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इंडिया गेट से: जनता बेबस और सांसद मजबूर, फिर संसद में हंगामे से किसे लाभ होता है?

हालांकि अभी मौक़ा नहीं है फिर भी आर. वेंकटरमन, के.आर. नारायणन और प्रणब मुखर्जी की याद आ गई। इस बीच शंकर दयाल शर्मा, प्रतिभा पाटिल और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भी राष्ट्रपति रहे, लेकिन मैंने वेंकटरमन, नारायणन और प्रणब मुखर्जी का जिक्र इसलिए किया क्योंकि इन तीनों को संसदीय कामकाज और परंपराओं का ज्यादा अनुभव था। इन तीनों ने समय समय पर संसद और विधानसभाओं में होने वाले हंगामों पर खुल कर अपनी राय व्यक्त की। ऐसा नहीं है कि विपक्ष अभी ही ज्यादा हंगामा कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी जब विपक्ष में थी, तब भी पूरा सत्र हंगामें की भेंट चढ़ता रहा है।

Who will benefit from the uproar in Parliament

1997 में आज़ादी की स्वर्ण जयंती के मौके पर संसद का पांच दिन का विशेष सत्र हुआ था। उस सत्र को पहली बार लोकसभा के स्पीकर पी.ए. संगमा ने संबोधित करते हुए कुछ नई परंपराएं शुरू करने का आह्वान किया था। तब लोकसभा की नियमावली में यह जोड़ा गया था कि आसंदी के सामने आकर हंगामा करने वालों और सदन में पोस्टर बैनर लेकर आने वालों को सदन से निलंबित किया जाएगा। संसद के दोनों सदनों में आसंदी के सामने आकर हंगामा करना फिर भी नहीं रूका और पोस्टर बैनर लाने फिर भी बंद नहीं हुए। अब नए लोकसभा स्पीकर ने नई नियमावली बना कर कहा कि संसद के भीतर धरना प्रदर्शन नहीं होगा, तो धरना प्रदर्शन भी जारी है।

मोदी सरकार ने जब नोटबंदी की थी, तब प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति थे। संसद का शीतकालीन सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद छोटा सा कार्यकाल छोड़ कर प्रणब मुखर्जी ताउम्र कांग्रेसी रहे। वह चाहते तो नरेंद्र मोदी के खिलाफ हो रहे हंगामे पर चुप्पी साधे बैठे रहते या जनहित का मुद्दा बता कर मोदी को कटघरे में खडा कर देते। लेकिन उन्होंने बाकायदा संसद में हंगामे पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि संसद की कार्यवाही में बाधा किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है। वह "मजबूत लोकत्रंत्र के लिए चुनाव सुधार"गोष्ठी में बोल रहे थे।

उन्होंने बहुत कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा था कि"लोग संसद में अपना प्रतिनिधि अपनी आवाज बनाकर बोलने के लिए भेजते हैं। सदन चलाने में दिक्कतें पैदा करने और धरने पर बैठने के लिए नहीं भेजते। सदन चलाने में व्यवधान पैदा करने का मतलब है कि आप बहुमत की आवाज को दबा रहे हैं। अल्पमत ही सदन में आसंदी के सामने आता है, नारेबाजी करता है, कार्यवाही को रोकता है और ऐसे हालात पैदा करता है कि अध्यक्ष के पास सदन की कार्यवाही स्थगित करने के सिवा कोई विकल्प नहीं रहता।"संसद में हंगामें से वह इतने खफा थे कि उन्होंने सांसदों से अपील की थी कि भगवान के लिए संसद चलने दें।

मुद्दों को ले कर अपनी आवाज उठाना विपक्षी दलों और सांसदों का अधिकार है। लेकिन राजनीतिक दलों ने सांसदों के निजी अधिकार अब पूरी तरह खत्म कर दिए हैं। संसद में प्रश्नकाल और शुक्रवार को जनहित में बिल पेश करना सांसदों को मिले विशेषाधिकार हैं, राजनीतिक दलों ने इन दोनों विशेषाधिकारों को छीन लिया है। राजनीतिक दल अपने सांसदों को निर्देश दे देते हैं कि आज इस मुद्दे पर सदन नहीं चलने देना। कभी किसी विधानसभा को लेकर हंगामा, कभी किसी नेता पर कोई कानूनी कार्रवाई को ले कर हंगामा। जबकि ये दोनों ही मुद्दे संसद में नहीं उठाने चाहिए।

पार्टी के निर्देश के कारण सांसद बेचारे न तो मंत्रियों से जनहित के सवाल पूछ पाते हैं, न शुक्रवार को जनहित के बिल पेश कर पाते हैं। बिल पेश हो चुके हों तो सालों उस पर चर्चा शुरू नहीं होती। राज्यसभा में जनसंख्या नियन्त्रण पर 2019 में बिल पेश हुआ था, उस पर बहस 2021 में जा कर हुई। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, अपन पिछली बातों को छोड़ भी दें, तो अभी भी क्या हो रहा है। नेशनल हेराल्ड और उसकी अरबों रूपए की संपत्ति पर कब्जा करने के मामले में सोनिया गांधी से ईडी पूछताछ के लिए बुला रही है, तो सदन नहीं चल रहा। जीएसटी का फैसला न सरकार करती है, न संसद करती है, जीएसटी का फैसला सभी राज्यों की काउंसिल करती है। लेकिन सदन नहीं चल रहा।

खुद राज्यों ने जीएसटी काउंसिल में कहा कि उन्हें राजस्व का घाटा हो रहा है, पहले वे खाने पीने की चीजों पर वैट लगा देते थे, अब वैट नहीं है। तब काउंसिल ने ही पैक आटा, दही, लस्सी, पनीर पर जीएसटी लगा दिया और कुछ आईटम पर जीएसटी बढा भी दिया। इसमें कोई शक नहीं कि जीएसटी काउंसिल का यह फैसला गरीब विरोधी है। कहते हैं कि जीएसटी काउंसिल में सर्वसम्मती से फैसले होते हैं।

अगर यह फैसला भी सर्वसम्मति से हुआ है तो कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, टीआरएस, आम आदमी पार्टी और सीपीएम संसद में हंगामा क्यों कर रही हैं? इन दलों के सात वित्त मंत्री जीएसटी काउंसिल में शामिल हैं। हाँ, यह जनता के हित का अति महत्वपूर्ण मुद्दा है, केंद्र सरकार को जीएसटी काउंसिल में स्टैंड लेना चाहिए था। स्टैंड नहीं लिया तो भी उसे सफाई देनी चाहिए। स्टैंड लिया था, तो भी उसे सफाई देनी चाहिए। वरना भ्रम की स्थिति तो बनी रहेगी।

भले ही जीएसटी हटाना या लगाना सरकार और संसद के अधिकार क्षेत्र में नहीं है, लेकिन सदन में बहस करवाने और जीएसटी काउंसिल को सदन की तरफ से सलाह देने में कोई हर्ज नहीं, क्योंकि यह जनहित का मुद्दा है। लेकिन जैसा कि प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि सदन की कार्यवाही थ्री डी पर आधारित होती है, डिबेट यानि बहस, डिसेंट यानि मतभेद और डिसीजन यानि निर्णय। संसद इसी के इर्दगिर्द चलनी चाहिए, उसमें चौथे डी डिस्ट्रपशन जोड़ने की कोई गुंजाइश नहीं।

प्रणब मुखर्जी ने एक बात और कही थी कि डिस्ट्रपशन से विपक्ष का ही नुकसान होता है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या जरूरत है, सत्र के आधे से ज्यादा दिन हंगामें में निकल जाने के बाद कितने ही बिल बिना व्यापक बहस के पास हो रहे हैं। पिछले दिनों चीफ जस्टिस एन.वी. रमन्ना ने इस बात पर अफ़सोस जाहिर किया था कि संसद में ज्यादातर बिल बिना व्यापक बहस के पास हो रहे हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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