चार चरण की वोटिंग में मोदी की वापसी का संकेत
Voting Trend: 2019 के मुकाबले कम वोटिंग का ट्रेंड जारी है। चौथे चरण में 67.71 प्रतिशत वोटिंग हुई है, जबकि 2019 में चौथे चरण में 69.12 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। यानी 2019 के मुकाबले 1.41 प्रतिशत कम वोटिंग हुई है।
पहले तीनों चरणों की वोटिंग भी 2019 के मुकाबले कम हुई थी। लेकिन पहले चरण से लेकर तीसरे चरण तक 2019 के मुकाबले अंतर घटता चला गया था। पहले चरण में 2019 के मुकाबले 3.82 प्रतिशत, दूसरे चरण में 3.38, तीसरे चरण में 1.21 प्रतिशत वोटिंग कम हुई थी। ट्रेंड साफ़ संकेत दे रहा था कि अंतर घटता जा रहा था, लेकिन चौथे चरण में अंतर थोड़ा सा बढ़ गया है।

यही ट्रेंड बरकरार रहा तो 2019 की 67.40 प्रतिशत वोटिंग या फिर 2014 की 66.44 प्रतिशत वोटिंग तक पहुंचना असंभव होगा। वोटिंग का घटना और शेयर बाजार का गिरना मोदी के लिए शुभ संदेश नहीं है। 2004 में जब 1999 के मुकाबले 1.92 प्रतिशत वोटिंग घट गई थी तो भाजपा की सीटें भी 182 से घटकर 138 हो गई थीं, जबकि कांग्रेस की सीटें 1.77 वोटिंग घटने के बावजूद 114 से बढ़कर 145 हो गई थीं। इसलिए माना जाता है कि वोटिंग घटती है, तो सत्ताधारी पार्टी को नुकसान होता है, लेकिन यह कोई तय फार्मूला नहीं।

यह याद रखना चाहिए कि 2014 में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश से पहले 2009 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 58.21 प्रतिशत और 2004 के चुनाव में सिर्फ 58.07 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। इसलिए मोदी के आने के बाद कम से कम आठ प्रतिशत वोट बढ़ा है, जो उनका समर्थक हो सकता है। अब तक 379 सीटों पर चुनाव हो चुका है, 164 सीटों का चुनाव बाकी रह गया है।
जिन 379 सीटों पर चुनाव हुआ है, उनमें से 212 सीटें पिछली बार भारतीय जनता पार्टी जीती थी। यानी बाकी के तीन चरणों की 164 सीटों में से भाजपा की उन 91 सीटों पर भी चुनाव होना बाकी है, जो 2019 में उसने जीती थी। इसलिए बाकी के तीनों चरण भाजपा के लिए अपेक्षाकृत ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
भारतीय जनता पार्टी की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि वोटिंग कम होने का मतलब यह नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी का वोटर बाहर नहीं निकला है। भाजपा नेताओं का कहना है कि क्योंकि इंडी एलायंस ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय नहीं किया इसलिए भाजपा विरोधी वोटों में कोई उत्साह नहीं है। इंडी एलायंस की फूट ने भी भाजपा विरोधी वोटरों में उत्साह कम किया।
वोट प्रतिशत गिरने का किसे नुकसान और किसे फायदा होगा, यह अनुमान लगाना जल्दबाजी होगा, क्योंकि वोट प्रतिशत बढने से अक्सर सत्ता परिवर्तन होता है। एक आध उदाहरण को छोड़ दें, तो वोट घटने का मतलब यथास्थिति होता है। अब तक हुई चार चरण की वोटिंग यथास्थिति बने रहने का संकेत दे रही है।
कुछ चुनावी पंडित अरविन्द केजरीवाल के चुनाव प्रचार में कूदने को अगले तीन चरणों में मोदी विरोधी नई लहर पैदा होने की उम्मीद लगाए हैं। लेकिन उनका राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रभाव नही है, वह भाजपा की सिर्फ 11 सीटों को प्रभावित कर सकते हैं। जिनमें सात दिल्ली की, एक हरियाणा की, दो पंजाब की और एक चंडीगढ़ की सीट है, जहां वह कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं।
अरविन्द केजरीवाल के जेल से छूटने का नुकसान अपेक्षाकृत कांग्रेस को ही ज्यादा हो सकता है। पंजाब से कांग्रेस पिछली बार 13 में से आठ लोकसभा सीटें जीती थीं। केरल की 15 सीटों के बाद कांग्रेस ने किसी राज्य में अपने बूते पर अच्छी सीटें जीती थीं, तो वह पंजाब की आठ सीटें थीं। जबकि आम आदमी पार्टी सिर्फ एक सीट जीती थी।
पंजाब विधानसभा चुनाव जीतने और इंडी गठबंधन में शामिल होने के बावजूद अरविन्द केजरीवाल ने पंजाब में कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग नहीं की। उन्होंने सभी 13 सीटों पर कांग्रेस के सामने उम्मीदवार खड़े किए हैं। पंजाब की स्थिति केरल जैसी है, केरल में इंडी एलायंस के दोनों घटक (कांग्रेस और वामपंथी) आमने सामने थे, तो पंजाब में भी इंडी एलायंस के दोनों घटक (आम आदमी पार्टी और कांग्रेस) आमने सामने हैं।
इंडी एलायंस को सिर्फ दो राज्यों बिहार और महाराष्ट्र में मजबूत माना जा रहा है। इन्हीं दो राज्यों से इंडी एलायंस को ज्यादा उम्मीद है, लेकिन इन दोनों ही राज्यों में वोट प्रतिशत बाकी राज्यों के मुकाबले कम हुआ है। वैसे इन दो राज्यों में भाजपा और एनडीए की 15-16 सीटें घटती भी हैं, तो भाजपा को उतनी ही अतिरिक्त सीटें उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और बंगाल से मिलने की उम्मीद है।
इन चारों राज्यों में तेलंगाना को छोड़कर बाकी तीनों राज्यों में कांग्रेस अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। इन चारों राज्यों में कांग्रेस का किसी क्षेत्रीय दल के साथ सीट शेयरिंग भी नहीं हुआ। उड़ीसा में पिछले दो चुनावों से भारतीय जनता पार्टी की लोकसभा सीटें लगातार बढ़ रही हैं, जबकि कांग्रेस की सीटें घट रही हैं। पिछली बार कांग्रेस को 21 में से सिर्फ एक सीट मिली थी। जबकि भारतीय जनता पार्टी उड़ीसा में बीजू जनता दल के विकल्प के रूप में उभर रही है, पिछली बार भाजपा को उड़ीसा में 21 में से आठ सीटें मिलीं थीं, जो अब बढ़ कर 12 तक होने की भविष्यवाणी हो रही है।
आंध्र प्रदेश में पिछली बार भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी, तो कांग्रेस को भी कोई सीट नहीं मिली थी। 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एनडीए छोड़कर गई तेलुगु देशम पार्टी को सिर्फ 3 सीटें मिली थीं, बाकी सभी 22 सीटें वाईएसआर कांग्रेस को मिल गई थीं। इस बार टीडीपी वापस एनडीए में आ गई है और आंध्र की तस्वीर भी पूरी तरह बदलती हुई दिख रही है। एनडीए को 20-22 सीटें मिलने का चुनाव पूर्व का सर्वे है। इनमें से दो या तीन सीटें भाजपा की हो सकती हैं। बाकी 19 या 20 भी एनडीए की होंगी। इसमें कोई शक नहीं कि तेलंगाना में कांग्रेस की मौजूदा तीन सीटों में बढ़ोतरी होगी, लेकिन भाजपा की मौजूदा चार सीटों में भी बढ़ोतरी होगी। जो नुकसान होगा वह बीआरस का होगा, जो पिछली बार 17 में से 9 सीटें जीत गई थी।
जहां तक बंगाल का सवाल है, तो वहां मुकाबला भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच है, कांग्रेस या वामपंथी कहीं नहीं हैं। पूर्वानुमान यह है कि कांटे की टक्कर में भाजपा की सीटें कुछ बढ़ेगी और तृणमूल कांग्रेस की कुछ सीटें घटेंगी, वह कितनी होंगी यह तो नतीजों के वक्त ही पता चलेगा। कांग्रेस अपनी पिछली बार जीती दो सीटें बचा पाए, तो गनीमत है।
अब तक का अनुमान तो यही है कि अगर भाजपा की कुछ सीटें राजस्थान, बिहार और महाराष्ट्र में घटती हैं तो उसकी भरपाई इन चारों राज्यों से होगी। भाजपा महाराष्ट्र और बिहार में एनडीए की सीटें घटने की भरपाई भी आंध्र प्रदेश और यूपी से होने की उम्मीद लगाए हुए है। उत्तर प्रदेश में भी इस बार भाजपा के सहयोगी दो के बजाए पांच सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि बाकी 75 सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ रही है। बहुजन समाज पार्टी ने सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर के इंडी एलायंस का भाजपा के सामने एक उम्मीदवार खड़ा करने का मंसूबा फेल कर दिया है, जिसका फायदा अंतत: भाजपा को ही होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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