Jobless Growth: जीएसटी बढ़ा तो रोजगार क्यों घट रहा है?
एक तरफ जीएसटी कलेक्शन में उछाल अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर प्रस्तुत करता है, वहीं बेरोजगारी का आंकड़ा चिंता भी बढ़ा रहा है। आखिर सच क्या है?

Jobless Growth: वित्त विभाग के मुताबिक दिसंबर 2022 में वस्तु एवं सेवा कर संग्रह अर्थात जीएसटी 15% बढ़कर 1.49 लाख करोड़ से भी अधिक का हो गया है। इससे बेहतर कर अनुपालन के साथ-साथ निर्माण में सुधार एवं खपत में तेजी के संकेत मिलते हैं। लेकिन दूसरी तरफ सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआईई) का दावा है कि भारत में दिसंबर महीने में बेरोजगारी की दर बढ़कर 8.3% हो गई है। बेरोजगारी दर का यह आंकड़ा पिछले 16 महीनों में सबसे ज्यादा है। यह हमारी अर्थव्यवस्था की समावेशी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि 'एक देश-एक कर' के नारे के तहत जीएसटी के कार्यान्वयन से भारत विश्व भर में आकर्षक कारोबारी डेस्टिनेशन के रूप में उभरा है। इस व्यवस्था ने भारत के लगभग 140 करोड़ लोगों के लिए साझा बाजार की अवधारणा को साकार कर दिया है। अनेक अप्रत्यक्ष करों का जीएसटी में विलयन हो चुका है।
अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों तथा समाज के सभी वर्गों की बेहतरी के लिए वस्तु एवं सेवा कर एक जुलाई 2017 से ही देश में लागू है। जीएसटी प्रणाली के जरिए कर जटिलताओं को कम से कम किए जाने के कारण उद्यमशीलता को लगातार प्रोत्साहन मिला है।
ज्ञात हो कि जीएसटी लागू होने के पहले व्यापारियों, विनिर्माताओं और उत्पादकों को विभिन्न विभागों का चक्कर लगाना पड़ता था तथा 30% तक केंद्रीय व राज्य करों का भुगतान करना होता था। लेकिन अब कारोबारियों को मात्र 18 से 22% तक ही करों का भुगतान करना होता है।
ऑनलाइन भुगतान की सुविधा हो जाने से व्यापारियों को आए दिन के उत्पीड़न से भी निजात मिल गई है। उद्योगों में छोटे बड़े का भेद कम हुआ है जिसके चलते व्यापार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इससे माइक्रो मीडियम और स्माल सभी तरह के उद्योगों के लिए संभावनाएं खुल गई हैं।
उद्यमों में गतिशीलता आने के कारण कर संग्रह भी लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2022 में पिछले 10 महीने से कर संग्रह के रूप में राजस्व 1.40 लाख करोड़ रुपए से अधिक रहा है। वित्त मंत्रालय ने अपने ताजा बयान में बताया है कि दिसंबर 2022 के दौरान सर्कल जीएसटी राजस्व 149507 करोड़ रुपए का रहा है। इसमें सीजीएसटी 26711 करोड़ रुपए, एसजीएसटी 33357 करोड़ रुपए, आईजीएसटी 78434 करोड़ रुपए (माल के आयात पर एकत्र 40263 करोड़ रुपए सहित) और उपकर 11005 करोड़ रुपए (माल के आयात पर एकत्र 850 करोड रुपए सहित) है।
इस तरह दिसंबर 2022 में राजस्व संग्रह सालाना आधार पर 15% अधिक है क्योंकि पिछले साल इसी अवधि में जीएसटी संग्रह 1.30 लाख करोड़ रुपए का रहा था। इस दौरान सरकार ने नियमित निपटान के रूप में आईजीएसटी व सीजीएसटी में 36669 करोड रुपए और एसजीएसटी में 31094 करोड रुपए का निपटान किया है। दिसंबर 2022 में नियम नियमित निपटान के बाद केंद्र और राज्यों का कुल राजस्व सीजीएसटी के लिए 63380 करोड़ रुपए और एसजीएसटी के लिए 65451 करोड़ रुपए है।
दिसंबर महीने का कर संग्रह नवंबर की तुलना में अधिक है लेकिन अक्टूबर की तुलना में कम है। अक्टूबर महीने का जीएसटी संग्रह 1.52 लाख करोड़ रुपए का था। अक्टूबर में त्योहारी सीजन के कारण खरीददारी भी ज्यादा हुई थी, मार्केट में डिमांड थी और उत्पादन भी ज्यादा हुआ था। मांग में तेजी और कच्चे माल के दामों में कमी से लागत कम होने के चलते नवंबर महीने से देश में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में गतिविधियां बढ़ गई थी, जिसका परिणाम दिसंबर महीने के आंकलन में दिख रहा है।
S&P ग्लोबल इंडिया के सर्वे में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कार्यरत कंपनियां आने वाले समय में तेजी की संभावनाओं को लेकर काफी आश्वस्त हैं। सर्वे में शामिल कंपनियों ने भरोसा जताया है कि उनके उत्पादों की मांग की तेजी बनी रहेगी तथा साल 2023 में उत्पादन बढ़ाने की उनकी क्षमता भी अच्छी रहेगी। हाल के दिनों में सकारात्मक धारणा का स्तर जो दिखा है वह पिछले 8 साल में सर्वाधिक है।
अब बात करते हैं सीएमआईई के आंकड़ों की। ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में दिसंबर महीने में बेरोजगारी दर बढ़कर 8.3% हो गई है यह पिछले 16 महीनों में सबसे ज्यादा है। नवंबर महीने में यह आंकड़ा 8% का था। हालांकि आंकड़ों में बेरोजगारी दर के बढ़ने के साथ-साथ श्रम भागीदारी बढ़ने की उलटबांसी भी शामिल है। दिसंबर महीने में श्रम भागीदारी 40% तक बढ़ी है जो 12 महीनों के सबसे ज्यादा ऊंचे स्तर पर है। लेकिन चिंता की बात यह है कि ग्रामीण बेरोजगारी के अनुपात में इस महीने शहरी बेरोजगारी में भारी वृद्धि हुई है।
याद कीजिए कुछ महीने पहले ही इलाहाबाद में अचानक हजारों छात्र रोजगार के सवाल पर ताली बजाते आधी रात को सड़कों पर उतर आए थे। मनमोहन सरकार के दौर में जॉबलेस ग्रोथ से रोजगार के सवाल पर युवाओं में बढ़ती बेचैनी को भांपते हुए वर्ष 2013 में वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी ने इसे जोर-शोर से उठाया था। युवा आबादी के हर हाथ को काम देने की बात कही गई थी। लेकिन हर तरह के आंकड़े गवाह हैं कि 3 दशक के नवउदारवादी अर्थनीति के सबसे बड़े शिकार रोजगार के अवसर ही हुए हैं।
बहरहाल आंकड़ों के आईने में एक ही समय में कर संग्रह का आकार बढ़ने और रोजगार के अवसर कम होने की तस्वीर आसानी से गले उतरने वाली नहीं है। क्या इन दोनों के बीच कोई सरल संबंध हो सकता है? सुगम मांग और पूर्ति के कारण उद्योग का पहिया रफ्तार से घूमा है इसलिए जीएसटी संग्रह को लेकर कोई संदेह का कारण नहीं है, लेकिन न्यूज़ एजेंसी राइटर के हवाले से आये सीएमआई के आंकड़े संशय पैदा करने वाले हैं। सजावटी और बनावटी आंकड़ों के जरिए प्रभावित करने की बातें भी अब एक तरह से आम हो गई है।
हिंदी पट्टी की अधिकांश आबादी आज भी इन जटिल पेंचो को रामचरितमानस के सूत्रों से सुलझाने की अभ्यस्त है। बाबा तुलसी ने लिखा है कि "दुई न होहि एक संग भुआलू, हंसब ठठाई फुलाईब गालू।" परंतु इस सूक्ति के उलट आंकड़ों में यह करिश्मा हुआ है। ऐसे में किस गाल से हंसे और किस आंख से रोए का प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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