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इंडिया गेट से: केजरीवाल और ममता विपक्षी एकता में बाधक

कायदे से लोकसभा चुनाव में सवा साल बचा है। क्योंकि सवा साल बाद चुनावी रैलियाँ शुरू हो जाएँगी। यह अच्छी बात है कि विपक्ष में हलचल शुरू हो गई है। लेकिन विपक्ष दिशाहीन भटक रहा है। एक तरफ कांग्रेस अस्तित्व की लड़ाई लड रही है। कांग्रेस की दुर्दशा का फायदा उठा कर ममता बनर्जी खुद को विपक्ष का नेता स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर अपनी डफली अलग बजा रहे हैं। वह अपने स्तर पर राष्ट्रीय नेता बनने की फिराक में हैं।

arvind Kejriwal and mamata banerjee block opposition unity

इस बीच नीतीश कुमार विपक्ष के आकर्षक चेहरे के रूप में उभरना शुरू कर चुके हैं। इससे पहले जब भी कभी तीसरा मोर्चा बनता था, कम्युनिस्ट पार्टियां केन्द्रीय भूमिका में होती थीं। इस बार वे पृष्ठभूमि में चली गई हैं। जो साफ़ तस्वीर समझ आ रही है, वह यह है कि तीसरे मोर्चे के प्रयास नहीं हो रहे।

ममता बनर्जी को छोड़ कर बाकी सभी भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दल ऐसा मोर्चा बनाना चाहते हैं, जिसमें कांग्रेस भी शामिल हो। इन्तजार इस बात का है कि कांग्रेस अपना नया अध्यक्ष चुन ले। हो सकता है कि कांग्रेस का गैर गांधी अध्यक्ष बनने पर ममता भी विपक्ष की एकता में शामिल हो जाए। नया राजनीतिक डेवलपमेंट यह है कि ममता बनर्जी को नेता मानने से इनकार करने वाले तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने नीतीश कुमार को नेता मान लिया है। कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी नीतीश को चेहरा मानने पर सहमति दे दी है।

शरद पवार, मुलायम सिंह और लालू यादव तीन ऐसे नेता हैं, जो कभी खुद को प्रधानमंत्री पद पर देखने का सपना देखते थे। ये तीनों अब नीतीश कुमार को मोदी के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। कभी शरद यादव और चन्द्र बाबू नायडू तीसरे मोर्चे की धुरी रहे हैं। लेकिन दोनों की राजनीतिक हैसियत अब ज्यादा नहीं है।

2015 में शरद यादव ने विपक्षी एकता की कोशिश की थी। तब नीतीश और शरद यादव साथ साथ थे। शरद यादव की कोशिश थी कि जनता दल परिवार एकजुट होकर बड़ी राजनीतिक ताकत बने। इसकी शुरुआत बिहार से और महागठबंधन के जरिए हो। इस पहल में शरद यादव ने जद(यू), राजद, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस समेत कई दलों को मंच पर ला दिया था। लेकिन 2017 में नीतीश कुमार पाला बदल कर एनडीए में चले गए थे।

अब जब पांच साल बाद नीतीश लौटे हैं, तो शरद यादव और लालू प्रसाद यादव वही दौर, वैसा ही अभियान और शुरुआत देखना चाहते हैं। अब हम याद करें 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले की स्थिति। दो तस्वीरें सामने आती हैं।
पहली तस्वीर 2018 की है जब कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने कुमार स्वामी को समर्थन देकर गैर भाजपा सरकार बनवाई थी। मंच पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ शरद पवार, ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, मायावती, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, सीताराम येचुरी मौजूद थे। शपथ ग्रहण में केजरीवाल भी गए थे, लेकिन वह मंच पर नहीं गए।

दूसरी तस्वीर जनवरी 2019 की है, जब लोकसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने विपक्षी एकता का प्रयास किया था। ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, एचडी देवेगौड़ा, चंद्रबाबू नायडू, एचडी कुमारस्वामी, फारूक अब्दुल्ला, अभिषेक मनु सिंघवी, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, शरद पवार, तेजस्वी यादव, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी समेत तेईस दलों के नेता महारैली के मंच पर दिखाई दिए थे। लेकिन विपक्षी एकता की बातें धरी रह गईं और भाजपा ने अपनी सीटें 2014 से बढा कर जीत हासिल की।

उसके बाद ममता बनर्जी और केजरीवाल विधानसभा चुनावों में अपनी राजनीतिक हैसियत दिखा चुके हैं। इन दोनों को ही इतना घमंड है कि दोनों खुद को ही मोदी का विकल्प मानते हैं, इसलिए ये दोनों ही विपक्षी एकता में बाधक हैं। राष्ट्रपति के चुनाव में विपक्षी एकता की कोशिश करने वाली ममता उपराष्ट्रपति के चुनाव में इसलिए विपक्ष से अलग हो गई, क्योंकि कांग्रेस ने अपनी उम्मीदवार मैदान में उतार दी थी।

अब पुराने नेता लालू, मुलायम, शरद यादव, शरद पवार, चंद्रबाबू नायडू तो चुप्पी साध कर बैठे हैं, ममता भी उप राष्ट्रपति के चुनाव के बाद पहले जैसी उछलकूद नहीं कर रही। लेकिन तीन मुख्यमंत्री बहुत उछलकूद कर रहे हैं। इनमें से केजरीवाल का 'अपनी डफली अपना राग' है, उन्होंने तो खुद को मोदी का विकल्प घोषित कर दिया है। जबकि केसीआर कांग्रेस को साथ ले कर विपक्षी एकता की कोशिश में जुटे हैं, 31 अगस्त को उन्होंने पटना पहुंच कर नीतीश कुमार से मुलाक़ात की।

जून 2020 में गलवान घाटी में शहीद हुए पांच सैनिकों के परिजनों को दस दस लाख रुपए और इस साल हैदराबाद में एक फेक्ट्री में आग लगने से मारे गए दस बिहारी श्रमिकों के परिजनों को पांच पांच लाख रूपए का अनुदान देने के लिए यह उन का सरकारी दौरा था। लेकिन यह तो एक बहाना था, असली मकसद विपक्षी एकता की संभावना तलाशना था। वह नीतीश कुमार के अलावा लालू यादव और तेजस्वी से भी मिले, जिसमें अपने अपने राजनीतिक हितों और साझा हितों पर लंबी बातचीत हुई।

इस बातचीत से यह निकल कर आया है कि लालू यादव भी नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करने पर सहमत हैं। लेकिन जब नीतीश कुमार और केसीआर की साझा प्रेस कांफ्रेंस हुई तो दोनों इस सवाल से कतराए, बल्कि यह सवाल पूछा गया तो नीतीश प्रेस कांफ्रेंस से उठ कर खड़े हो गए। केसीआर ने बड़ी मुश्किल से उन्हें बिठाया। नीतीश कुमार को लगता है कि मीडिया बनता काम बिगाड़ देगा। इसलिए उन्होंने केसीआर को समझाया कि इनके चक्कर में मत पड़ो।

क्षेत्रीय दलों के नेताओं से मिलने के लिए केसीआर का यह छठा दौरा था। उन्होंने इससे पहले झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन और उनके बेटे और झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन, शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे, तमिलनाडु के सीएम और डीएमके नेता एमके स्टालिन और पश्चिम बंगाल की सीएम और तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी से मुलाकात करने के लिए उनके राज्यों के दौरे किए थे। नई दिल्ली और पंजाब की अपनी यात्रा के दौरान, उन्होंने आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्रियों अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान से भी मुलाकात की थी। केसीआर दो बार समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव से भी मिल चुके हैं।

भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दलों में जोर इस बात पर दिया जा रहा है कि विपक्षी दलों की एकता में कांग्रेस एक घटक के तौर पर शामिल होने को तैयार हो जाए और हर राज्य में क्षेत्रीय दल को बड़ा भाई मान ले तो विपक्षी एकता में कोई रुकावट नहीं आएगी। केसीआर ने पटना में कहा है कि वह कांग्रेस रहित विपक्षी एकता या तीसरे मोर्चे की बात नहीं कर रहे। वह कांग्रेस को साथ रख कर विपक्षी एकता की बात कर रहे हैं। लेकिन चेहरा कांग्रेसी नहीं होगा।

कुछ विपक्षी नेताओं का यह भी मानना है कि नीतीश कुमार का चेहरा सामने रख कर एनडीए को 350 से 250 पर लाना बहुत मुश्किल काम नहीं और अगर ऐसा हो गया तो चुनाव के बाद बीजू जनता दल और वाईएसआर पार्टी भी साथ आ सकती है।

यहाँ मुझे नवजोत सिंह सिद्धू की ओर से बार बार दोहराई जाने वाली कहावत याद आ रही है कि "मेरी मौसी के अगर मूछें होती, तो मैं उसे मौसा कहता"। तो मैं यह नहीं कहता कि इस बार के प्रयासों से विपक्षी एकता हो जाएगी, या नहीं हो पायेगी। लेकिन अंगरेजी में एक कहावत है कि एवरी-डे इज नाट सन्डे, इसलिए नए प्रयास शुरू हुए हैं।

यह भी पढ़ेंः 'विकास का काम, मोदी का नाम और गुजरात में विपक्ष का काम तमाम'

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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