भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास में वीर सावरकर का योगदान
वर्ष 1906 में ब्रिटिश सरकार की कुख्यात बंगाल विभाजन योजना के विरुद्ध उस दौर के नेताओं के मन में भारतीय ध्वज बनाने की एक कल्पना सूझी। ध्वज के माध्यम से उन्हें प्रत्येक भारतीय नागरिक में राष्ट्रीय चेतना और संगठित होने की भावना को फिर से जागृत करना था। हालाँकि, इससे पहले भी भारत में कई प्रकार के ध्वज प्रचलन में थे, जिसमें सबसे प्रमुख केसरिया रंग का ध्वज है। मगर, इस बार भारतीय नेताओं ने तात्कालिक परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए सभी धर्मों, सम्प्रदायों और पंथों को एकजुट करने के उद्देश्य से एक नए प्रकार के ध्वज पर विचार किया जो कि ब्रिटिश औपनिवेशवाद से लड़ने का प्रतीक बन जाए।

बंगाल विभाजन भारत को पूर्णतः सांप्रदायिक रूप से तोड़ने की योजना थी। ब्रिटिश सरकार ने तुष्टिकरण के लिए एक अलग मुस्लिम बहुल प्रान्त बनाने का निर्णय लिया था लेकिन सुरेंद्रनाथ बैनर्जी अपनी पुस्तक 'ए नेशन इन मेकिंग बंगाल' में लिखते है कि तब बंगाल में एकता का अभाव था। इसलिए एक ऐसे ध्वज की कल्पना की गयी जिसमें सभी भारतीयों का प्रतिनिधित्व शामिल हो जाए।
यह ध्यान में रखते हुए भारत के पहले तिरंगे ध्वज का निर्माण किया गया, जिसके सबसे ऊपर लाल रंग की एक पट्टी पर आठ खिलते कमल के चिह्न, बीच की पट्टी में पीले रंग पर देवनागरी लिपि में बंदेमातरम लिखा गया और अंत में हरा रंग, जिसके बायीं तरफ सूर्य और दायी तरफ चंद्रमा अंकित था। इस ध्वज के निर्माता, सुरेंद्रनाथ बैनर्जी के सहयोगी एवं क्रांतिकारी, सचिन्द्रप्रसाद घोष और सुकुमार मित्र थे।
ब्रिटिश सरकार ने 20 अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन की तारीख तय की थी। अतः सरकार के खिलाफ भारत के पहले ध्वज को फहराने का इससे अच्छा और कोई दिन नहीं हो सकता था। इसलिए सुरेंद्रनाथ बैनर्जी द्वारा यह ध्वज बंगाल स्थित यूनिवर्सिटी साइंस कॉलेज में सर्वप्रथम फहराया गया।
इस ध्वज को अखिल भारतीय कांग्रेस के 1907 में आयोजित कलकत्ता अधिवेशन में भी प्रदर्शित किया गया था। कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता दादाभाई नैरोजी कर रहे थे लेकिन अधिकारिक रूप से कांग्रेस ने इस ध्वज को स्वीकार नहीं किया था। यानि इसे वहां फहराया नहीं गया था। बंगाल विभाजन के विरुद्ध देशभर में आक्रोश अपने चरम पर था, और दूसरी ओर उसी वक्त कांग्रेस का अधिवेशन भी बंगाल में हुआ, तो कांग्रेस ने ध्वज को मात्र प्रदर्शनी के लिए स्थान दिया था।
इसी बीच, इस ध्वज की गूंज लंदन स्थित इंडिया हाउस में भी पहुँच गयी। क्रांतिकारी डॉ. भूपेन्द्रनाथ दत्ता अपनी पुस्तक 'भारतेर द्वितीय स्वतंत्रता संग्राम' में कलकत्ता ध्वज के लन्दन पहुँचने की कहानी इस प्रकार लिखते हैं, "बडौदा राज्य की सेना के जनरल माधव राव के क्रांतिकारी भाई, खासी राव सैनिक प्रशिक्षण के लिए स्विट्जरलैंड गए थे। वे अपने साथ कलकत्ता झंडे की एक प्रतिकृति ले गए थे। जिनेवा में उनकी हेमचन्द्र कानूनगो से मुलाकात हुई।"
हेमचन्द्र कानूनगो, वीर सावरकर के सहयोगी थे। वीर सावरकर ने ही उन्हें और पांडुरंग महादेव सेनापति को बम बनाने की प्रक्रिया सीखने के लिए रूस भेजा था। वहां से बम बनाने की तकनीक समझकर यह दोनों 1908 में भारत आये और बंगाल के क्रांतिकारियों को बम बनाने का रुसी तरीका समझाया। इन क्रांतिकारियों में बरिंदर घोस, प्रफुल्ल चक्रवर्ती और नरेन्द्र गुसाई जैसे नाम शामिल थे। क्रांतिकारी होने के साथ-साथ हेमचन्द्र कानूनगो एक अच्छे कलाकार भी थे।
लन्दन में ही कानूनगो ने ध्वज की मूल प्रति इंडिया हाउस में श्यामजी कृष्ण वर्मा और वीर सावरकर को दी थी। वहां महूसस किया गया कि इस ध्वज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलानी चाहिए लेकिन उससे पहले इसमें कुछ बदलाव भी जरुरी समझे गए।
हेमचन्द्र कानूनगो की पुस्तक 'बंगाली बिप्लोब प्रचेस्ता' के अनुसार सुरेंद्रनाथ बैनर्जी द्वारा कलकत्ता में फहराए ध्वज की पहली पट्टी के लाल रंग, कमल, बंदेमातरम, सूर्य और चंद्रमा को यथास्थान पर रखा गया था। बाकि नए ध्वज में पीले और हरे रंग की पट्टी के स्थान पर क्रमशः केसरिया और नीले रंग को अपनाया गया। बिनॉय जीबन घोष 'रिवोल्ट ऑफ 1905 इन बंगाल' के अनुसार इस ध्वज को पेरिस में रह रहे एक क्रांतिकारी हेमचन्द्र कानूनगो ने बनाया था। जबकि धनंजय कीर अपनी पुस्तक 'वीर सावरकर' में लिखते है, "ध्वज के रचनाकार वीर सावरकर थे।"
इस सन्दर्भ की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा है, "मैडम कामा को वीर सावरकार ने ही क्रन्तिकारी सरदार सिंह राणा के साथ जर्मनी के एक शहर स्टुटगार्ट में 22 अगस्त 1907 को आयोजित इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस में हिस्सा लेने भेजा था।"
यह सर्वविदित है कि मैडम कामा को उनकी ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के चलते भारत से निर्वासित किया हुआ था। जिसके बाद वे यूरोप में चली गयी और वहां की ब्रिटिश-विरोधी संस्थाओं, विशेषकर इंडिया हाउस से जुड़ गयी। यहाँ आकर उनकी मुलाकात वीर सावरकार से हुई और वे वीर सावरकर द्वारा स्थापित क्रांतिकारियों की गुप्त संस्था - अभिनव भारत की भी सदस्य बन गयी थी। उन्होंने ही भारत की स्वाधीनता के प्रतीक के रूप में इंडिया हाउस में तैयार किये गए ध्वज को सर्वप्रथम फहराया था।
ध्वज फहराने के साथ-साथ उन्होंने एक भाषण देते हुए कहा था, "भारत में ब्रिटिश शासन की मौजूदगी एकदम विनाशकारी और भारतीयों के अपने हितों के लिए अत्यंत हानिकारक है। दुनियाभर में स्वतंत्रता प्रेमियों को इस उत्पीड़ित देश में रहने वाली मानव जाति के पांचवें हिस्से को दासता से मुक्ति दिलाने में सहयोग करना चाहिए।"
कानूनगों और कीर दोनों के तथ्यों के केंद्रबिंदु में वीर सावरकर आते है। मैडम कामा के वीर सावरकर से संपर्क और ध्वज की संरचना की स्पष्ट विवेचना धनजंय कीर ने अपनी पुस्तक में लिखी है। जबकि जीबन घोष ने कानूनगो को आगे रख वीर सावरकर के अप्रत्यक्ष योगदान का विश्लेषण किया है।
इतिहास की पुस्तकों में वीर सावरकर द्वारा भारतीय स्वाधीनता के इस अभूतपूर्व प्रयास को बहुत कम वर्णित किया गया है। इसके अलावा, जहाँ भी भारत के इस पहले ध्वज का जिक्र मिलता है, वहां मात्र यह कह दिया जाता है कि 'इंग्लैण्ड एवं फ्रांस में निर्वासित भारतीयों के मस्तिष्क में भारतीय ध्वज की कल्पना सर्वप्रथम 1906 में आई थी'। यानि एक प्रकार से वीर सावरकर का नाम जानबूझकर छुपाया गया। जबकि यह सब जानते है कि उस दौर में इंग्लैण्ड और फ्रांस में निर्वासित भारतीयों अथवा क्रांतिकारियों का नेतृत्व पहले श्यामजी कृष्ण वर्मा और उनके बाद वीर सावरकर कर रहे थे।
मैडम कामा द्वारा बर्लिन में फहराए ध्वज से वीर सावरकर हमेशा जुड़े रहे।
उन्होंने कभी उसकी समृतियों को ओझल नहीं होने दिया। इस ध्वज की मूल प्रति मैडम कामा ने अपने पास सुरक्षित रखी थी। वर्ष 1936 में अपने निधन से पहले उन्होंने इस मूल प्रति को अपने सहयोगी माधव राव को सौंप दिया। बाद में उसे इन्द्रलाल याग्निक अन्य क्रन्तिकारी दस्तावेजों के साथ भारत ले आये।
वर्ष 1937 में वीर सावरकर ने रत्नागिरी में नजरबंदी से रिहा होने के बाद सबसे पहले इंडिया हाउस के इसी तीन रंगों वाले मूल ध्वज (तिरंगा) को रत्नागिरी पॉलिटिकल कांफ्रेंस में फहराया था। इसी ध्वज को एक बार फिर उन्होंने अक्टूबर 1937 के अंतिम सप्ताह में पूना में फहराया।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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