Indian Economy: मनमोहन के दस बनाम मोदी के नौ साल, कैसा रहा अर्थव्यवस्था का हाल?
मनमोहन सरकार के दस साल बनाम मोदी के नौ साल की तुलना शुरु हो गयी है। सवाल है कि आर्थिक गतिविधियों के लिहाज से किसका कार्यकाल बेहतर कहा जाएगा?

Indian Economy: आइये सबसे पहले हम चिंदबरम का 2004 का वह बजट भाषण देखते हैं जब भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए को हराकर कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सत्ता में आई थी और चिदबंरम ने यूपीए सरकार का पहला बजट पेश किया था। 8 जुलाई 2004 को बजट पेश करते हुए चिदंबरम ने कहा था - 'भारतीय अर्थव्यवस्था के आधार मजबूत दिखाई दे रहे हैं और भुगतान संतुलन काफी दुरूस्त है। भारत की विकास दर में स्थिरता बनी रहेगी। 'चिंदबरम का भाजपा के साथ कभी कोई प्रेम नहीं रहा, लेकिन वह आंकड़ों को झुठला नहीं सकते थे। क्योंकि जब वाजपेयी ने सत्ता छोड़ी तो विकास दर 8.5 प्रतिशत थी, जो कि 1975-76 के बाद सबसे अधिक थी।
कांग्रेस के 9 साल के शासन के बाद इन्हीं चिदंबरम ने 28 फरवरी 2013 को अपने बजट भाषण में कहा था 'मैं शुरूआत में ही संदर्भ स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि वैश्विक आर्थिक विकास दर 2011 में 3.9 प्रतिशत के बाद 2012 में 3.2 प्रतिशत पर आ चुकी है और भारत भी वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। हमारी अर्थव्यवस्था भी 2010-11 में सिकुड़ी है। सीएसओ ने 5 प्रतिशत और रिजर्व बैंक ने 5.5 प्रतिशत आर्थिक विकास दर का अनुमान लगाया है, अब अंतिम आकड़ा जो भी आए, निश्चित रूप से हमारी क्षमता से कम होगा।' यानी अपने 9 साल के शासन में कांग्रेस ने अतिविश्वास के साथ जिस पारी की शरूआत की, उसे 2013 आते आते पूरी तरह खो दिया और आर्थिक बदहाली के लिए बहाने बनाने लग गई।
नरेंद्र मोदी ने जब सरकार की कमान 2014 में संभाली तो देश का आर्थिक हिसाब बिगड़ा हुआ और तंत्र बिखरा हुआ था। पूरे विश्व में हमारी जीडीपी दसवें नंबर की थी। लगभग दो खरब डाॅलर की। हम ब्रिटेन, फ्रांस, ब्राजील, इटली और रूस से भी काफी पीछे थे। बिजनेस कांफिडेंस लेवल न्यूनतम था। 2013 के मार्च में उद्योग परिसंघ सीआईआई ने एक सर्वे कराया था। इसमें देश के 175 बिजनेस हाउस के प्रमुखों ने भाग लिया। भाग लेने वालों में से अधिकतर का कहना था कि सरकार में उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार और लगातार महंगाई से आर्थिक सुधार प्रक्रिया खतरे में है। उस पर से बढ़ते ब्याज दर और राजनीतिक अस्थिरता चिंता के विषय हैं और इनका अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से कोई लेना देना नहीं है। स्पष्ट था कि दस साल की नाकामियों को छुपाने के लिए कांग्रेस ने वैश्विक आर्थिक संकट को कालीन की तरह इस्तेमाल किया।
यह कह नहीं सकते कि कांग्रेस को सरकार चलाना नहीं आया। अनुभव के आधार पर यही पार्टी दावा करती है कि सरकार चलाना उन्हें ही आता है। तो क्या सारी नाकामियां मनमोहन सिंह के नाम मढ़ दी जानी चाहिए? नहीं, बतौर अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह इस देश के सबसे अनुभवी और प्रत्यक्ष रूप से सबसे लंबे समय तक सरकारी अर्थव्यवस्था के अंग रहे हैं। वित्त सचिव, भारत सरकार के प्रमुख वित्तीय सलाहकार, फिर वित्त मंत्री और दस साल तक प्रधानमंत्री। इतने लंबे समय तक अर्थव्यवस्था की कमान संभालने वाला दूसरा व्यक्ति अभी तक तो भारत में नहीं है। फिर भी उन्हें बेचारा होने की संज्ञा मिली। क्यों? क्योंकि उनको विफल करके भी कांग्रेस नेतृत्व ने सत्ता की बागडोर अपने हाथ में थामे रखी और व्यक्तिगत लाभ हानि के आधार पर निर्णय करता रहा।
2004 के आम चुनाव में जब कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तो उसका एक ही मकसद था कि किसी भी तरह से भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए को सत्ता के किसी भी गणित से बाहर रखा जाए। सोनिया गांधी ने यूपीए वन की सरकार बनाने के लिए उदारीकरण और निजीकरण के एकदम खिलाफ रहे वामपंथी दलों को साथ लिया। वापमंथी हरकिशन सिंह सुरजीत के सामने हथियार डालते हुए कांग्रेस ने यूपीए सरकार की नींव रखी। काॅमन मिनिमम प्रोग्राम जब बनाया गया तभी से ही आर्थिक नीतियों को समझौते के साथ जोड़कर चलाना शुरू कर दिया गया। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की आभा वहीं खत्म कर दी गई जब मनरेगा जैसी खर्च वाली योजना तो लागू कर दी गई लेकिन वामपंथियों ने विनिवेश और कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष निवेश को खोलने में अडंगा लगाना जारी रखा।
डॉ मनमोहन सिंह मूक दर्शक बन कर सब देखते रहे। हालांकि 2008 में अमेरिका के साथ न्यूक्लियर एनर्जी पर हुई डील का बहाना बनाकर वामपंथी अलग हो गए, लेकिन तब तक देश की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचा गए। इसे समझने के लिए यह एक ही आंकड़ा काफी है कि भारत का राजस्व घाटा जहां 2007-08 में जीडीपी का 2.6 प्रतिशत था वह 2008-09 में बढ़कर 5.9 प्रतिशत और 2009-10 में जीडीपी का 6.7 प्रतिशत हो गया था। जाहिर है सरकार बनाने और चलाये रखने की कांग्रेस की मजबूरी में अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह कहीं खो गए।
यूपीए 2 की कहानी देश को आर्थिक रूप से बर्बादी की ओर ले जाने, भ्रष्टाचार के अधिकतम अवसरों को भुनाने और कांग्रेस अध्यक्ष को प्रधानमंत्री से ऊपर दिखाने की पटकथा है। नवंबर 2010 में जब राडिया टेप कांड सामने आया तो यह उजागर हो गया कि बिना लक्ष्य और सिद्धांत के किसी सरकार में कोई दल या व्यक्ति शामिल होता है तो देश का किस तरह बंटाधार होता है। संसाधनों का गीदड़ों की तरह बंटवारा जिस तरह से यूपीए 2 के समय हुआ, उसका उदाहरण भारतीय राजनीति में कभी नहीं मिल सकता। सीबीआई ने राडिया और सत्ता के समीप रहे लोगों के बीच 5851 फोन काॅल्स रिकार्ड किए थे जिसमें अपनी पसंद के लोगों को मंत्री बनाने के लिए लॉबिंग से लेकर टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की पूरी गाथा है।
10 साल की यूपीए की सरकार दस बड़े घोटाले के साथ इतिहास में दर्ज है। कोयला घोटाला, टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला, चाॅपर घोटाला, ट्रक घोटाला, काॅमनवेल्थ गेम्स घोटाला, कैश फॉर वोट घोटाला, आदर्श घोटाला, सत्यम घोटाला, आईपीएल घोटाला और चीनी घोटाला।
खैर भूतकाल के आंकड़े पर भविष्य का भारत खड़ा नहीं हो सकता था। इसके लिए वर्तमान को सही रास्ते पर चलकर जाना होगा। 9 साल प्रधानमंत्री के रूप में मोदी को काम करते हो गए। आकलन के लिए बहुत नहीं तो कम समय भी नहीं है। हालांकि आंकड़े सब कुछ नहीं कहते लेकिन अगले साल चुनाव में जाने से पहले मोदी सरकार के आंकड़ों का ही परीक्षण होना है।
प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों की दिशा स्पष्ट है- पहले भारत को 5 खरब डाॅलर की अर्थव्यवस्था बनाना है और फिर देश को विकसित अर्थव्यवस्था की कैटेगरी में ला खड़ा करना है। मोदी ने जब 2914 में सत्ता संभाली तो भारत का जीडीपी दो खरब डाॅलर का था अब 2023 में पौने चार खरब डाॅलर का है। मोदी की जिद है कि 2025 तक इसे 5 खरब डाॅलर तक पहुंचाना ही है। इसके लिए विकास दर 6 प्रतिशत से ऊपर चाहिए, तो वह है।
ग्लोबल क्वालिटी इंफ्रास्ट्रक्चर रैंकिंग में 184 देशों में भारत का स्थान पांचवा है। रोड एंड ट्रांसपोर्ट मंत्री नितिन गडकरी का दावा है कि 2024 के अंत तक भारत का सड़क नेटवर्क अमेरिका के बरबार हो जाएगा और हमारी लॉजिस्टिक लागत 16 प्रतिशत से घटकर 9 प्रतिशत पर आ जाएगी। एनएसओ का आंकड़ा बताता है कि 9 साल में देश में प्रति व्यक्ति आय 2014 की 86 हजार 647 रुपये से बढ़कर 2023 में दुगनी यानी एक लाख 72 हजार रुपये हो गई है। अब यहां से आगे बढ़ना है तो देश की अर्थव्यस्था को भी दुगनी रफ्तार बढ़ानी होगी, जिसे लेकर कांग्रेस में विश्वास नहीं और मोदी आत्मविश्वास से भरपूर हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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