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SC Verdict on Demonetisation: सरकार के नीतिगत निर्णय पर न्यायपालिका द्वारा सुनवाई करना कितना सही?

न्यायपालिका और सरकार में समन्वय की जरूरत को नकारा नहीं जा सकता। नहीं तो ऐसी याचिकाएं भी दाखिल होंगी जिसमें न्यायपालिका को ही सरकार चलाने का निवेदन किया जाएगा और न्यायपालिका इस पर विचार भी करने लगेगी।

SC Verdict on Demonetisation of policy decisions of the central government

SC Verdict on Demonetisation: भारत सरकार ने 8 नवम्बर, 2016 को 500 और 1000 के नोटों की नोटबंदी या विमुद्रीकरण की घोषणा की थी, जिसे कुछ लोगों ने न्यायपालिका में चुनौती दी थी। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से विमुद्रीकरण पर उठे सवालों को खारिज कर सरकार के निर्णय को सही ठहराया।

बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार के नीति निर्धारण के अधिकार को चुनौती देनी वाली याचिकाओं को न्यायपालिका द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए? सरकार के कई नीतिगत निर्णय हो सकते है जिसका विरोध होता हो। हर विरोध पर अगर न्यायपालिका याचिकाएं स्वीकारने लगी तो सरकार को नीतिगत निर्णय लेने में भी मुश्किल होगी तथा न्यायपालिका का भी वक्त जाया होगा।

भारतीय संविधान का आदर जरूरी

यह विदित है कि भारतीय संविधान का ढांचा तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखा गया था कि विधि निर्माण, शासन व्यवस्था और न्यायपालिका अलग-अलग तरीके से काम करें और कोई एक दूसरे के अधिकार में हस्तक्षेप ना करें। अगर कोई पक्ष अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता है तो ऐसे समय में न्यायपालिका इस पर विचार कर सकती है और अधिकारों की मर्यादा स्पष्ट कर सकती है। लेकिन यह ध्यान में रखना जरूरी है कि सरकार के नीतिगत निर्णय का विरोध करना अलग बात है और उसको न्यायपालिका में चुनौती देना अलग।

वैसे भी नीतिगत निर्णय को तत्काल ही खारिज किया जाए तो ही उपयोगी हो सकता है, बाद में उस पर चर्चा करने का कोई महत्व नहीं रह जाता। इसलिए यह जरूरी है कि सरकार की हर नीति पर न्यायपालिका में सवाल न खड़ा किया जाए और सरकार को अपना काम करने दिया जाए। भारतीय संविधान निश्चित यह दृष्टिकोण रखता है कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत काम करने वाले सभी पक्ष अपना-अपना काम ईमानदारी से करें।

नीति निर्धारण का अधिकार हो सरकार के पास

आज़ादी के बाद भारत ने अपना अलग मार्ग चुना जिसमें लोकतंत्र और लोक कल्याण की भूमिका महत्वपूर्ण चुनाव और उससे जुड़ी प्रक्रिया जैसी बदली जा सकती है वैसे ही लोक-कल्याण की नीति भी बदलती रहती है और बदलती भी रहनी चाहिए। सरकार चुनाव की प्रक्रिया से गुजरती है और उसे लोक-कल्याण की नीति निर्धारण करने का अधिकार मिल जाता है। लोक-कल्याण के कुछ मार्गदर्शक तत्वों की बात भारतीय संविधान जरूर करता है लेकिन उस पर कब और कैसे अमल करना है यह सरकार तय करती है। उसका यह अधिकार माना जाना चाहिए।

आज़ादी के बाद भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक क्षेत्र की सारी नीतियां या दूसरे देशों से संबंध रखने वाली नीति विरोध होने के बावजूद अपने ढंग से सरकार ने बनाई थी। विरोधी दल उसका विरोध करते रहे और उस पर बहस भी होती रही। बाद में ऐसी बहुत सी नीतियां गलत भी साबित हुई। ऐसी नीतियों में विदेश नीति भी है, धर्मनिरपेक्षता की नीति भी है और यू-टर्न ली हुई आर्थिक नीतियां भी है।

इसलिए यह नहीं भूलना चाहिए कि हर नीति के पीछे सरकार का अपना आकलन होता है और उस विशिष्ट परिपेक्ष में सरकार अपना लक्ष्य रखती है और नीति निर्धारण करती है। हर नीति का परिणाम अच्छा ही हो ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसलिए किसी नीति को गलत मानकर न्यायपालिका में चुनौती देना व्यर्थ माना जाना चाहिए। न्यायपालिका को भी ऐसी नीति विरोधी याचिका स्वीकारने से पूर्व विचार करना चाहिए।

नीति के आधार क्या हों यह बहस का मुद्दा

सरकार के नीति निर्धारण के क्या आधार होने चाहिएं, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन ऐसी बहस का कुछ नतीजा निकले ऐसा नहीं होता। अलग-अलग विचारधारा रखने वाले व्यक्ति, व्यक्ति समूह और उनके बनाए राजनीतिक दल आपस में किसी एक मत पर आएंगे ऐसा कहना गलत होगा। आज तो ऐसी स्थिति है कि राजनीतिक दल तो राष्ट्र की सार्वभौमिकता से जुड़ी नीतियों पर भी सहमत नहीं हो रहे। वे आर्थिक और अन्य नीतियों पर सहमत होंगे यह कहना एक भूल होगी।

आजकल बहुत से राजनीतिक दल खानदान से जुड़े है और खानदान के भविष्य की चिंता में डूबे हुए हैं। उनके अपने कोई विशिष्ट नीतिगत विचार हैं, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। ऐसे दलों में राष्ट्रीय नीति पर एकमत होना मुश्किल ही कहा जाएगा।

हां, यह जरूर है कि नीति तय करते समय सर्वोपरि राष्ट्रहित की सोच होनी चाहिए। यह भी कहा जा सकता है कि सरकार को नागरिकों की स्वतंत्रता अकारण नहीं छीननी चाहिए और ऐसी कोई नीति नहीं अपनानी चाहिए जिससे व्यक्ति परिवार या विशेष गुट का फायदा हो और राष्ट्र का दीर्घकालीन नुकसान हो। ऐसे नीतिगत विषयों में स्पष्टता लायी जा सकती है और न्यायपालिका इसमें मदद कर सकती है।

न्यायपालिका की भूमिका स्पष्ट होना जरूरी

यह सही है कि न्यायपालिका ने अभी तक जो भी फैसले किए हैं, वह अपने अधिकार और मर्यादा में किए हैं। लेकिन जैसे-जैसे राजनीति हर विषय में अपना रंग दिखा रही है और हर बात में चुनावी राजनीति हावी होती जा रही है वैसे-वैसे सरकार की हर नीति पर सवाल खड़े किए जा रहे है और उनको न्यायपालिका में चुनौती दी जा रही है। पहले ऐसा नहीं होता था यह बात ध्यान में रखनी होगी। ऐसे कई उदाहरण हैं जब एकतरफा नीति बदली गई, यहाँ तक कि संविधान में भी बदलाव किए गए।

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    विमुद्रीकरण की ही बात ली जाए तो यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। लेकिन उस वक्त कोई न्यायपालिका में यह विषय लेकर नहीं गया। भारत की सरकार ने अपनी आर्थिक नीति में 1990 दशक में एक बड़ा बदलाव किया। उसको भी किसी ने चुनौती नहीं दी। इसलिए न्यायपालिका को नीतिगत विषयों पर अपनी भूमिका फिर एक बार स्पष्ट करनी चाहिए।

    न्यायपालिका और सरकार में सीमारेखा होना आवश्यक

    भारत आजादी के सौ वर्ष पूरे करने की ओर अग्रसर है लेकिन सरकार क्या कर सकती है और न्यायपालिका को क्या करना चाहिए, इस पर बहस हो रही है। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि क्या यह कमी भारतीय संविधान की है, सरकार की नीति निर्धारण स्वतंत्रता की है या फिर न्यायपालिका के आवश्यकता से ज्यादा हस्तक्षेप की है। कुछ भी हो इस पर बहस की आवश्यकता है ताकि कार्यपालिका और न्यायपालिका की सीमारेखा तय की जा सके।

    न्यायपालिका और सरकार में समन्वय की जरूरत को नकारा नहीं जा सकता। नहीं तो ऐसी याचिकाएं भी दाखिल होंगी जिसमें न्यायपालिका को ही सरकार चलाने का निवेदन किया जाएगा और न्यायपालिका इस पर विचार भी करने लगेगी।

    यह भी पढ़ें: Demonetisation Judgement: नोटबंदी को अब सुप्रीम कोर्ट की भी हरी झंडी, पहले भी एक बार हुई थी नोटबंदी

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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