संविधान सभा में तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में कैसे मिली स्वीकृति?
23 जून 1947 को स्वाधीन भारत के राष्ट्रीय ध्वज पर सुझाव देने के लिए एक तदर्थ समिति गठित की गयी थी। समिति के अध्यक्ष, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और सदस्यों में मौलाना आजाद, के.एम. पणिक्कर, सरोजनी नायडू, के.एम. मुंशी, सी. राजगोपालाचारी, उज्ज्वल सिंह, फ्रेंक एंथोनी, एस.एन. गुप्ता और डॉ. भीम राव अंबेडकर को नामांकित किया गया।

समिति में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी सदस्य के रूप में नामांकित किया जाना था। मगर डॉ. राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि उनका नाम गलती से छूट गया। हालाँकि, गलती का एहसास होने के बावजूद भी डॉ. मुखर्जी को समिति की किसी भी बैठक में आमंत्रित नहीं किया गया। जबकि नामित सदस्यों के अलावा अन्य लोगों को बैठकों में बुलाया गया था।
संविधान सभा के अगले सत्र से पहले 14 जुलाई 1947 तक समिति को अपनी रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा गया था। वैसे तो समिति के गठन से पहले ही यह निश्चित कर लिया गया था कि बम्बई की कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा वर्ष 1931 में पारित ध्वज ही भारत का राष्ट्रीय ध्वज होगा। अतः समिति के पास अन्य विकल्पों पर विचार करने अथवा राष्ट्रव्यापी सुझाव आमंत्रित करने जैसा कोई व्यापक कार्य नहीं था।
वीर सावरकर ने डॉ राजेंद्र प्रसाद से एक अनुरोध जरुर किया था कि कम-से-कम एक पंक्ति में केसरिया रंग को जगह देनी चाहिए। समिति ने ध्वज निर्माण सम्बन्धी विषय पर चर्चा के लिए मात्र दो बैठकें बुलाई। पहली बैठक 10 जुलाई को हुई। जिसमें समिति के निर्धारित सदस्यों के अलावा सरदार बलदेव सिंह, हीरालाल शास्त्री, बी. ट्टाभिसीतारमैया, सत्यनारायण सिन्हा, और जवाहरलाल नेहरू भी उपस्थित थे।
इसी दिन सभी सदस्यों ने कांग्रेस के ध्वज में कुछ बदलाव के साथ उसे भारत का राष्ट्रीय ध्वज को मान्यता देने का निर्णय ले लिया। समिति की दूसरी बैठक 18 जुलाई को बुलाई गयी थी। यहाँ वही सभी सदस्य उपस्थित थे जोकि पहली बैठक में शामिल हुए थे। इस दिन समिति ने तय किया कि राष्ट्रीय ध्वज के प्रस्ताव को संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू पेश करेंगे।
इस प्रकार भारत के राष्ट्रीय ध्वज का वर्तमान स्वरुप 22 जुलाई 1947 को भारतीय विधान परिषद् (संविधान सभा) में स्वीकृत किया गया। उस दिन जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस के झंडे में कुछ परिवर्तन करके उसे स्वाधीन भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में सदन के पटल पर प्रस्तावित किया।
नेहरू का प्रस्ताव इस प्रकार था, "निश्चय किया गया है कि भारत का राष्ट्रीय झंडा तिरंगा होगा, जिसमें गहरे केसरिया, सफ़ेद और गहरे हरे रंग की बराबर-बराबर की तीन आड़ी पट्टियाँ होगी। सफ़ेद पट्टी के केन्द्र में चरखे के प्रतीक स्वरुप गहरे नीले रंग का एक चक्र होगा। चक्र की आकृति उस चक्र के समान होगी जो सारनाथ के अशोक कालीन सिंह स्तूप के शीर्ष भाग पर स्थित है।"
अपने प्रस्ताव के अंत में नेहरू ने सदन के सामने दो झंडे रखते हुए कहा, "श्रीमान जी, अब मैं आपके सामने केवल प्रस्ताव ही पेश नहीं करूँगा बल्कि स्वयं झंडे को भेंट करूँगा। आपके सामने ये दो झंडे है, एक रेशम का जिसे मैं पकडे हुए हूँ और दूसरा जो उस ओर है, वह खादी का है।" उन्होंने अपने भाषण में ध्वज संबंधी तकनीकी जानकारी नहीं दी, जैसे ध्वज निर्माण में किस कपडे का प्रयोग होगा और ध्वज को बहुतायत में तैयार करते समय किन-किन बातों का विशेष ध्यान रखना होगा।
अगले वक्ता एच.वी. कामथ ने इस प्रस्ताव में एक संशोधन पेश करते हुए कहा, "सफेद पट्टी के केंद्र में चक्र के अंदर स्वस्तिक, जो प्राचीन भारत का सत्यम, शिवम्, सुन्दरम् का प्रतीक है, अंकित कर दी जाए।" हालाँकि, कामथ ने तुरंत अपना प्रस्ताव वापस ले लिया और कहा, "मैंने सोचा कि यदि चक्र के अंदर स्वस्तिक का चिह्न अंकित कर दिया जाता तो अशोक-चक्र के साथ यह हमारी प्राचीन सभ्यता का समुचित प्रतीक होता अर्थात हमारी सभ्यता के प्रकट और अप्रकट स्वरुप दोनों रहते। धर्म-चक्र प्रकट प्रतीक होता और स्वस्तिक अप्रकट। लेकिन श्रीमान जी, मैंने अभी झंडे को देखा और मैंने समझा कि इस चक्र के अंदर स्वस्तिक को बैठाना कठिन है। चक्र में यह भद्दा लगेगा।"
अतः संविधान सभा के सदस्यों - पी.एस. देशमुख, सेठ गोविन्ददास, वी.आई. मुनिस्वामी पिल्लै, चौधरी खलीकुज्जमां, एस. राधाकृष्णन, मोहन सिंह मेहता, मोहम्मद शरीफ, तजम्मुल हुसैन, आर.के. सिधवा, गोविन्द मालवीय, सैयद मोहम्मद सादुल्ला, एच.सी. मुकर्जी, जयपाल सिंह, फ्रेंक रेजिनाल्ड एंथनी, ज्ञानी गुरुमुख सिंह मुसाफिर, एच.जे. खांडेकर, बालकृष्ण शर्मा, जोसफ आल्बन डिसूजा, जयनारायण व्यास, एस. नागप्पा, लक्ष्मीनारायण साहू, और सरोजिनी नायडू ने नेहरू द्वारा पेश किये गए राष्ट्रीय ध्वज का अनुमोदन किया और संविधान सभा ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
धवज के तीन रंगों को लेकर आमतौर पर इसके सांप्रदायिक होने की बातें स्वाधीन भारत में बहुत प्रचलन में थी। इन्ही बातों को विराम देने के लिए नेहरू ने संविधान सभा में स्पष्टीकरण देते हुए कहा, "इस झंडे की व्याख्या अलग-अलग तरह से की गयी है। कुछ लोगों ने इसका महत्व गलत ढंग से समझकर यह धारणा बना ली है कि इसके किसी हिस्से से किसी-न-किसी समुदाय विशेष का प्रतिनिधित्व होता है, लेकिन मैं बता देना चाहता हूँ कि अब यह झंडा बना है, इसका किसी प्रकार की साम्प्रदायिकता से कोई सम्बन्ध नहीं है।"
सच्चाई इसके विपरीत थी क्योंकि महात्मा गाँधी अभी भी ध्वज की व्याख्या उसी प्रकार कर रहे थे, जैसी स्वाधीनता से पहले के कालखंड में किया करते थे। उनका कहना था, "जब झंडे की बात उठी तब मुझे लगा कि उसमें एक ही रंग का रखा जाना अन्याय होगा क्योंकि हिंदुस्तान में तो अनेक कौमें है।" 29 जून 1947 को उन्होंने एक बार फिर दोहराया, "(राष्ट्रीय ध्वज) का पहला डिजायन तैयार करने वालों की हैसियत से मैं यह कहना चाहूँगा कि तीन रंग की पट्टियाँ सभी जातियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए थी।"
जैसे कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेताओं ने हमेशा महात्मा गाँधी की सांप्रदायिक व्याख्या का विरोध किया, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य राष्ट्रवादी संस्थाओं ने भी इसकी समान रूप से आलोचना की। फिर भी, आलोचनाओं के समानांतर कांग्रेस ने महात्मा गाँधी द्वारा प्रस्तावित ध्वज का सम्मान रखा, वैसे ही संघ द्वारा इसे सहज रूप से स्वीकार किया गया था।
इसलिए जिस दिन भारत का संविधान अस्तित्व में आया उसी दिन सरसंघचालक गुरु गोलवरकर ने 26 जनवरी 1950 को संघ के मुख्यालय नागपुर से एक वक्तव्य जारी कर न सिर्फ संविधान को बल्कि उसमें समाहित ध्वज इत्यादि सभी अवयवों को सहर्षता से अपना लिया था।
उन्होंने कहा, "आज हमारा अपना संविधान कार्यान्वित हुआ है। ब्रिटिश राज्य मंडल से हमारे सम्बन्ध की अंतिम कड़ी भी टूट गयी और ब्रिटिश शासन के प्रतीक ताज के स्थान पर अशोक चक्र स्थापित हो गया है। हम अब नैतिक या राजनैतिक किसी भी दृष्टी से उनसे बंधे हुए नहीं है। अब हम अपनी इच्छानुसार कार्य करने के लिए स्वतंत्र है। आज 20 वर्ष के लम्बे और सतत संघर्ष के बाद हमने अपने ध्येय की प्राप्ति की है। रावी के तट पर 20 वर्ष पूर्व औपनिवेशिक स्वराज्य को ठुकराकर पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव हमारे आज के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा उपस्थित किया गया था और कांग्रेस ने उसे स्वीकार किया था। उसके बाद प्रतिवर्ष 26 जनवरी को हम यह दिन स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते रहे, किन्तु हमारे चारों ओर विदेशी प्रभुत्व बना रहा। आज का यह अवसर हार्दिक आनंद का अवसर है और हमें इस बात के लिए हर्ष होना चाहिए और यह हमारा यह सौभाग्य है कि हम अपने देश के इतिहास की ऐसी शुभ घड़ी में उपस्थित है।"
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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