Dharma Yuddh vs Jihad: भगवतगीता के धर्मयुद्ध की कुरान के जिहाद से बेतुकी तुलना

Dharma Yuddh vs Jihad: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और देश के पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने भगवतगीता में वर्णित कृष्ण की शिक्षाओं की तुलना इस्लामिक जिहाद से की है।

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कांग्रेस की एक वरिष्ठ नेता मोहसिना किदवई की आत्मकथा के विमोचन के मौके पर बोलते हुए शिवराज पाटिल ने कहा है कि "भगवतगीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से जिहाद की बात ही कर रहे हैं। उन्होंने (कृष्ण ने) गीता में लिखा है कि मैं यहां सिर्फ शांति के लिए नहीं आया हूं। मैं तलवार के लिए भी आया हूं।"

शिवराज पाटिल द्वारा गीता में "कृष्ण के उपदेश की इस्लाम के जिहाद से तुलना" वाला दो मिनट का वीडियो एक न्यूज एजंसी ने जारी किया है। इस वीडियो में वो ये बताते हैं कि इस्लाम के जिहाद के बारे में बहुत बात होती है। लेकिन भगवतगीता में कृष्ण भी अर्जुन को ऐसे ही जिहाद की बात करते हैं।

शिवराज पाटिल के बयान का कुल मतलब इतना है कि अगर कोई आपके समझाने से नहीं समझता है तो तलवार उठानी पड़ती है। यही बात कृष्ण ने गीता में कही है और यही बात इस्लाम में जिहाद है।

उनके इस बयान से इतना तो तय है कि शिवराज पाटिल न तो कृष्ण के धर्मयुद्ध का मर्म समझते हैं और न ही इस्लाम के जिहाद का। वह जो बोल रहे हैं यही बात कुछ समय पहले तक जाकिर नाईक बोलता था जिसके वीडियो आज भी यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं। ऐसा लगता है इस तुलना के लिए शिवराज पाटिल ने गीता पढने की बजाय जाकिर नाईक की तकरीर सुन ली है।

सबसे बुनियादी बात यह समझने वाली है कि इस्लाम अपने मूल में कोई धर्म नहीं है। वह एक संगठन है और उस संगठन की अपनी एक व्यवस्था है जिसे मुसलमान 'दीन' कहते हैं।

इस्लाम के बारे में उनके जानकार कभी रिलीजन या धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते। वो सदैव इसके लिए दीन शब्द का इस्तेमाल करते हैं। अरबी के शब्द दीन का अर्थ ही होता है व्यवस्था या सिस्टम।

इस दीन के नियम कायदों की किताब को कुरान कहते हैं। इस्लाम रूपी दीन को माननेवाले जीवन को कैसे जियेंगे इसका विवरण उनकी अपनी किताब कुरान में है। यहां जो बातें अधूरी हैं मुस्लिम समाज उन्हें हदीसों से पूरी कर लेता है।

इस तरह कुरान और हदीस की प्रमुख किताबें 'सही मुस्लिम' और 'सही बुखारी' मुसलमान को मुकम्मल दीन के बारे में जानकारी देती हैं कि उन्हें जीवन कैसे जीना है। उनके जीवन का मकसद क्या है और दुनिया में उनके दोस्त या दुश्मन कौन से लोग हैं।

जिहाद और धर्मयुद्ध धरती के दो विपरीत ध्रुव हैं

इस्लाम की इकलौती किताब कुरान में मुसलमान के लिए मोमिन जबकि गैर मुस्लिमों के लिए काफिर शब्द का प्रयोग किया गया है। कुरान में बार बार इसी काफिर को खत्म करने के लिए कहा गया है।

कुरान की दृष्टि में जिसका अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान नहीं है वह काफिर है। यानि मुसलमानों के अतिरिक्त जो कोई भी है वह इस्लाम के लिए काफिर है। ऐसे काफिरों को खत्म करना यही एक मोमिन के जीवन का मकसद होता है।

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इन काफिरों को ही इस्लाम में गैर मुस्लिम कहा जाता है। इन गैर मुस्लिमों से लड़ने/उन्हें खत्म करने या फिर उन्हें इस्लाम में दाखिल करने के लिए जो मार्ग सुझाया गया है वह जिहाद है।

इस्लामिक जानकार डॉ इसरार अहमद इसे दो बातों से स्पष्ट करते हैं। पहला दिल में ईमान यानी एक अल्लाह और उसके रसूल पर पूरा यकीन और दूसरा 'जिहाद फी सबिलिल्लाह।' यानी अल्लाह के रास्ते में मोमिन का जिहाद।

कुरान में कुल 41 बार जिहाद का उल्लेख आया है और हर बार ये काफिर से लड़ने/उन्हें खत्म करने या इस्लाम में दाखिल करने से संबंधित है। निश्चित रूप से कुरान में जिस जिहाद का उल्लेख हो रहा है उसका उपयोग गैर मुस्लिमों के खिलाफ करना है।

यहां पर इस बात का कोई विचार नहीं है कि वह गैर मुस्लिम अच्छा है या बुरा। वह मानव जाति, प्रकृति की सेवा कर रहा है या उसे नुकसान पहुंचा रहा है। वह धर्म के मानवीय मानदंड पर चल रहा है या अमानवीय अधर्म पर है। इस्लाम के लिए उसका गैर मुस्लिम होना उसके काफिर होने के लिए पर्याप्त है। इस मामले में इस्लामिक शिक्षाएं बिल्कुल स्पष्ट है।

जो गैर मुस्लिम है वह कुछ भी हो, इस्लाम की परिभाषा के अनुसार सिर्फ काफिर होता है। ऐसे काफिरों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष को ही कुरान में जिहाद कहा गया है।

जबकि भगवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को धर्म के लिए शस्त्र उठाने की बात कर रहे हैं। भगवतगीता के तीसरे अध्याय के बीसवें श्लोक में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम्हारे कर्म (युद्ध) का उद्देश्य लोकसंग्रह है। यहां इस श्लोक में "लोकसंग्रहमेवापि" कहा गया है जिसका अर्थ है कि तुम्हें लोक संग्रह करना है। इस लोकसंग्रह को कृष्ण गीता के 7वें और 8वें श्लोक में और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं: परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम। अर्थात क्षात्र धर्म को निभाने के लिए तुम्हें जो धर्मयुद्ध करना है वह अच्छे लोगों की रक्षा तथा बुरे लोगों के विनाश का माध्यम है।

स्वाभाविक है कुरान में अच्छे बुरे की ऐसी कोई परिभाषा नहीं है। वहां मोमिन और काफिर की परिभाषा है जिसका मतलब होता है कि जो इस्लाम के अरबी अल्लाह और उसके पैगंबर पर ईमान लाता है, उनके नाम पर कलमा पढता है वह मोमिन होता है। इसके अलावा जो कोई भी है वह काफिर है। कुरान उसी के खिलाफ जिहाद का हुक्म देता है। इसे ही कुरान 'जिहाद फी सबीलिल्लाह' कहता है जिसका कुरान में 35 बार उल्लेख हुआ है।

स्वाभाविक है कुरान के जिहाद का गीता के धर्मयुद्ध से दूर दूर का कोई नाता नहीं है। ये धरती के दो विपरीत ध्रुव जैसे हैं जिसका कभी जाकिर नाईक तो कभी शिवराज पाटिल जैसे मतिभ्रष्ट लोग बेतुकी तुलना करते हैं।

आतंकवाद को लेकर शिवराज पाटिल का दागदार दामन

धर्मयुद्ध की जिहाद से तुलना करनेवाले शिवराज पाटिल का दामन पहले से दागदार है। 2006 में जब वो देश के गृहमंत्री थे तब उन्हीं की देख रेख में हिन्दू आतंकवाद का प्रोपेगंडा गढ़ने का प्रयास शुरु हुआ था।

उस समय गृह मंत्रालय में अवर सचिव के पद पर तैनात रहे आरवीएस मणि ने कुछ साल पहले 'हिन्दू टेरर' नाम से एक किताब लिखी जिसमें उन्होंने खुलासा किया कि शिवराज पाटिल के गृहमंत्री रहते कैसे हिन्दू आतंकवाद का काल्पनिक डर फैलाने का प्रयास किया गया।

इसमें वो एक घटना का जिक्र करते हैं जब जून 2006 में उन्हें गृहमंत्री के कमरे में बुलाकर हिन्दू आतंकवाद को स्थापित करने में मदद के लिए कहा गया। उस समय गृहमंत्री शिवराज पाटिल के कमरे में दो लोग मौजूद थे जो उनकी मौजूदगी में मणि पर इसका दबाव डाल रहे थे। इसमें एक कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह थे जबकि दूसरे मुंबई एटीएस के चीफ हेमंत करकरे थे।

बतौर गृहमंत्री शिवराज पाटिल के कार्यकाल में हिन्दुओं को आतंकवादी साबित करने का प्रयास शुरु हुआ जो उनके उत्तराधिकारी सुशील शिंदे के कार्यकाल में भी जारी रहा।

यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि उस दौर में देश भर में इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा बम धमाके किये जा रहे थे। इन्हीं के कार्यकाल में सितंबर 2008 में दिल्ली में कई स्थानों पर एकसाथ भीषण बम धमाके हुए थे।

उस समय भी शिवराज पाटिल इतने रिलैक्स थे कि घटनास्थलों पर एक जगह से दूसरी जगह जाने से पहले कपड़े बदलने के लिए घर चले गये थे। इस पर इतना हंगामा हुआ कि उनका इस्तीफा मांगा गया। लेकिन शिवराज पाटिल को सोनिया परिवार का संरक्षण प्राप्त था इसलिए कुछ हुआ नहीं।

दिल्ली में हुए इन बम धमाकों के दो महीने बाद नवंबर में मुंबई पर आतंकी हमला हुआ जिसे 9/11 के रूप में याद किया जाता है। उस समय भी शिवराज पाटिल देश के गृहमंत्री थे। उन्होंने ऐसे भीषण आतंकी हमले से निपटने में ऐसी ढिलाई दिखाई कि उधर मुंबई में जिहाद के लिए आए पाकिस्तानी आतंकी निर्दोष लोगों की जान ले रहे थे और यहां दिल्ली एयरपोर्ट पर एनएसजी के कमांडो मुंबई पहुंचने के लिए एक हवाई जहाज उपलब्ध होने का इंतजार कर रहे थे।

हालांकि इस आतंकी हमले के बाद मनमोहन सिंह द्वारा शिवराज पाटिल से इस्तीफा ले लिया गया लेकिन हिन्दुओं के खिलाफ उनका अघोषित जिहाद आज भी जारी है।

उनसे बेहतर ये बात भला और कौन जानता होगा कि दिल्ली में बम धमाके करनेवाले या फिर मुंबई पर आतंकी हमला करनेवाले आतंकवादी घोषित तौर पर किस जिहाद से प्रेरित थे।

सरकारी दस्तावेजों में ऐसे सभी रिकार्ड मौजूद हैं जहां आतंकियों ने मुंबई हमले को "काफिरों के खिलाफ जिहाद" कहा है। लेकिन ये सब देखने जानने के बाद भी शिवराज पाटिल अगर जिहाद के लिए ये कहते हैं कि "जब समझाने का कोई विकल्प नहीं रह जाता तो तलवार उठानी पड़ती है", वो जिहाद के नाम पर होनेवाले मुंबई हमले जैसी आतंकवादी घटनाओं को जस्टिफाई करने का ही प्रयास करते हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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