्ट कैरियर संचालित करने वाला देश बन गया है।
अटल जार्ज की जोड़ी को नमन
ऐसे गौरव पूर्ण समय में जब भारत अपनी क्षमताओं से एयरक्रॉफ्ट कैरियर का निर्माण करके उसे अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा में तैनात कर रहा है तब अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नांडीज को भी याद करना जरूरी है। बतौर प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री रहते 1999 में इन दोनों ने ही इस दिशा में पहल की थी। इन्हीं दोनों की दूरगामी सोच का परिणाम है कि आज भारत के पास अपना स्वयं द्वारा निर्मित एयरक्रॉफ्ट कैरियर संभव हो पाया है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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