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शिक्षा एवं खेलों में भारत की 75 वर्षों की गौरवपूर्ण उपलब्धियां

नई दिल्ली, 16 अगस्त: स्वाधीनता के तुरंत बाद भारत के सामने एक प्रमुख समस्या अपनी शिक्षा प्रणाली का पुनर्गठन करने की थी। एक तरफ माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा, तो दूसरी ओर उद्योग एवं कृषि विकास के लिए आवश्यक तकनीकी शिक्षा के विस्तार की आवश्यकता थी। भारत के तीसरे केंद्रीय शिक्षा मंत्री, हुमायूँ कबीर अपनी पुस्तक, 'स्वतंत्र भारत में शिक्षा' में शुरूआती शिक्षा व्यवस्था के सुधार पर लिखते है, "1947 में प्राथमिक स्तर पर 6 से 11 वर्ष तक की आयु के बालकों में से मुश्किल से 30 प्रतिशत किसी न किसी प्रकार के विद्यालय में पढने जाते थे। 5 वर्ष के अन्दर यह बढ़कर 40 प्रतिशत हो गया।"

Indias proud achievements of 75 years in education and sports

वर्तमान में यह प्रतिशत 97.8 हो चुका है। वर्ष 2020-21 में प्राथमिक से उच्च माध्यमिक तक स्कूली शिक्षा में नामांकित कुल छात्र 25.38 करोड़ हो गए हैं। जबकि 2019-20 में यह संख्या 25.10 करोड़ थी। अतः नामांकन में 28.32 लाख की वृद्धि हुई है। दरअसल, इन बीते वर्षों में भारत सरकार और निजी उपक्रमों के माध्यम से लगातार निवेश के द्वारा एक बेहतरीन एवं उच्चस्तरीय शैक्षणिक व्यवस्था बनाने के प्रयासों से ही यह सफल नतीजे आने शुरू हुए है, जिसकी जानकारी निम्न तालिका में है :

वर्ष सार्वजनिक निवेश
(करोड़ रुपये)
निजी निवेश
(करोड़ रुपये)
1951-52 64.5 86.3
1961-62 260.3 213.2
1971-72 1011.1 619.3
1981-82 4298.3 2334.1
1991-92 22393.7 9667.1
2001-02 79865.7 40777.4
2011-12 333930.4 182378.0
2019-20 849279.7 14763.6

उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए वर्ष 2000 में बड़े पैमाने पर पूंजी का निवेश किया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 4 जुलाई 2000 को चेन्नई स्थित जयगोपाल गरोडिया हिन्दू विद्यालय के 25 वर्ष पूरे होने पर अपने संबोधन में केंद्र सरकार की नीतियों को स्पष्ट करते हुए कहा, "शिक्षा हमारी सरकार की मुख्य प्राथमिकताओं में से एक है। विशेषकर, प्राथमिक शिक्षा हमारा प्रमुख चिंता का विषय है। इस साल के बजट में शुरुआती शिक्षा का बजट 26.5 प्रतिशत बढाया गया है। इस दिशा में केंद्रीकृत ध्यान देने के लिए एक अलग से प्राथमिक शिक्षा का विभाग भी बनाया गया है।" इन्ही प्रयासों का एक और सकारात्मक नतीजा था कि देश में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या में भी पिछले दो दशकों में तेजी से इजाफा हुआ है। देखें, निम्न तालिका :

संस्थान 1951 में 1991 तक 2022 तक
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान 00 01 25
IIM 00 04 20
IIT 01 05 23
केंद्रीय विश्वविद्यालय 05 22 54

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एकतरफ भारत में शिक्षा के विस्तार को लेकर सुधार जारी थे तो दूसरी तरफ शिक्षा का प्रकार क्या हो, इस विषय पर भी चर्चा शुरू होने लगी थी। इस सन्दर्भ में भारत के चौथे केंद्रीय शिक्षा मंत्री, एम. सी. छागला अपनी आत्मकथा में में लिखते है, "यह सही है कि हमें भविष्य को देखते हुए आधुनिक और तर्कसंगत शिक्षा व्यवस्था बनाने के प्रयास करने चाहिए, लेकिन हमें अपने पैरों को इस देश की मिट्टी से भी जोड़ कर रखने होंगे। इसलिए शिक्षा में भारतीय परिस्थितियों की प्रासंगिकता के साथ एक स्वदेशी अभिविन्यास होना चाहिए।"आखिरकार, वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 29 जुलाई को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को मंजूरी दे दी, जिससे स्कूली और उच्च शिक्षा दोनों क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रूपांतरकारी सुधार के रास्ते खोले गए। 21वीं सदी की इस पहली समग्र शिक्षा नीति ने 34 साल पुरानी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई), 1986 की जगह ली है।

सबके लिए आसान पहुंच, इक्विटी, गुणवत्ता, वहनीयता और जवाबदेही के आधारभूत स्तंभों पर निर्मित यह नई शिक्षा नीति सतत विकास के लिए एजेंडा 2030 के अनुकूल है और इसका उद्देश्य 21वीं सदी की जरूरतों के अनुकूल स्कूल और कॉलेज की शिक्षा को अधिक समग्र, लचीला बनाते हुए भारत को एक ज्ञान आधारित जीवंत समाज और ज्ञान की वैश्विक महाशक्ति में बदलना और प्रत्येक छात्र में निहित अद्वितीय क्षमताओं को सामने लाना है।

इस शिक्षा नीति को देशभर से भरपूर समर्थन मिला जिसके एक साल के अंतराल में ही नतीजे आने शुरू हो गए थे। प्रधानमंत्री मोदी ने इस सफलता पर एक उद्बोधन देते हुए कहा, "देश के 8 राज्यों के 14 इंजीनियरिंग कॉलेज हिंदी, तमिल, तेलुगू, मराठी और बांग्ला इन 5 भारतीय भाषाओं में शिक्षा देना शुरू कर रहे हैं। इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम का 11 भाषाओं में अनुवाद करने के लिए एक टूल विकसित किया गया है। शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा पर जोर देने से गरीब, ग्रामीण और आदिवासी पृष्ठभूमि के छात्रों में आत्मविश्वास पैदा होगा। यहां तक कि प्राथमिक शिक्षा में भी मातृभाषा को बढ़ावा दिया जा रहा है और आज शुरू किया गया 'विद्या प्रवेश कार्यक्रम' उसमें बड़ी भूमिका निभाएगा।

खेलों में विकास
शिक्षा के साथ-साथ खेलों की बात करे तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि स्वाधीन भारत के शुरूआती वर्षों में खेलों की तरफ केंद्र सरकारों का रुझान बहुत कम था। भारत में जब पहला बजट वित्त मंत्री सी.डी. देशमुख द्वारा पेश किया गया तब उन्होंने खेलों के लिए कोई सहायता राशि आवंटित नहीं की थी। दरअसल, पहली बार खेलों के विकास एवं संवर्धन का एक छोटा प्रयास 1982 में हुआ था, तब नई दिल्‍ली में 9वें एशियाई खेलों के आयोजन के समय युवा कार्य और खेल विभाग स्थापना की गई थी।

इसके बाद, प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की सरकार में केंद्रीय वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1985-86 का बजट पेश किया तो पहली बार खेलों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "अंतरराष्ट्रीय महत्व के आयोजनों में पुरस्कार जीतने वाले हमारे खिलाड़ियों को प्रोत्साहन देने की दृष्टि से हमने एक योजना तैयार की है, जिसके द्वारा उन्हें पुरस्कारों पर देय करों के संबंध में उपयुक्त रियायतें दी जाती हैं।"

फिर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 27 मई 2000 को खेलों के विकास के लिए एक अलग से केंद्रीय मंत्रालय बनाया गया। वर्ष 2000-01 के बजट में वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा, "कुछ महत्वपूर्ण लेकिन बिखरी हुई उपलब्धियों को छोड़कर, अंतरराष्ट्रीय खेल क्षेत्र में हम कोई बड़ी ताकत नहीं बन सके हैं। कई अन्य गतिविधियों की तरह, आधुनिक खेलों और एथलेटिक्स को अपने विकास के लिए धन और बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है। इस स्थिति को सुधारने के लिए मैं प्रस्ताव करता हूं कि कॉर्पोरेट संस्थाओं द्वारा भारतीय ओलंपिक संघ (आईओसी) को बुनियादी ढांचे के विकास और खेलों के प्रायोजन के लिए किए गए दान पर 100 प्रतिशत कटौती उपलब्ध होगी। मुझे उम्मीद है कि इस रियायत से आईओसी देश में खेलों को बढ़ावा देने के लिए बेहतर ढंग से सुसज्जित होगी।"

इसके साथ ही तब केंद्र सरकार ने वर्ष 1999-2000 के बजट में 190 करोड़ रुपए खेलों के लिए आवंटित किए थे जोकि 2022-2023 में यह राशि बढ़कर 3062.60 करोड़ रुपए हो गयी है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा युवा प्रतिभाओं को प्रेरित करने और उन्हें शीर्ष स्तर तक ले जाने के लिए उच्चस्तरीय बुनियादी सुविधाएं और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम - खेलों इंडिया की भी शुरुआत की गयी है।

प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, "यह खेलों को जमीनी स्तर पर और लोकप्रिय बनाने के लिए काम जारी रखने का समय है, जिससे नई प्रतिभाएं सामने आएं और आने वाले समय में उन्हें भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिले।" परिणामस्वरूप आज भारत में लगभग 48 मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय खेल संघ हैं, जिनके खिलाडी हर अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर भारत का परचम लहरा रहे है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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