Himachal Pradesh Election 2022: टिकट बंटवारे के लिए क्यों हुई वोटिंग ? क्या भाजपा की हालत पस्त है ?
Himachal Pradesh Assembly Election 2022: हिमाचल प्रदेश के चुनावी इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी दल ने टिकट बंटवारे के लिए आंतरिक चुनाव कराये। यहां तक कि मतपेटियों का इस्तेमाल हुआ। इन बैलेट बॉक्स को सभी चार संसदीय क्षेत्रों में भेज कर पार्टी नेताओं की राय जानी गयी। ये मतपेटियां हेलीकॉप्टर से ढोयी गयीं।

आखिर इतनी मशक्कत क्यों करनी पड़ी ? जिस दल के पास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसा करिश्माई नेता है उस दल को इतने पापड़ क्यों बेलने पड़े ? हिमाचल प्रदेश में टिकट बंटवारे के लिए भाजपा ने एक नये ट्रेंड की शुरुआत की। क्या भाजपा इसलिए आंतरिक चुनाव के लिए मजबूर हुई क्योंकि उसकी पांव तले जमीन खिसक रही है ? सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा क्यों डरी हुई है ?

सर्वे में भाजपा की हालत ठीक नहीं
हिमाचल प्रदेश की 68 सीटों पर उम्मीदवार तय करने के लिए भाजपा ने वोटिंग करायी। भाजपा पांच साल से सरकार चला रही है और उसे सत्ता विरोधी भावना से जूझना पड़ रहा है। जनता का मन- मिजाज समझने के लिए भाजपा ने तीन सर्वे कराये। लोगों की राय जान कर पार्टी के होश उड़ गये। कई मंत्रियों और विधायकों के कामकाज से लोग नाखुश थे। ऐसे में जिताऊ उम्मीदवारों की तलाश शुरू हो गयी। इनकी पहचान आसान नहीं थी। तब फैसला हुआ कि संगठन के नेताओं से हर सीट के लिए तीन- तीन विकल्प मांगे जाएं। पारदर्शिता और गोपनीयता के लिए मतपेटियों का सहारा लिया गया। लेकिन इतनी कवायद के बाद भी मुश्किल कम नहीं हुई। 68 में से 33 सीटों पर सर्वसम्मत राय नहीं बन सकी। अगर इतनी सीटों पर असमंजस की स्थिति रही तो सत्तारूढ़ पार्टी के लिए यह चिंता की बात है। अब सवाल ये है कि अगर वोटिंग से उम्मीदवार तय किये गये तो क्या असंतोष और गुटबाजी से मुक्ति मिल जाएगी? सीटिंग विधायकों के टिकट कटने, दलबदलुओ को टिकट मिलने से क्या पार्टी में विद्रोह नहीं होगा ? कांग्रेस के दो विधायक और दो निर्दलीय विधायक टिकट के लिए ही भाजपा में शामिल हुए।

जयराम को मोदी का आसरा
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के लिए सबसे बड़ा सहारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही हैं। वे अपनी तमाम मुश्किलों के हल के लिए मोदी मैजिक पर मिर्भर हैं। उत्तर प्रदेश में नरेन्द्र मोदी ने भाजपा को लगातार दूसरी जीत दिला कर इतिहास रचा था। किसान आंदोलन के झटकों से उबर कर योगी आदित्यनाथ दूसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हुए थे। कुछ अपवादों को अगर छोड़ दें तो नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी के लिए जिताऊ चेहरा हैं। महंगाई, बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों के रहते हुए भी वे चुनाव के नैरेटिव को भाजपा की तरफ मोड़ देते हैं। लेकिन ये काम उतना आसान नहीं जितना ऊपर से दिखता है। इसके लिए वे खुद और पार्टी के वरिष्ठ नेता दिन रात मेहनत करते हैं। भाजपा हिमाचल प्रदेश में उत्तर प्रदेश की कामयाबी दोहराना चाहते हैं। कोई परम्परा कभी न कभी टूटती ही है। भाजपा मानती है कि हिमाचल प्रदेश में भी दोबारा सत्ता मुमकिन हो सकती है। इसलिए वह जिताऊ उम्मीदवारों के चयन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाये हुए है। मोदी मैजिक भी तभी कामयाब होगा जब उसके लिए अनुकूल परिस्थतियां हों।

उत्तराखंड में सफल हो चुका है यह प्रयोग
एक अन्य पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में भी इसी साल चुनाव हुआ था। इस चुनाव में भी भाजपा ने सभी सीटों के आंकलन के लिए स्थानीय पार्टी नेताओं की रायशुमारी करायी थी। यह रायशुमारी चुनाव से पहले करायी गयी थी ताकि मौजूदा विधायकों के बारे में समय रहते फीडबैक मिल जाए। यह प्रयोग एक हद तक सफल रहा था क्यों कि भाजपा ने यहां लगातार दूसरी जीत हासिल की। हिमाचल प्रदेश में यह फारमूला कितना सफल होगा अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। भाजपा फिलहाल उन सीटों पर ज्यादा ध्यान दे रही है जहां 2017 में उसे कम वोटों से जीत मिली थी। पिछली बार करीब 18 ऐसी सीटें थीं जहां भाजपा को दो हजार से कम वोटों से जीत मिली थी। इन सीटों पर जनता की हल्की नाखुशी भी नतीजों में फर्क ला सकती है। इसलिए पार्टी सोच समझ कर पर टिकट देना चाहती है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा हिमाचल प्रदेश के रहने वाले हैं। गृह राज्य होने के चलते हिमाचल प्रदेश का विधानसभा चुनाव उनके लिए बहुत अहम है। नरेन्द्र मोदी के साथ साथ उनकी प्रतिष्ठा भी इस चुनाव से जुड़ी हुई है। 2017 में भाजपा ने 44 सीटें जीत कर सरकार बनायी थी। लेकिन मंडी लोकसभा उपचुनाव और तीन विधानसभा उपचुनाव हार जाने से उसे झटका लगा है। सत्ता को बरकरार रखना आसान नहीं है। टिकट बंटवारे के बाद भाजपा की चुनावी रणनीति स्पष्ट हो पाएगी।
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