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Ram Mandir Impact: राम मन्दिर का चुनावों पर कितना असर पड़ेगा?

Ram Mandir Impact: श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर में रामलला की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा के बाद की राजनीति कैसी होगी, उसकी झलक दो घटनाओं से मिलती है|

कांग्रेस के नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम ने अयोध्या पहुंच कर कहा कि भले ही जन्मभूमि मन्दिर सुप्रीमकोर्ट के फैसले से बना है, लेकिन अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं होते तो फैसला भी नहीं आता और मन्दिर भी नहीं बन पाता|

how much impact will Ram Mandir have on the 2024 lok sabha elections?

यही वह बात है, जो देश का हर हिन्दू मानता है, और यही वह बात है, जिसे आचार्य प्रमोद की कांग्रेस पार्टी नकारती है| इसी तरह जेडीयू के प्रवक्ता डा. सुनील कुमार सिंह ने इस बात से नाराज हो कर पार्टी छोड़ दी कि न्योता मिलने के बाद भी नीतीश कुमार रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में नहीं गए|

विपक्षी दल ऐसा समझते हैं कि श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर चुनावी मुद्दा नहीं बनेगा| इसलिए कांग्रेस, वामपंथी दलों और राष्ट्रीय जनता दल ने मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को संघ और भाजपा का कार्यक्रम बता कर उसका बायकाट कर दिया| बायकाट उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव, अरविन्द केजरीवाल, शरद पवार और नीतीश कुमार ने भी किया, लेकिन चारों ने बायकाट का एलान नहीं किया| बल्कि इन सभी ने कहा कि वे प्राण प्रतिष्ठा के बाद सपरिवार दर्शन करने जाएंगे|

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ममता बनर्जी ने अलग रास्ता अपनाया, उन्होंने प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को राजनीतिक बता कर बंगाल के मन्दिरों में भ्रमण का कार्यक्रम बना लिया| वह अच्छी तरह जानती है कि बंगाल में हिंदुत्व अपने उभार पर है, और इसी हिंदुत्व के उभार के कारण भाजपा 2019 में लोकसभा की 18 सीटें जीत गई थी| इसलिए ममता बनर्जी ने हिन्दू धर्म में अपनी श्रद्धा का प्रकटीकरण किया| वैसे कांग्रेस की तरह विपक्ष के अन्य सभी दल भी मानते हैं कि श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण चुनावी मुद्दा नहीं बनेगा, लेकिन अधिकांश नेताओं ने विरोध का रिस्क नही लिया|

उद्धव ठाकरे के सिपहसालार संजय राउत ने यह भ्रम फैलाने की कोशिश की कि मन्दिर वहां बना ही नहीं, जिसके लिए 500 साल संघर्ष हुआ था| जबकि सब जानते हैं कि मन्दिर वहीं बना है| योगी आदित्यनाथ ने प्राण प्रतिष्ठा के बाद दिए भाषण में कहा- हमने कहा था मन्दिर वहीं बनाएंगे और मन्दिर वहीं बना है|

विपक्षी दलों में सबसे बड़ी मुश्किल में कांग्रेस खड़ी हुई है| उसे अपनी गलती का एहसास है, उसने प्राण प्रतिष्ठा का न्योता अस्वीकार करने का एलान तो कर दिया, लेकिन बाकी दलों के नेताओं की तरह यह नहीं कहा कि कांग्रेस के शीर्ष नेता प्राण प्रतिष्ठा के बाद किसी दिन श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के दर्शन करने जाएंगे|

ऐसा कह दिया होता, तो राहुल गांधी की यात्रा को प्राण प्रतिष्ठा के खिलाफ कांग्रेस का कार्यक्रम नहीं माना जाता| धारणा यह बनी है कि प्राण प्रतिष्ठा का बायकाट करके वह अपनी न्याय यात्रा पर निकल गए| सारी कांग्रेस उनकी यात्रा को सफल बनाने में लग गई, कांग्रेस के भीतर धारणा यह बनी कि प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का बायकाट करना है|

कांग्रेस को अपनी गलती का एहसास राहुल गांधी की यात्रा शुरू होने के बाद हुआ| इसलिए 14 जनवरी को यह कार्यक्रम बनाया गया कि राहुल गांधी 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा समारोह के समय यात्रा मार्ग में पड़ने वाले श्रीमंत शंकरदेव की जन्मस्थली में दर्शन करने जाएंगे| श्रीमंत शंकरदेव पन्द्रहवीं शताब्दी के समाज सुधारक वैष्णव मत के प्रचारक संत थे|

राहुल गांधी के सलाहकार जयराम रमेश ने कहा कि उन्होंने यह प्रोग्राम इसलिए बनाया था, ताकि लोग यह न कहें कि राहुल गांधी नौगाँव से गुजर रहे थे, लेकिन असम में अत्याधिक सम्मानित वैष्णव मत के प्रवर्तक और समाज सुधारक शंकरदेव के जन्मस्थल पर नहीं गए| श्रीमंत शंकरदेव जन्मस्थल मन्दिर की मैनेजिंग कमेटी ने 21 जनवरी को राहुल गांधी को सूचित कर दिया था कि श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा के कारण सुबह वहां दस हजार से ज्यादा लोग जमा होंगे, इसलिए वह 3 बजे के बाद आएं|

इस पर राहुल गांधी आग बबूला होकर धरने पर बैठ गए| राहुल गांधी और जयराम रमेश को इसमें भी असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा की साजिश नजर आने लगी| उन्होंने कहा कि हमें मन्दिर से न्योता मिला था, लेकिन पुलिस उन्हें जाने नहीं दे रही| जबकि यह बिलकुल गलत है, मन्दिर ने उन्हें कोई न्योता नहीं दिया था|

प्राण प्रतिष्ठा के बायकाट से हुए नुकसान की भरपाई के लिए वह ठीक उसी समय मन्दिर में दर्शन करने जाना चाहते थे| राहुल गांधी ने यह भी कहा आज शायद एक ही व्यक्ति को मन्दिर जाने की इजाजत है| उनका इशारा रामजन्मभूमि मन्दिर में उस समय प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे नरेंद्र मोदी की ओर इशारा था, जहां देश के हजारों गणमान्य व्यक्ति मन्दिर दर्शन करने पहुंचे हुए थे|

कांग्रेस के मौजूदा अपरिपक्व नेतृत्व के गलत फैसले के कारण कांग्रेस की यह स्थिति पैदा हुई कि उन्हें प्राण प्रतिष्ठा के बायकाट की भरपाई के लिए रास्ते का मन्दिर ढूंढना पड़ा| जैसे देश भर से हर क्षेत्र के गणमान्य लोग प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में पहुंचे, उसका चुनावों पर असर पड़ने की पूरी संभावना है| जिसका सर्वाधिक असर भाजपा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र में पड़ेगा, जहां भाजपा इंडी गठबंधन के मुकाबले खुद को कमजोर पा रही है|

22 जनवरी को जो वातावरण बना है, उसे चुनाव तक बनाए रखने के लिए भाजपा 24 जनवरी से श्रीराम जन्मभूमि दर्शन अभियान शुरू कर रही है| भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के 24 जनवरी को रामलला के दर्शन से अभियान की शुरुआत होगी, जो आने वाले दो महीनों तक चलेगा|

देश भर से लोगों को रामलला के दर्शन करवाने के लिए लाया जाएगा, जिसके लिए भाजपा ने 20 हजार लोगों को रोज रुकवाने की व्यवस्था कर ली है| क्योंकि दर्शनार्थी देश भर से आएँगे, इसलिए सभी प्रदेशों से 200 से ज्यादा कार्यकर्ता उन्हीं की भाषा में उनका स्वागत और संवाद करने के लिए दो महीनों तक अयोध्या में तैनात रहेंगे|

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने 11 दिन के व्रत के दौरान चार दिन तक दक्षिण भारत के मन्दिरों में पूजा पाठ करके दक्षिण में भी भाजपा के लिए अलख जगाने का काम किया है| इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के निर्माण को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है, और करेगी भी|

कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों को भाजपा के तीनों पुराने मुद्दों के विरोध का खामियाजा 2024 में भुगतना पड़ेगा| इन पांच वर्षों में भाजपा ने तीन में से दो मुद्दे पूरे कर दिए हैं| इन्हीं पांच सालों में कश्मीर से 370 भी खत्म हो गई और श्रीराम जन्मभूमि पर रामलला का मन्दिर भी बन गया|

अब कांग्रेस या विपक्षी दल कितना भी कहें कि रामजन्मभूमि मन्दिर तो कोर्ट के फैसले से बना है, कांग्रेस के ही नेता आचार्य प्रमोद कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री न होते, तो श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर नहीं बनता| और यही आम हिन्दुओं की धारणा भी है| उद्धव ठाकरे को भी महाराष्ट्र में चुनावी असर का आभास है, इसलिए उनकी पार्टी यह भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है कि मन्दिर उस स्थान पर नहीं, उससे चार किलोमीटर दूर बना है|

बिहार में हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में कहा गया है श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के कारण भाजपा को छह प्रतिशत वोट ज्यादा मिल सकता है| अगर बिहार जैसे जाति आधारित राजनीति वाले प्रदेश में इतना असर पड़ सकता है, तो बाकी प्रदेशों में उससे भी ज्यादा असर की संभावना बनती है, जो विपक्ष के लिए बहुत ही घातक साबित होगी|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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