India and China: चीन को उसकी भाषा में जवाब देना जरुरी
वर्ष 2009 में चीन के आधिकारिक थिंक टैंक जान ल्यू ने बीजिंग को सलाह दी थी कि वह भारतीय गणतंत्र को 26 भागों में तोड़कर उससे निपटे। ऐसा लग रहा है कि बीजिंग उसी राह पर चल रहा है।
हाल ही में चीन ने एक नक्शा जारी कर भारत के अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चीन को अपने हिस्से की जमीन बताकर एक बार फिर दुश्मनी का ही परिचय दिया है। दिल्ली मे होने वाले जी 20 शिखर सम्मेलन में भारत आने से ठीक पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने द्विपक्षीय संबंधों की अहमियत को मानो एकदम से नकार दिया है।

चीन की भारत विरोधी नीति कोई नई नहीं है। आजादी के तुरंत बाद 1952 से चीन भारत के साथ टकराव के रास्ते पर चल रहा है। कई बार एलएसी का उल्लंघन कर चुकी पीपल्स लिबरेशन आर्मी ऑफ चाइना यह साफ कहती है कि ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत और तिब्बत के बीच सीमा तय करने वाली मैकमोहन लाइन को वह नहीं मानती। पीएलए के लिए चीन की सीमा वही है तो 12वीं और 13वीं सदी में थी।
चीन आज भी 13वीं सदी में चीनी संस्कृति के प्रतिनिधि राज्यों जिसमें पश्चिम में तियानशान, तारिम बेसिन और हिमालय, उत्तर में सायन पर्वत और दक्षिण में रेड डेल्टा क्षेत्र को अपना मानता हैं और इसके लिए लगातार लड़ाइयां भी लड़ रहा है। चीन अपनी इस विस्तारवादी नीति के प्रति इतना आग्रही है कि उसकी सीमा से जुड़े 14 देशों के साथ सीमा विवाद चल रहा है। भारत कोई अपवाद नहीं है, बल्कि ताइवान के बाद सबसे ज्यादा आक्रामक रवैया उसका नई दिल्ली के प्रति ही है। सरकार चाहे कोई भी हो चीन के लिए यह मायने नहीं रखता।
भारत के प्रति इन दिनों जो चीन के नकारात्मक रवैये में तेजी आई है उसका कारण भारत की बढ़ती साख और नई रणनीतिक साझेदारी है। खासकर वाशिंगटन के साथ जिस तेजी से भारत ने रक्षा एवं व्यापारिक साझेदारी बढ़ाई है, उससे चीन एक दम से बिफर गया है।
14 मार्च 2013 को चीन के राष्ट्रपति के रूप में चयनित होने के बाद से ही शी जिनपिंग अमेरिका को पछाड़ कर चीन को नंबर एक पर पहुंचाने के अपने पूर्वजों के अधूरे काम को पूरा करने में जी जान से लगे हुए हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन को अपने इस अभियान में रूकावट लगने लगी है। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ना सिर्फ दक्षिण एशिया में चीन के वर्चस्व को रोकने में सफल रहे हैं, बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, जर्मनी और जापान के साथ एक मजबूत साझेदारी कर चीन के आर्थिक साम्राज्य को भी चुनौती दे रहे हैं।
ऐसे में शी जिनपिंग के लिए यह दौर काफी कठिन है। एक तरफ कोविड के बाद से चीन की आर्थिक प्रगति बाधित हो रही है, चीनी कंपनियों का दिवाला निकल रहा है। बड़े निवेशक चीन से भाग रहे हैं और चीनी निर्यात में भारी गिरावट आई है। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने ताइवान में चीन की नाक में दम किया हुआ है। क्वाड के जरिए भारत, जापान, आस्ट्रेलिया और अमेरिका ने चीन को साउथ चाइना सी में नकेल कस दी है। अब तो फिलिपींस भी चीन के समुद्री बेड़ों को ललकार लेता है।
चीन को भारत ने उसके क्षेत्र में घेरने की सफल रणनीति अपनाई है। वरिष्ठ रक्षा विश्लेषक और प्रोफेसर डेरेक ग्रॉसमैन का कहना है कि चीन के सभी आक्रामक प्रयासों के बावजूद नरेंद्र मोदी की सरकार ने दक्षिण एशिया के महत्वपूर्ण क्षेत्र में बीजिंग को पीछे धकेल दिया है। ग्रॉसमैन के अनुसार कुछ समय पहले तक बीजिंग ने हिंद महासागर के सात प्रमुख बंदरगाहों तक अपनी पहुंच हासिल कर भारत के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर दी थी।
पाकिस्तान में ग्वादर, श्रीलंका में हंबनटोटा और बांग्लादेश में चटगांव जैसे बंदरगाहों पर चीनी प्रभुत्व के कारण भारत के चारों ओर खतरा मंडरा रहा था। लेकिन भारत ने धीरे धीरे चीन की इस बढ़त को काफी हद तक रोक दिया है। इस समय भारत के मालदीव, नेपाल और श्रीलंका के साथ मजबूत संबंध हैं और बांग्लादेश भी चीन के साथ संबंधों में सतर्कता बरत रहा है।
पाकिस्तान को छोड़ दें तो भारत ने अपनी स्थिति अफगानिस्तान तक काफी मजबूत बना ली है। चीन ने अफगानिस्तान में पैठ बनाने की की बड़ी कोशिश की, लेकिन तालिबान गुप्त रूप से इस्लामी चरमपंथी समूहों के जरिए चीन को भारी आर्थिक व मानवीय नुकसान पहुंचा रहे हैं। पिछले दो साल में ग्वादर से लेकर काबुल तक एक दर्जन से ज्यादा हमले चीनी अधिकारियों व उनकी परियोजनाओं पर हुए हैं। इस्लामिक चरमपंथी चीन के शिनजियांग प्रांत पर अपना दावा करते हैं और हमले करने के लिए हर दम तैयार रहते हैं।
ऐसे में चीन का घाव आने वाले दिनों में भरने वाला नहीं बल्कि बड़ा होने वाला है, खासकर आर्थिक मोर्चे पर। चीन में काम कर रहे विदेशी निवेशकों में खलबली मची है। चीन के लिए यह बर्दाश्त करना मुश्किल है कि अप्रैल जून की इस अवधि में उसके प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 87 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है। इस अवधि में चीन को केवल 4.9 अरब डॉलर के विदेशी निवेश प्राप्त हुए हैं। उस पर से हाल ही में अमेरिका ने यह ऐलान कर दिया है कि चीन अब निवेश के उपयुक्त देश नहीं रहा। अमेरिका की वाणिज्य मंत्री गिना रैमेण्डो ने चीनी अधिकारियों से स्पष्ट कह दिया कि अमेरिकी व्यापारियों के लिए चीन में निवेश करना कठिन है और उसके कई कारण हैं। चीन में इंटेलेक्चुल प्रॉपर्टी की बड़े पैमाने पर चोरी होती है। विदेशी कंपनियों पर बिना किसी कारण रेड किया जाता है, बहाने बनाकर उन पर भारी जुर्माना लगाया जाता है।
वहीं अमेरिका भारत को बेहतर निवेश गंतव्य बताता है। दुनिया भर के सीईओ और सीएफओ को निवेश की सलाह देने वाली अमेरिका की बिजनेस सलाहकार रिसर्च एजेंसी ईडी यार्डेनी ने कहा है कि तमाम अनिश्चितताओं के बावजूद भारत निवेश का एक आकर्षक केंद्र बना रहेगा। ऐसे में इस समय अमेरिका के साथ जो भी देश रणनीतिक साझेदारी में है, सबके साथ चीन एक दुश्मनी का भाव रख रहा है। भारत को वह तो अमेरिका का पिट्ठू तक बता रहा है।
जी 20 की बैठक में भाग लेने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले सप्ताह नई दिल्ली आ सकते हैं। यदि वो आते हैं तो जाहिर है अरुणाचल प्रदेश, अक्साई चीन और एलएसी पर चीन की धृष्टता को ध्यान में भारतीय पक्ष रखेगा ही। बहुत हद तक संभव है कि चीन इस बार भी यह रुख अपनाए कि सीमा विवाद को परे रखकर भारत व्यापार और अन्य मुद्दों पर चीन के साथ सहयोग बढ़ाए। पर शी जिनपिंग को यह मालूम है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंभीर विवाद के साथ गंभीर व्यापार करने की नीति कभी नहीं रखी है। पाकिस्तान समझ चुका है। चीन भी समझ रहा है। हाल के दिनों में भारत ने चीन को इलेक्ट्रॉनिक और कंप्यूटर आयात पर ट्रेलर दिखा दिया है। लैपटाप और फोन के आयात पर कुछ महीनों में ही पाबंदी लगने वाली है। भारत ने चीनी इलेक्ट्रिक कार और सेमी कंडक्टर चिप कंपनियों को घुसने की इजाजत नहीं दी है।
मजबूत व्यापार संबंध होने के बाद भी अगर चीन अपनी विस्तारवादी नीति को नहीं छोड़ रहा है तो भारत भी अपनी व्यापारिक निर्भरता बदल रहा है। चीन को उसकी भाषा में समझाना जरूरी भी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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