गठबंधन सरकार और मजबूत विपक्ष के कारण हंगामेदार होगा नयी लोकसभा का सत्र
Loksabha Budget Satra: सरकार गठन के बाद अब सारा ध्यान संसद के सत्र पर है। नेताओं के साथ साथ आम मतदाताओं की भी रुचि यह देखने में है कि 10 साल बाद एक मजबूत विपक्ष की उपस्थिति में पीएम नरेंद्र मोदी किस तरह का प्रदर्शन करते हैं। वैसे पहले परंपरा के अनुसार 8 दिनों का विशेष संसदीय सत्र आहूत होगा, जिसमें लोक सभा अध्यक्ष का चुनाव के साथ नए सांसदों को शपथ दिलाया जाएगा।
नया संसद सत्र 24 जून को बुलाए जाने की उम्मीद है। लोकसभा में सबसे वरिष्ठ सांसद को अंतरिम अध्यक्ष बनाए जाने की परंपरा है, और वही नए लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव कराते हैं। 26 जून को संभवतः लोकसभा के स्पीकर का चुनाव होगा और यहीं से सत्ता और विपक्ष के बीच शह मात का खेल भी शुरू हो जाएगा। इसके बाद पूर्ण बजट सत्र बुलाया जाएगा, जिसकी तारीख अभी सामने नहीं आई है।

यह 18वीं लोकसभा मोदी सरकार और विपक्ष दोनों के लिए अग्नि परीक्षा वाली होगी। सरकार के लिए पहली चुनौती ही सफलता पूर्वक पूर्ण बजट पेश करने की होगी। सिर्फ विपक्ष का दवाब नहीं होगा, बल्कि अपने सहयोगी दलों को भी संतुष्ट करना पड़ेगा। भले ही एनडीए के बैनर तले सभी सहयोगी दलों ने चुनाव लड़े हों, लेकिन सबकी विचारधारा अलग है और उनके आर्थिक व सामाजिक सरोकार भी एक जैसे नहीं हैं।
इसलिए यह बजट सिर्फ केंद्र सरकार की योजनाओं, प्राप्तियों और व्ययों का विस्तार नहीं होगा, बल्कि एनडीए के घटक अपने अपने आर्थिक एजेंडे को भी इसमें देखना चाहेंगे। जहां तक बीजेपी के मंत्रियों और प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात है तो वे इस बजट में भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने और फिर 2047 तक देश को 'विकसित भारत' में बदलने का रोड मैप प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगे और उसी के अनुरूप सुधारों की घोषणा भी करना चाहेंगे।
पीएम मोदी की इस तीसरी सरकार के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि अर्थव्यवस्था पहले से ही मजबूत स्थिति में है। इसलिए इसमें और तेजी लाने के प्रयास बढ़ाने के लिए कदम बढ़ाना आसान होगा। हाल ही में आरबीआई ने ग्रामीण मांग में सुधार और मुद्रास्फीति में कमी की रिपोर्ट जारी की है और यह आंकड़ा भी दिया है कि चालू वित्त वर्ष में जीडीपी के 7.2 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2024 के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपये का अब तक का सबसे अधिक लाभांश भी घोषित किया है। लेकिन सारी तस्वीरें गुलाबी ही नहीं हैं।
चुनाव में बीजेपी और पीएम मोदी को किसानों की दयनीय हालत, रोजगार सृजन में कमी और पूंजीगत व्यय की गति गिरने पर काफी कुछ सुनना पड़ा था, और इसी बजट में इन मुद्दों पर सुधार करना आवश्यक होगा। खास कर तब, जब महाराष्ट्र, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में अगले कुछ महीनों में ही चुनाव होने वाले हैं। इसलिए इस बजट में राजद की नौकरी के नारे के बराबर कोई स्कीम लाने का दवाब नीतीश कुमार जरूर डालेंगे। पर वित्त मंत्रालय की यह बात भी जरूर सुनी जाएगी कि कोई चुनावी वायदा इस तरह ना पूरा किया जाए कि राजकोषीय घाटा लक्ष्य के बाहर चला जाए। राजस्व वृद्धि के अनुपात में व्यय का समायोजन करने की पूरी कोशिश की जाएगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी इस तीसरी सरकार के गठन से पहले ही 100-दिवसीय एजेंडे बना लिए थे। अब उनको लागू करने के लिए बजट में प्रावधान जरूर किये जाएंगे। करों में सुधार, बुनियादी ढांचे का विकास, डिजिटल नवाचार और बेहतर शासन व्यवस्था के लिए केंद्रीय बजट में आवश्यक धन का इंतजाम जरूर किया जाएगा। पीएम मोदी की बातों से लगता है कि बजट में निजी निवेश को प्रोत्साहन और रोजगार बढ़ाने के लिए निर्माण उद्योग को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलेगी। जीएसटी दरों को युक्तिसंगत बनाना भी एक बड़ा काम होगा। पर बात केवल कुछ योजनाओं में बदल या कुछ अतिरिक्त संसाधनों के आवंटन तक सीमित नहीं है।
एनडीए के घटक दल कुछ बड़ा करने की भी अपेक्षा रखते हैं, जिसका राष्ट्रीय फलक पर महत्व है और ऐसा हुआ तो उनका नाम हमेशा के लिए उससे जुड़ सकता है। नई सरकार के गठन के पहले ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वन नेशन वन टैरिफ की बड़ी मांग कर दी है। यानी नीतीश कुमार चाहते हैं कि पूरे देश में बिजली दर एक हो जाए। क्योंकि इस पर बड़ी राजनीति होती रही है और कुछ छोटे राज्यों की सरकारें बिजली दर पर सब्सिडी देकर राजनीतिक वाहवाही लूटती रही हैं।
इस समय बिजली शुल्क राज्यों में अलग-अलग हैं, क्योंकि राज्यों को केंद्रीय फीडर से उपभोग के अनुसार महंगी बिजली खरीदनी पड़ती है और उपभोक्ताओं को कम दर पर देनी पड़ती है। इस कारण राज्य के खजाने पर बड़ा बोझ पड़ रहा है। फिर इसी बजट में पीएम मोदी के सामने यह भी मांग रखी गई है कि बिहार को विशेष श्रेणी का दर्जा देते हुए बजट से अधिक व्यय आवंटन किया जाए। यही नहीं बिहार को औद्योगिक राज्य बनाने के लिए भी पीएम मोदी पर दवाब होगा, चुनाव के दौरान चीनी मिल चालू करने, किसी खास उत्पाद के लिए बिहार में विशेष औद्योगिक क्षेत्र बनाने और ढांचागत परियोजनाओं का विस्तार करने की भी मांग है।
आंध्रप्रदेश इस समय कर्ज में डूबा हुआ है। 2019 से 2023 तक इसका कर्ज 80 प्रतिशत बढ़ा है। पिछले 3 वर्षों में आंध्र की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ढह गई है। कई कंपनियां पिछली सरकार से परेशान होकर आंध्रप्रदेश से भाग गईं। अब चंद्रबाबू नायडू सत्ता संभाल चुके हैं और बीजेपी के बाद एनडीए के सबसे बड़े घटक हैं। उनकी जिम्मेदारी है कि आंध्र प्रदेश को वित्तीय संकट से उबारें और इसके लिए उन्हें पीएम मोदी का साथ चाहिए।
यह आंध्र और चंद्रबाबू नायडू के लिए सुखद संयोग है कि उन्हें केंद्र से चिरौरी नहीं करनी पड़ेगी, क्योंकि वह जानते हैं कि एनडीए को समर्थन देने की कीमत उन्हें आसानी से मिल सकती है। वैसे एक नेता और मुख्यमंत्री के रूप में उनका पीछे का कार्यकाल ऐसा रहा है, जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि पीएम मोदी की सोच इनकी सोच से खूब मिलती है। जैसे बाबू ने ही आंध्र प्रदेश में 24 घंटे ऊर्जा वितरण का वायदा पूरा किया, उन्होंने ही पहली बार भारत में कागज मुक्त ई-कैबिनेट की रूप रेखा बनाई। चंद्रबाबू नायडू ने कृषि और उससे जुड़े व्यवसाय को लाभदायक बनाने के लिए डॉ. कलाम के साथ मिलकर प्राथमिक मिशन शुरू किया, आंध्र प्रदेश में निजी निवेश को आकर्षित करने का सफल कार्यक्रम चलाया। आंध्र प्रदेश में प्रत्येक परिवार में कम से कम एक उद्यमी होने के आदर्श वाक्य का भी श्रीगणेश किया।
जाहिर है चंद्रबाबू नायडू को केंद्र सरकार से बहुत सी उम्मीदें होंगी। वह भी पीएम मोदी से आंध्र प्रदेश के लिए विशेष दर्जा मांग सकते हैं। नायडू निजी निवेशकों को वापस आंध्रप्रदेश लाने के लिए कई प्रकार की छूट देना चाहते हैं, ऐसा वह विशेष राज्य के नाते ही कर सकते हैं। वह फिर से आंध्र को तकनीकी केंद्र के रूप में विकसित करना चाहते हैं। इतनी सारी सहयोगी दलों की उम्मीदों और विपक्ष के आरोपों के दबाव के बाद पीएम मोदी के नेतृत्व वाली इस सरकार का पहला बजट किस तरह का होगा, इसका इंतजार पूरी दुनिया कर रही है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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