Gujarat Elections 2022: भाजपा आगे लेकिन क्या कांग्रेस को पछाड़ देंगे केजरीवाल?
Gujarat Elections 2022: चुनाव आयोग ने 16 अक्टूबर को जब केवल हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव की तिथि घोषित की तो उस पर सवाल भी उठे कि गुजरात चुनाव की तिथियां क्यों घोषित नहीं की गयी? हालांकि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, अतः बहुत संभव है कि चुनाव आयोग ने अपने विवेक से काम किया हो, लेकिन इसे कोई मान नहीं रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी सत्ता के अपने दौर को लगातार लंबा करते रहने के लिए सत्तातंत्र का दुरुपयोग कर रही है?

प्रधानमंत्री के रूप में 'अपने' गुजरात को बचाए रखने के लिए नरेंद्र मोदी जिस तेजी के साथ नियमित रूप से हर हफ्ते गुजरात के कल्याण की नई नई योजनाएं लाते जा रहे हैं, उन्हें देखकर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अहमदाबाद में तंज कसा कि नरेंद्र मोदी को गुजरात में अपना एक अस्थायी पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) खोल देना चाहिए। इसीलिए सवाल उठ रहा है कि मतदाताओं को लुभाने के अधिकाधिक अवसर पाने की कोशिश में क्या बीजेपी के आकाओं ने गुजरात में चुनाव के ऐलान में देरी करवाई है?
चुनाव की तारीख भले ही न आई हों लेकिन जमीनी तैयारियां जोरों पर हैं। गुजरात के वर्तमान राजनीतिक फ्रेम में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद अगर किसी तीसरे नेता की तस्वीर दिख रही है, तो वह है अरविंद केजरीवाल।
राहुल गांधी परिदृश्य से पूरी तरह बाहर हैं और उनकी पार्टी के भविष्य के लिए यह कोई सुखद संकेत नहीं है। गुजरात में विरोधी दल के रूप में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस की जगह गुजरात की जनता केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की चर्चा कर रही हैं।
हालांकि, केजरीवाल के इस राजनीतिक उभार की कुछ हद तक चिंता बीजेपी को भी है, लेकिन उसके बड़े नेताओं को विश्वास है कि समय रहते उनसे तो निपट लिया जाएगा, मगर फिलहाल तो गुजरात में आम आदमी पार्टी कांग्रेस को निगल रही है, यह बीजेपी के लिए बड़े संतोष की बात है।
तस्वीर साफ है कि पंजाब से उभर कर गुजरात के बाद देश के हिंदी बेल्ट में आम आदमी पार्टी कांग्रेस के लिए बड़ी आफत बनकर उभरेगी, लेकिन इसकी चिंता कांग्रेस में किसी बड़े नेता के चेहरे पर नहीं दिखती। यह विपक्ष की राजनीति की अगुवाई का सपना पालने वाले देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के लिए सर्वाधिक चिंता का विषय है।
चिंता वाजिब भी है, क्योंकि निर्णयों में देरी के साथ साथ कार्रवाई और कार्यान्वयन के मामले में भी कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है। जिसका सबूत यह है कि गुजरात में बीजेपी ने चुनाव प्रचार अप्रैल महीने में शुरू किया, तो केजरीवाल की पार्टी ने साल की शुरुआत में ही चुनावी दुंदुभी बजा दी थी।
बीजेपी व आम आदमी पार्टी के बहुत बाद 5 सितंबर को राहुल गांधी अहमदाबाद कांग्रेस का प्रचार अभियान लॉन्च करने पहुंचे, लेकिन शुरुआत में ही अडानी और अंबानी के बारे में बहुत कुछ कह गए, जो गुजरात की प्रजा को कतई नहीं सुहाया।
कांग्रेस छोड़कर बीजेपी के नेता बने हार्दिक पटेल कहते हैं कि गुजरात की जनता अडानी और अंबानी जैसे अपने दिग्गज उद्यमियों को गुजरात के गौरव के रूप में देखती है, और उनका अपमान नहीं सह सकती।
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कांग्रेस के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही यह कह दिया हो कि गुजरात में कांग्रेस बहुत ही अदृश्य तरीके से अंदरखाने अपना प्रचार अभियान चला रही है, और भले ही यह कहते हुए कार्यकर्ताओं को सतर्क भी कर दिया हो कि इस चुनाव में कांग्रेस से बहुत सावधान रहने की जरूरत है। लेकिन सन 2017 के पिछले विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी और कांग्रेस की मजबूती से बीजेपी जितनी चिंतित दिख रही थी, इस बार वह कांग्रेस को लेकर उतनी ही निश्चिंत है।
क्योंकि कांग्रेस के अपने ही नेता इस चुनाव से लगभग विमुख हैं, और जो सम्मुख हैं, उनके मुख मंडल पर चुनावी नूर का कोई अक्स नहीं दिखता। वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र सिंह कहते है कि अपने दिग्गज नेता अहमद पटेल का अब इस संसार में न होना भी गुजरात कांग्रेस व कांग्रेसियों की मायूसी का एक बड़ा कारण है।
कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में राहुल गांधी केवल दो बार गुजरात आए और अब जैसा कि उन्होंने कहा है कि वे फिर गुजरात नहीं आ सकेंगे, क्योंकि उनकी भारत जोड़ो यात्रा जारी हैं, सो राहुल के इस रवैये से गुजरात कांग्रेस के नेताओं में हताशा भी वाजिब हैं। हालांकि कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक गहलोत कुल तीन बार गुजरात दौरे पर आकर कुछ सभाएं करके गए हैं, और गुजरात कांग्रेस के प्रभारी रघु शर्मा भी सक्रिय होने की सतत कोशिश कर रहे हैं, लेकिन प्रदेश में निचले स्तर पर भी विधानसभा चुनाव को लेकर कोई खास उत्साह क्यों नहीं दिखता, यह कांग्रेस कार्यकर्ताओं के समक्ष सबसे बड़ा सवाल है।
पिछले विधानसभा चुनाव में 182 सीटों में से 99 पर बीजेपी और कांग्रेस 77 पर जीती थी। इसके अलावा 3 सीटों पर निर्दलीय, 2 पर भारतीय ट्राइबल पार्टी और 1 सीट शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने जीती थी।
लेकिन कांग्रेस के 77 में से कोई बीजेपी में चला गया, तो किसी ने इस्तीफा दे दिया। अब कांग्रेस में केवल 63 विधायक ही बचे हैं, जिनमें से भी कुछ किसी और ठिकाने की उड़ान भरने की फिराक में है, तो कोई हार के डर से चुनाव न लड़ने की कोशिश में। दिख तो रहा है कि बीजेपी सबसे बड़ी ताकत के रूप में अपना स्थान इस बार और मजबूत करेगी, लेकिन राजनीति में जो दिखता है वह होता नहीं, यह बीजेपी भी जानती है।
गुजरात की राजनीति के जानकार मेहुल झाला मानते हैं कि बीजेपी बहुत सधे हुए कदमों से बिसात बिछा रही है, क्योंकि वह जान रही है कि निर्दलीयों व नोटा के कारण भी कई परिणाम बदल जाते हैं, जैसा कि पिछले चुनाव में हुआ था।
2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में अकेले नोटा की वजह से ही गुजरात विधानसभा चुनाव में 31 सीटों के नतीजे पलट गए थे। जिनमें से 12 कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत नोटा की वजह से आसान रही, तो नोटा के दम पर बीजेपी के 17 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की।
इस गणित को समझाते हुए झाला कहते हैं कि अगर नोटा फैक्टर न होता तो कांग्रेस 77 की जगह 82 सीटें जीतने में कामयाब होती, जबकि बीजेपी को 99 के बजाय 94 सीटों से संतोष करना पड़ता। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि पिछली बार कांग्रेस सत्ता में आते आते रह गई, लेकिन इस बार तो वह सीधे तौर पर खेल में ही कमजोर दिख रही है, कांग्रेस के भविष्य के लिए यह कोई सुखद संकेत नहीं है।
उधर, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया गुजरात में लगातार दौरे कर रहे हैं। गुजरात से बाहर दिल्ली में भी में ये लोग गुजरात चुनाव का ही प्रचार कर रहे हैं।
गुजरात में मीडिया जब केजरीवाल से कांग्रेस के बारे में सवाल करता है, तो वे कहते हैं कि कांग्रेस अब खत्म हो गई है, गुजरात में उसके बारे में कोई बात नहीं करता, जनता के मन में भी कांग्रेस को लेकर जब कोई सवाल ही नहीं है, तो आप भी मत कीजिए।
दरअसल, गुजरात में आम आदमी पार्टी का प्रचार अभियान लगभग आठ महीने पहले ही शुरू हो गया था। प्रदेश के सभी बड़े शहरों में हजारों की संख्या में ऑटो रिक्शा पिछले साल से ही आम आदमी पार्टी का प्रचार करते घूम रहे हैं, और केजरीवाल की बातों का गुजरात के लोगों पर सकारात्मक असर भी दिख रहा है।
लेकिन नवसारी के हजारीभाई पुरोहित कहते हैं कि भले ही कमजोर तबके में आम आदमी पार्टी का थोड़ा बहुत असर हो, लेकिन मध्यमवर्ग को केजरीवाल की बातें हवा हवाई ज्यादा लगती है। पुरोहित कहते है कि दक्षिण व उत्तरी गुजरात के आदिवासी इलाकों में भी केजरीवाल प्रचार तो बहुत कर रहे हैं, लेकिन आदिवासी नेता छोटू भाई वसावा की भारतीय ट्राइबल पार्टी से उनका साथ टूटना केजरीवाल के लिए नुकसानदेह लगता है।
बहरहाल, गुजरात विधानसभा चुनाव की राजनीतिक तस्वीर में बीजेपी नंबर वन पर दिख रही है, तो केजरीवाल की पार्टी कांग्रेस से मुख्य विपक्षी दल का दर्जा छीनने के प्रयास में लग रही है, जबकि कांग्रेस जो है, उसे बचाए रखने की कोशिश में खप रही है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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