क्या लाल बहादुर शास्त्री की हत्या विदेशी एजेंसियों ने करवाई थी?
देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मौत को 56 वर्ष गुजर जाने के बावजूद अभी तक किसी भी सरकार ने कोई जांच नहीं करवाई है। हालांकि देश के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तभी से गरम चली आ रही है कि शास्त्री जी की ताशकंद में हुई मौत स्वाभाविक नहीं थी, बल्कि विदेशी गुप्तचर एजेंसियों ने उनकी निर्ममता पूर्वक हत्या करवाई थी।

हाल ही में इस चर्चा में एक नए आयाम की वृद्धि हुई है। एक अमेरिकी पत्रकार ग्रेगरी डगलस ने अपनी पुस्तक 'कंवर्सेशन विद द क्रो' में अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआईए के एक वरिष्ठ अधिकारी रॉबर्ट क्राउली से हुई बातचीत के आधार पर यह दावा किया है कि उस समय भारत परमाणु बम बनाने का प्रयास कर रहा था, इसलिए इस कार्यक्रम को रोकने के लिए सीआईए ने लाल बहादुर शास्त्री की हत्या करवाई थी। डगलस का दावा है कि रॉबर्ट क्राउली सीआईए की गुप्त और विध्वंसक कार्यवाईयों वाले विभाग के उप प्रमुख थे। इसलिए उनके दावे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस अमेरिकी पत्रकार ने यह भी दावा किया है कि विभिन्न विषयों पर उनकी रॉबर्ट क्राउली से लंबी टेलीफोन वार्ता हुई थी, जिसे उन्होंने रॉबर्ट को बताए बिना रिकॉर्ड किया था। इस पुस्तक में इसी वार्ता को उन्होंने लिपीबद्ध किया है।
हालांकि यह कहना कठिन है कि इस अमेरिकी पत्रकार के दावे में कितना दम है, मगर इसे सिरे से नजरअंदाज करना भी राष्ट्रहित में नहीं कहा जा सकता। इससे पूर्व भी राजनीतिक गलियारों में वर्षों यह चर्चा गरम रही कि ताशकंद में शास्त्रीजी की हत्या के पीछे रूस की बदनाम गुप्तचर एजेंसी केजीबी का हाथ था।
लाल बहादुर शास्त्री के परिवार द्वारा बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद कांग्रेस सरकार ने लाल बहादुर शास्त्री की मौत के रहस्य का पर्दाफाश करने के लिए कभी कोई कदम नहीं उठाया। हालांकि गैर-सरकारी तौर पर इसकी यह सफाई दी गई थी कि इस मामले की जांच करवाने से मित्र देशों के साथ भारत के संबंध खराब हो सकते हैं।
सबसे विचित्र बात यह है कि अमेरिकी पत्रकार की पुस्तक बाजार में उपलब्ध है और इसके संबंध में सोशल मीडिया पर सवाल भी उठाए गए हैं। मगर अजीब बात है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी के नेता ने इस मामले के बारे में चर्चा तक करने की जरूरत नहीं समझी। संसद का अधिवेशन इन दिनों चल रहा है, मगर इसमें भी अभी तक इस संवेदनशील मामले को किसी भी सांसद ने उठाने का प्रयास नहीं किया है। इस खामोशी का कारण आम नागरिक के लिए समझना बेहद कठिन है।
इस संदर्भ में यह बताना भी उल्लेखनीय है कि जनवरी 1966 में हुई ताशकंद वार्ता के समय मैं भी एक पत्रकार के रूप में ताशकंद में ही मौजूद था। हम भारतीय पत्रकारों को इस बैठक को कवर करने के लिए आये पाकिस्तानी पत्रकारों ने यह संकेत जरूर दिया था कि रूस द्वारा भारत पर इस बात के लिए दबाव डाला जा रहा है कि वह पाकिस्तान के उन क्षेत्रों को वापस लौटा दे जिस पर 1965 के युद्ध में भारत के वीर फौजियों ने अपना खून बहाकर कब्जा किया था।
कहा जाता है कि रूस का यह प्रयास था कि वे किसी भी तरह से पाकिस्तान को अमेरिका के खेमे से दूर करके अपने साथ शामिल करे। इसलिए रूसी नेताओं ने पाकिस्तान को उपकृत करने के लिए भारत से उसके क्षेत्रों को वापस करने के लिए निरंतर दबाव डाला था।
10 जनवरी, 1966 को जब हम भारतीय पत्रकारों ने लाल बहादुर शास्त्री से इस संदर्भ में बारीकी से पूछने का प्रयास किया तो उन्होंने यह स्वीकार किया कि यह बात सच है कि रूस द्वारा उन पाकिस्तानी क्षेत्रों को वापस लौटाने के लिए भारत पर दबाव डाला जा रहा है, जिन पर युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों ने कब्जा किया था। उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया था कि वे इन क्षेत्रों को पाकिस्तान को लौटाने के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि इससे भारतीय जनता और सेना का मनोबल गिरेगा।
इसी दौरान उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया था कि उन्होंने जब अपने परिवार से दिल्ली में इस संदर्भ में बातचीत की थी तो उनकी पत्नी और पुत्री ने उन्हें दो टूक शब्दों में यह जानकारी दे दी थी कि इसकी देश में बड़ी जबर्दस्त प्रतिक्रिया सरकार और शास्त्री जी के खिलाफ होगी, जिसको संभाल पाना बेहद मुश्किल होगा।
इस वार्ता के पांच घंटे बाद ही प्रधानमंत्री के सूचना अधिकारी कुलदीप नैयर ने हमें यह दुखद सूचना दी कि शास्त्री जी का निधन हो गया है। बड़ी अजीब बात यह थी कि रूसी सरकार ने शास्त्री जी के शव का पोस्टमार्टम कराए बिना ही जल्दबाजी में एक जहाज में भारत के प्रतिनिधिमंडल और भारतीय पत्रकारों को सवार करके फौरन दिल्ली भिजवा दिया। शास्त्री जी के शव के साथ पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान और रूस के तत्कालीन प्रधानमंत्री कोसीजिन भी दिल्ली चले आए।
लाल बहादुर शास्त्री के परिवारजनों ने तब पत्रकारों को बताया था कि शास्त्री जी का पूरा शरीर नीला और काला पड़ गया है। तब डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने यह संकेत दिया था कि इस तरह की हालत केवल जहर दिए जाने के कारण मृत्यु होने के बाद होती है। स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री के बड़े पुत्र हरिकृष्ण और शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री ने तब पत्रकारों को यह भी जानकारी दी थी कि उन्होंने इंदिरा गांधी और सरकार के अन्य मंत्रियों से यह अनुरोध किया था कि शास्त्री जी के शव का पोस्टमार्टम करवाया जाए। मगर उनके इस अनुरोध की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया और जल्दबाजी में शास्त्री जी का अंतिम संस्कार कर दिया गया।
शास्त्री जी की मौत स्वाभाविक नहीं थी। इसका संदेह कुछ अन्य कारणों से भी होता है। चूंकि मैं उस समय शास्त्री जी के साथ ताशकंद में ही था इसलिए कुछ बातें जानना महत्त्वपूर्ण हैं। आम तौर पर किसी वीआईपी के साथ जो डॉक्टर जाता है उसे उस वीआईपी के साथ वाले कमरे में ही ठहराया जाता है, ताकि वह जरूरत पड़ने पर उस वीआईपी की देखभाल कर सके। मगर रूसी अधिकारियों ने शास्त्री जी को जिस भवन में ठहराया था, उससे 15 किलोमीटर दूर उनके डॉक्टर व अन्य मेडिकल स्टाफ को ठहराया। इसलिए जब शास्त्री जी को दिल का दौरा पड़ा तो कोई भी भारतीय डॉक्टर या चिकित्सा स्टाफ उनकी इलाज के लिए उपलब्ध नहीं था।
शास्त्री जी की मौत के रहस्य में वृद्धि इस बात से भी होती है कि शास्त्री जी अपने साथ एक भारतीय बावर्ची को ले गए थे जो उनके लिए विशेष रूप से शाकाहारी भोजन तैयार करके उन्हें परोसा करता था। 10 जनवरी की रात को रूसी सरकार ने जो राजकीय रात्रि भोज दिया था उसके सभी पकवान रूसी रसोईयों ने बनाए थे। उनमें कुछ शाकाहारी आइटम भी थे, जिन्हें खाने का रूसी नेताओं ने विशेष रूप से शास्त्री जी से आग्रह किया था।
इस घटनाक्रम से भी संदेहात्मक परिस्थितियों का संकेत मिलता है। सबसे अजीब बात यह है कि ताशकंद कांफ्रेंस के लिए रूसी सरकार ने जो प्रबंध किए थे उनसे संबंधित दस्तावेज रूसी सरकार के आर्काइव में उपलब्ध नहीं हैं। तर्क यह दिया जाता है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद इस आर्काइव के गुप्त दस्तावेज नष्ट कर दिए गए थे।
जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार समस्त पुराने दस्तावेज सार्वजनिक करके किसी विशेषज्ञ समिति द्वारा इस बात की जांच करवाए कि ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई थी। क्या वे स्वाभाविक मौत मरे थे या उनकी निर्मम हत्या किसी विदेशी गुप्तचर एजेंसी ने करवाई थी?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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