OneIndia Knowledge: चुनाव आयोग चुनाव चिन्ह कैसे आवंटित करता है ? जानिए
Election symbols in India: महाराष्ट्र में शिवसेना के दोनों गुटों को चुनाव आयोग की ओर से हाल ही में दो नए चुनाव चिन्ह आवंटित किए गए हैं। इसके लिए भारतीय चुनाव आयोग ने एक पूरी प्रक्रिया अपनाई है। चुनाव आयोग ने इसके लिए एक व्यवस्था बना रखी है और उसी के आधार पर चुनाव चिन्हों की 'फ्री' लिस्ट को संशोधित करता है और नई पार्टियों और अन्य उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आवंटित करता है। यह प्रक्रिया पहले चुनाव से ही चली आ रही है। समय-समय पर चुनाव आयोग ने कई तरह के चुनाव चिन्हों को अलग-अलग कारणों से फ्रीज भी कर दिया है।

चुनाव चिन्ह आवंटित करने का अधिकार चुनाव आयोग का है
संसदीय या विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों के चुनाव निशान आवंटन को लेकर एक पूरी प्रक्रिया निर्धारित है। यह प्रक्रिया चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 से संचालित होती है। इस आदेश को लागू करने की जिम्मेदारी भारतीय चुनाव आयोग पर है। चुनाव आयोग ही 'रिजर्व' और 'फ्री' चुनाव चिन्हों की सूची जारी करता है। 'रिजर्व' चुनाव चिन्ह वे होते हैं, जिसका इस्तेमाल मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों द्वारा चुनावों में किया जाता है। जबकि, 'फ्री' चुनाव चिन्ह हर चुनाव में चुनाव आयोग की ओर से पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों को जारी किए जाते हैं।
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'फ्री' लिस्ट में से नए चुनाव चिन्ह किए जाते हैं आवंटित
चाहे कोई भी चुनाव चिन्ह किसी भी पार्टी को आवंटित हो, लेकिन वह चुनाव आयोग की संपत्ति होती है। जब चुनाव आयोग 'फ्री' चुनाव चिन्हों की लिस्ट बनाता है तो उसे बहुत सावधानी रखनी होती है कि उसमें गलती से कोई 'रिजर्व' चिन्ह शामिल ना हो जाए, यानि जो चिन्ह किसी पार्टी को आवंटित है,वह उस लिस्ट में ना चली जाए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव एक पवित्र त्योहार की तरह है। इसलिए, चुनाव चिन्ह का मायने ये है कि यह ऐसा निशान हो, जो निरक्षर से निरक्षर मतदाताओं के भी आसानी से पहचान में आ जाए। अगर चुनाव निशान में उलझन की वजह से एक भी मतदाता ने मतदान करने में चूक कर दी, तो इससे पूरी चुनाव व्यवस्था पर सवाल उठ सकता है। इसीलिए चुनाव आयोग की ओर से ऐसे चुनाव चिन्ह 'फ्री' लिस्ट में रखे जाते हैं, जो पूरी तरह से स्पष्टता के साथ वोटरों के समझ में आ जाएं। किसी भी तरह से मिलते-जुलते ना हों। 23 सितंबर, 2021 को चुनाव आयोग ने चुनाव चिन्हों की जो लिस्ट अपडेट की थी, उसमें कुल 197 'फ्री' चुनाव निशान शामिल थे।

'फ्री' चुनाव चिन्ह भी हो सकता है 'रिजर्व'
अगर किसी नई पार्टी को एक चुनाव में 'फ्री' चुनाव चिन्ह की लिस्ट से एक निशान आवंटित किया जाता है और वह राज्य स्तर पर मान्यता पाने लायक आवश्यक वोट जुटा लेती है तो वह चुनाव चिन्ह संबंधित पार्टी के लिए 'रिजर्व' की जा सकती है। लेकिन, यदि कोई मान्यता प्राप्त दल प्रदेश स्तर की पार्टी का दर्जा खो देती है तो भी उसके 'रिजर्व' चुनाव चिन्ह को कम से कम 6 वर्षों तक दूसरे को आवंटित नहीं किया जाता है। 6 साल बाद ही उस 'रिजर्व' चिन्ह को 'फ्री' घोषित किया जा सकता है। चुनाव आयोग नई पार्टियों को 'फ्री' लिस्ट में से तीन चुनाव चिन्ह चुनने का मौका देता है या लिस्ट से बाहर के निशान का भी सुझाव देने को कह सकता है। हालांकि, आधिकारिक चुनाव चिन्ह आवंटित करने से पहले चुनाव आयोग यह पूरी तरह से तसल्ली कर लेता है कि इससे किसी दूसरे चुनाव चिन्ह को लेकर कोई गलतफहमी तो नहीं हो सकती है। और तब जाकर वह उसे आवंटित कर सकता है।

चुनाव आयोग ने कुछ चुनाव चिन्हों पर लगाई है रोक
चुनाव आयोग के सामने चुनाव चिन्ह को लेकर कई बार अजीब स्थिति भी पैदा हुई है और उसे अपनी व्यवस्था सुसंगत बनाने के लिए कुछ सख्त कदम भी उठाने पड़े हैं। जैसे कि 1991 में चुनाव आयोग ने फैसला किया कि वह ऐसा कोई भी चुनाव चिन्ह नहीं आवंटित करेगा, जिसमें किसी पशु या पक्षी दिखाई गई हो। क्योंकि, इलेक्शन कमीशन को शिकायत मिली थी कि चुनाव निशान होने की वजह से चुनाव प्रचार के समय विरोधी पक्ष वालों ने कुछ पक्षियों को प्रताड़ित किया था। इसलिए चुनाव आयोग ने मार्च,1991 से कबूतर,चील, घोड़ा, जेबरा, बकरी और मछली को इस लिस्ट से ही हटा दिया। इसी तरह 2005 में चुनाव आयोग ने धार्मिक या सांप्रदायिक आधार पर पार्टियों के नामों का आवंटन करना बंद कर दिया। इसी आधार पर चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र में शिवसेना के गुटों को 'त्रिशूल' और 'गदा' आवंटित नहीं किए, क्योंकि ये धार्मिक प्रतीक चिन्ह हैं।

कुछ दलों ने 'रिजर्व' चुनाव चिन्ह सौंपने की नहीं मानी बात
चुनाव आयोग ने उन दलों से भी गुजारिश की थी जिनके रिजर्व चुनाव चिन्ह में जानवरों के प्रतीक हैं, वह खुद से उसे सरेंडर कर दें। ताकि, आयोग उनको विश्वास में लेकर उन्हें फ्री चुनाव चिन्ह में से कोई दूसरा निशान आवंटित कर सके। फॉर्वर्ड ब्लॉक (शेर चुनाव चिन्ह) और मिजो नेशनल फ्रंट (बाघ चुनाव चिन्ह) ने आयोग के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। लेकिन, बीएसपी, एजीपी सिक्किम संग्राम परिषद (सबके चुनाव चिन्ह में हाथी) और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रैटिक पार्टी (चुनाव चिन्ह शेर) ने आयोग के अनुरोध को इस आधार पर ठुकरा दिया कि ये सारे बड़े जानवर हैं, जिन्हें प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।

रिजर्व चुनाव चिन्ह ऐसी स्थिति में हो सकता है फ्री
रिजर्व चुनाव चिन्ह होने का मतलब है कि वह निशान किसी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या प्रादेशिक पार्टियों को आवंटित है। यदि किसी पार्टी को राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है, तो वह उस राज्य से बाहर दूसरे राज्य में भी जहां उसे मान्यता नहीं मिली हुई है, अपने रिजर्व चुनाव निशान का इस्तेमाल कर सकती है। यानि उस निशान पर दूसरे राज्य में भी उसका पहला अधिकार बनेगा। इसलिए दूसरे राज्य में मान्यता प्राप्त दलों के चुनाव निशान भी दूसरी पार्टियों के उम्मीदवारों को अन्य राज्य में आवंटित नहीं किए जाते हैं। यहां यह भी स्पष्ट करना है कि 'रिजर्व' चुनाव चिन्ह पर किसी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दल का तभी तक अधिकार रहता है, जबतक वह उसे मिली मान्यता की शर्तें पूरी करते हैं। अगर राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दलों की मान्यता रद्द होती है तो निश्चित समय के बाद वह चुनाव चिन्ह भी 'फ्री' की लिस्ट में शामिल किया जा सकता है।

चुनाव चिन्ह के लिए किस तरह की चीजें चुनी जाती हैं ?
चुनाव आयोग 'फ्री' चुनाव चिन्ह की लिस्ट में वैसे प्रतीकों को शामिल करता है, जिसकी पहचान किसी के लिए आसान हो और वोटर बैलट पेपर पर या इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में उससे चुनने में किसी भी तरह से धोखा ना खाने पाए। नई पार्टियों, गैर-मान्यता प्राप्त दलों और निर्दलीय या स्वतंत्र उम्मीदवारों को 'फ्री' चुनाव चिन्ह की लिस्ट में अपनी पसंद का निशान चुनने का मौका मिल सकता है या फिर वह अपनी ओर से तीन ऐसे निशान सुझा सकते हैं, जो रिजर्व या फ्री दोनों में से किसी में भी शामिल ना हों या किसी भी चिन्ह से जरा भी मिलते-जुलते ना दिखाई देते हों।

राजनीतिक दल रिजर्व चुनाव चिन्ह में बदलाव की मांग कर सकते हैं ?
भारत की दोनों बड़े राष्ट्रीय दलों के नाम और निशान में कई बार बदलाव देखने को मिले हैं। 1952 के चुनाव से लेकर 1969 तक कांग्रेस का चुनाव चिन्ह 'जोड़ा बैल' होता था। जब, इंदिरा गांधी ने अपनी अलग कांग्रेस बनाई तो उसका निशान 'गाय और बछड़ा' हो गया। जबकि, इसके बाद भी 'असली' कांग्रेस का चुनाव निशान 'जोड़ा बैल' ही चलता रहा। कई बदलावों, विलय और विघटन के बाद आज जो कांग्रेस पार्टी कहलाती है, उसने 'हथेली' को चुनाव निशान के तौर पर पहली बार आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव से इस्तेमाल करना शुरू किया था। इसी तरह भारतीय जन संघ का 1951 से लेकर 1977 तक 'दीपक' चुनाव निशान रहा। लेकिन, 1977 में जब भारतीय जन संघ और जनता पार्टी का विलय हो गया तो चुनाव चिन्ह बदलकर 'हल जोतता किसान' हो गया। भारतीय जन संघ के सदस्यों से ही बनी भारतीय जनता पार्टी को मौजूदा 'कमल' निशान 1980 में आवंटित हुआ था।
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