Akash Anand BSP: मायावती के भरोसे पर कितना खरा उतर पायेंगे आकाश?

उपेक्षित, पीड़ित, दमित, विस्‍मृत लोगों के सहयोग से स्‍थापित कैडर आधारित बहुजन समाज पार्टी चार दशक के उतार-चढ़ाव भरे सफर के बाद परिवारवाद की राह पर मुड़ गई है। बहुजन का हित साधने के लिए शुरू हुई यात्रा सर्वजन सुखाय के रास्‍ते परिजन हिताय तक आ पहुंची है।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने रविवार को लखनऊ में अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्‍तराधिकारी घोषित कर कांग्रेस, सपा, रालोद, शिवसेना, राजद, झामुमो, पीडीपी जैसे दलों की राह पर आगे बढ़ने का फैसला किया है।

Akash Anand BSP

यूपी एवं उत्‍तराखंड छोड़कर पूरे देश में बसपा को खड़ा करने की जिम्‍मेदारी अब आकाश आनंद के कंधों पर है। 6 साल पहले पार्टी में सक्रिय हुए आकाश आनंद को मायावती ने वर्ष 2017 में बसपा की एक रैली के माध्‍यम से अपने पार्टी कैडर तथा जनता से रूबरू कराया था। तब से लगातार आकाश का कद पार्टी में बढ़ता जा रहा था।

आकाश आनंद मायावती के भाई आनंद कुमार के पुत्र हैं। सियासी गलियारे में लंबे समय से उम्‍मीद जताई जा रही थी कि मायावती अपने भाई आनंद कुमार को उत्‍तराधिकारी बना सकती हैं, लेकिन उन्‍होंने फैसला अपने भाई के पुत्र के पक्ष में सुना दिया है। आकाश आनंद जब से बसपा की सियासी राजनीति में सक्रिय हुए हैं, तब से ऐसा कोई करिश्‍मा नहीं दिखा पाये हैं, जिससे कार्यकर्ताओं में चमत्‍कार की कोई बड़ी उम्‍मीद दिखे।

मायावती ने पार्टी मीटिंग में आकाश आनंद को उत्‍तराधिकारी घोषित करते समय कहा, ''मैंने जब भी किसी को बड़ी जिम्‍मेदारी सौंपी, वह खुद को मेरा उत्‍तराधिकारी समझने लगा। पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ वह इसी तरह पेश आता था। इससे पार्टी में एक संशय पैदा हो रहा था। इसी वजह से मैंने आकाश आनंद को अपना उत्‍तराधिकारी घोषित किया।'' अब जब मायावती ने कार्यकर्ताओं के संशय को दूर करते हुए आकाश को बड़ी जिम्‍मेदारी दे दी है तो यह देखना दिलचस्‍प होगा कि वह क्‍या करिश्‍मा दिखा पाते हैं। बसपा और आकाश की सबसे बड़ी और पहली परीक्षा 2024 का लोकसभा चुनाव होगा। इसके बाद ही बसपा का भविष्‍य भी तय होगा।

माना जा रहा है कि मायावती ने आकाश को उत्‍तराधिकारी घोषित कर दलित वर्ग के युवाओं को लुभाने की कोशिश की है, जो तेजी से आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। चंद्रशेखर लंबे समय से बसपा के लिए चिंता का सबब बनते जा रहे हैं। चंद्रशेखर सड़कों पर उतर कर सवर्ण वर्ग के खिलाफ उग्र राजनीति करते हुए युवाओं के बीच में अपनी पैठ लगातार मजबूत करते जा रहे हैं। बसपा के आंदोलन के समय से जुड़े उम्रदराज दलित समर्थक तो अभी भी मायावती के साथ हैं, लेकिन युवाओं के लिए अब मायावती और बसपा नहीं बल्कि चंद्रशेखर आईकान हैं। ऐसे में आकाश के सामने वोट बैंक को बचाये रखने की चुनौती आसान नहीं रहने वाली है।

यह भी सत्‍य है कि चंद्रशेखर अभी इस स्थिति में नहीं पहुंचे हैं कि अपने बूते कोई बड़ा चमत्‍कार कर सकें, लेकिन उनकी सक्रियता लंबे समय से पश्चिमी यूपी में बसपा को नुकसान पहुंचा रही है। युवाओं में बढ़ता चंद्रशेखर का क्रेज बसपा के वोट बैंक को प्रभावित कर रहा है। उत्‍तराधिकारी घोषित होने के बाद भी आकाश के सामने परेशानियों का आसामान है। बिखरा हुआ कैडर, सिमटा हुआ वोट बैंक, पिछड़े एवं मुसलमानों को पार्टी से जोड़कर रखने वाले बड़े चेहरों का अभाव तथा पार्टी की सड़क पर संघर्ष से दूरी बड़ी चिंता का विषय है। वर्ष 2012 के बाद से बसपा के चुनावी प्रदर्शन को देखें तो उसकी ताकत लगातार कमजोर होती जा रही है।

बसपा की सबसे बड़ी परेशानी रही है कि कांशीराम और उनके सहयोगियों ने गांव-गांव, घर-घर घूमकर कैडर खड़ा किया तो मायावती ने केवल एक ऑफिस से अपनी पूरी सियासत को अंजाम दिया। सड़क पर उतरने से हमेशा परहेज किया। सवाल यह है कि क्‍या आकाश आनंद भी अपनी बुआ के नक्‍शेकदम पर सियासत करेंगे या कांशीराम के मिशन की तरह सड़क पर उतरकर संघर्ष को धार देने की रणनीति अख्तियार करेंगे? इस सवाल का जवाब तो समय देगा, लेकिन आकाश के सामने सबसे बड़ी चुनौती गैर-जाटव, पिछड़ों एवं मुसलमान वोटरों का भरोसा जीतना होगा। वर्तमान में बसपा केवल जाटवों की पार्टी बनकर रह गई है।

गैर-जाटव एवं गैर-यादव पिछड़ों का बड़ा वोट बैंक आज भाजपा के साथ है। मुसलमान सपा और कांग्रेस के बीच झूल रहा है। इस वोट बैंक को वापस लाना आकाश के लिए बड़ी चुनौती होगी। मायावती को चार बार मुख्‍यमंत्री बनवाने में सहयोग देने वाले दलित एवं पिछड़े वर्ग के नेताओं में आरके चौधरी, लालजी वर्मा, जंग बहादुर पटेल, राज बहादुर, केके गौतम, स्‍वामी प्रसाद मौर्य, इंद्रजीत सरोज, सुखदेव राजभर, नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेता दूसरे दलों में हैं। इन नेताओं में सुखदेव राजभर का निधन हो चुका है, और उनके पुत्र सपा के साथ हैं। ऐसी स्थिति में बड़े चेहरों के अभाव में गैर-जाटव दलित, गैर-यादव पिछड़े एवं मुसलमानों का भरोसा जीतना आसान नहीं रहने वाला है।

आकाश के सामने चुनौतियों का पहाड़ है। बीते विधानसभा चुनाव में आकाश आनंद मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान तथा छत्‍तीसगढ़ में लगातार सक्रिय रहे हैं, लेकिन राजस्‍थान को छोड़कर बसपा को कहीं भी जीत हासिल नहीं हुई है। उल्‍टे छत्‍तीसगढ़ एवं मध्‍य प्रदेश में पिछली बार अपने विधायक जिताने वाली बसपा इस बार खाली हाथ रह गई। बसपा के पास यूपी को छोड़कर हिंदी राज्‍यों में दो से लेकर छह प्रतिशत वोट हैं, लेकिन यह जिताऊ तभी साबित होंगे, जब इसमें जाटवों के अलावा दूसरी जातियों के वोट भी जुड़ेंगे। फिलहाल आकाश के नाजुक कंधों पर लोकसभा चुनाव जितवाने के साथ बसपा की राष्‍ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाये रखने की चुनौती है।

मायावती ने आकाश के सिर पर ताज तो रख दिया है, लेकिन अब यह आकाश को तय करना है कि वह कितनी उड़ान भर पाते हैं। बसपा को अगर फिर से अपनी पुरानी ताकत हासिल करनी है तो आकाश को अपने कैडर को नये सिरे से खड़ा करना होगा। सड़क पर उतरकर संघर्ष करना होगा। अपने वोटबैंक के इतर नये वोटर जोड़ने होंगे। कार्यकर्ताओं का भरोसा जीतना होगा तथा उनमें सत्‍ता फिर से हासिल कर पाने का विश्‍वास जगाना होगा।

लेकिन बीते छह साल में आकाश आनंद की सियासत देखने के बाद ऐसा लगता नहीं है कि लंदन से पढ़कर आया यह युवा दलित एवं पिछड़ी बस्तियों की खाक छानेगा, या फिर उनमें वही जातीय उन्माद पैदा कर पायेगा कि मायावती की तरह दलितों की आंख का तारा बन जाए। फिर भी मायावती ने आकाश को उत्‍तराधिकारी घोषित कर जो विश्‍वास जताया है, उसकी सफलता और असफलता का फैसला आने वाला वक्‍त करेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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