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एलिजाबेथ का निधन और कोहिनूर हीरे की भारत वापसी

कोहिनूर हीरे का एक अजीब उतार-चढाव भरा इतिहास रहा है। 8वीं शताब्दी से लेकर आज तक यह कई सम्राटों एवं साम्राज्यों का हिस्सा बना। इसकी विशाल प्राकृतिक बनावट, चमक और अद्भुत तराशी का हर कोई दीवाना था। भारत में तुर्कों के आक्रमण से पहले यह हिन्दू सम्राटों के साम्राज्य की शान हुआ करता था। इन हमलों के दौरान वह कुछ समय के लिए भारत से बाहर रहा लेकिन मुगलों के शासन में यह फिर से इसी देश में लौट आया।

Death of queen elizabeth and return of Kohinoor to India

18 वीं सदी में जब अफगान हमलावरों ने भारत की ओर रुख किया तो यह दुबारा कुछ समय के लिए भारत से बाहर चला गया लेकिन इसकी नियति कुछ सालों बाद इसे फिर से वापस भारत ले आई और यह महाराजा रणजीत सिंह के साम्राज्य का हिस्सा बन गया।
वर्ष 1839 में जब महाराजा रणजीत सिंह अपनी मृत्युशय्या पर लेटे थे और उनके स्वस्थ होने की सभी उम्मीदें समाप्त हो गई, तो एक पुजारी ने उन्हें सुझाव दिया कि महाराजा को कोहिनूर हीरा जगन्नाथ मंदिर को उपहार स्वरुप में दे देना चाहिए।

भूपिंदर सिंह ने किया था दावा

भूपिंदर सिंह ने किया था दावा

3 मई 2016 को राज्यसभा सांसद भूपिंदर सिंह ने दावा किया कि उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह की उस वसीयत को देखा है जिसमें कोहिनूर हीरे को भगवान जगन्नाथ को सौपने की बात कही गयी थी। उन्होंने सदन को बताया कि एक बार गुरुनानक देव जी जगन्नाथ पुरी गए थे और वहां उन्होंने भगवान की आरती की। इसलिए महाराजा कोहिनूर हीरे को जगन्नाथ भगवान को सौंपना चाहते थे।

मगर ऐसा होने से पहले ही महाराजा का निधन हो गया और यह बेशकीमती हीरा उनके उत्तराधिकारियों के पास ही रह गया। कुछ सालों बाद, सिख साम्राज्य पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने कब्ज़ा कर लिया और महाराजा रणजीत सिंह के बेटे दलीप सिंह से षड्यंत्र करके कोहिनूर भी हड़प लिया। जैसा कि इस हीरे का स्वभाव था, वह किसी के पास लम्बे वक्त तक नहीं रुका। अतः कंपनी ने 1850 में इसे लन्दन भेज दिया।

लन्दन में अंग्रेजों ने इस हीरे को एक बार फिर तराशा और उसके वजन को कम करके महारानी विक्टोरिया के ताज में जड़ दिया। इसके बाकी अवशेष कहां है, इसके सन्दर्भ में अगस्त 1997 में लन्दन से प्रकाशित 'संडे टेलीग्राफ' में एक खबर प्रकाशित हुई। जिसके अनुसार महाराजा रणजीत सिंह के बेटे महाराजा दलीप सिंह के ज्यूरिख बैंक के लॉकर में एक बॉक्स रखा है और उसमें कोहिनूर के अवशेष रखे हुए है।

1947 में भारत की स्वाधीनता के बाद इस हीरे को वापस लाने की मांग जोर पकड़ने लगी। प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक सर सीवी रमन ने हीरों के संरचनात्मक रूप पर एक व्याख्यान के दौरान कोहिनूर का जिक्र करते हुए एक बार कहा था कि देश की स्वतंत्रता तब तक पूर्ण नहीं हो सकती जब तक यह हीरा वापस नहीं मिल जाता।

कोहिनूर हीरा कहां है?

कोहिनूर हीरा कहां है?

संविधान सभा (लेजिस्लेटिव) के एक सदस्य बिस्वनाथ दास ने 11 मार्च 1948 को प्रश्न पूछा कि कोहिनूर हीरा कहां है? जवाब जवाहरलाल नेहरू को देना था लेकिन उन्होंने इस प्रश्न को टाल दिया। हालाँकि, कांग्रेस में ऐसे कई नेता थे जो इस मामले को टालना नहीं चाहते थे। जैसे संविधान सभा (लेजिस्लेटिव) में 17 मार्च 1948 की एक चर्चा के दौरान पट्टाभि सीतारमैया इस हीरे सहित सोमनाथ मंदिर के दरवाजे जैसे बहुमूल्य भारतीय खजानों को भारत लाने के पक्ष में थे।

1952 में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के राज्याभिषेक के समय भी भारतीय मीडिया में कोहिनूर के इतिहास और उसे भारत वापस लाने सम्बन्धी खबरें प्रकाशित हुई। मगर नेहरू सरकार के उदासीन रवैये ने इस मामले को अख़बारों तक ही सीमित कर दिया। फिर भी भारत की जनता का कोहिनूर से भावनात्मक सम्बन्ध हमेशा बना रहा और समय-समय पर केंद्र सरकार पर इसे यूनाइटेड किंगडम और महारानी एलिजाबेथ से वापस मांगने का दवाब बनाया जाने लगा। चूँकि अब महारानी एलिजाबेथ का निधन हो गया है और इसकी वापसी की मांग दोहराई जा रही है।

इस हीरे ने भारतीय लोकतांत्रिक सरकारों के भी कई उतार-चढाव देख लिए है। एक जमाने में नेहरू इस मामलें को अनसुना कर दिया करते थे। वही उनकी सरकार में प्राकृतिक संसाधन और वैज्ञानिक अनुसंधान मंत्रालय में राज्यमंत्री केडी मालवीय ने राज्यसभा में 16 दिसंबर 1953 को एक प्रश्न का जवाब देते हुए कहा, "मुझे यह नहीं पता अंग्रेजों से इसे छीना था अथवा नहीं लेकिन यह निश्चित रूप से भारत में नहीं है।" इसके बाद एक समय ऐसा भी आया जब प्रधानमंत्री नेहरू की बेटी इंदिरा गाँधी देश की प्रधानमंत्री थी तो 5 दिसंबर 1980 को विदेश मंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने राज्यसभा में स्वीकार किया कि कोहिनूर हीरा ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स (जवाहरात) का हिस्सा है।

यानि इन वर्षों के अंतराल में कम-से-कम सरकार को यह तो पता चल गया कि कोहिनूर हीरा कहां है। अब बात आती है इसे भारत वापस लाने की तो नेहरू सरकार के समय अरुचि दिखाने की एक प्रथा बन गयी थी। जिसे बाद की सरकारों ने भी अपना लिया। दरअसल, 25 अप्रैल 1955 को शिक्षा मंत्री के संसदीय सचिव के.एल. श्रीमाली ने राज्यसभा को बताया कि हमारी सरकार कोहिनूर को वापस लाने की कोई इच्छुक नहीं है। अगले कुछ सालों तक यही स्थिति बनी रही।

जबरन छिना गया था हीरा

जबरन छिना गया था हीरा

वर्ष 1980 में इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में इस स्थिति में थोडा सा परिवर्तन किया गया और 5 दिसंबर 1980 को विदेश मंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने राज्यसभा को बताया कि सरकार ने कोहिनूर को वापस लाने के लिए वर्तमान में कोई नीतिगत निर्णय नहीं लिया है।

पीवी नरसिम्हाराव के उपरोक्त जवाब से ऐसा आभास होता है कि सरकार कोहिनूर को वापस लाने की इच्छुक तो थी लेकिन उसके पास कोई योजना नहीं थी। अतः संसद के कई सदस्यों ने सरकार पर दवाब बनाना शुरू कर दिया। 22 दिसंबर 1983 को लोकसभा के प्रश्नकाल में इस मुद्दे को जोरशोर से उठाया गया। मगर यहाँ केंद्र सरकार ने इतिहास की जानकारी किये बिना एक बड़ी गलती कर दी। तत्कालीन शिक्षा राज्यमंत्री प्रेम खांडू थुंगन ने लोकसभा को बताया कि कोहिनूर हीरा राजा दलीप सिंह ने ब्रिटेन की महारानी को दिया था। जबकि सच्चाई इसके एकदम विपरीत है। वास्तव में महाराजा से यह हीरा जबरन छिना गया था।

केंद्रीय मंत्री ने अपने वक्तव्य से पहले न तो किसी इतिहासकार की सहायता ली और न ही ऐतिहासिक तथ्यों का कोई उल्लेख किया। बस वे अकेले इस बात को बार-बार बोलते रहे कि यह हीरा महाराजा ने विक्टोरिया को दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी सहित सदन में मौजूद कई सांसदों ने उनके इस बयान की आलोचना की और इसे कार्यवाही से भी हटाने का अनुरोध किया।

इस प्रकार कोहिनूर को वापस भारत लाने के जिन सामूहिक प्रयासों ने थोडा-बहुत जोर पकड़ा वह इसी के साथ यहाँ थम गए। हालाँकि, इस प्रयासों से इतना तो संभव हो गया कि बाद की सरकारों ने ऐसे बेतुके बयान कभी नहीं दिए और न ही कोहिनूर को वापस लाने की कोई अनिच्छा जताई। जैसे 11 मई 1994 को केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री सलमान खुर्शीद ने राज्यसभा को बताया कि सरकार इस प्रश्न को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और यथार्थवादी संभावना के आधार पर देखती है। इसी प्रकार 11 अगस्त 2005 को विदेश राज्यमंत्री राव इन्द्रजीत सिंह ने राज्यसभा में कहा कि सरकार इस मामले का संतोषजनक समाधान प्राप्त करने के तरीके एवं साधन तलाश रही है।

वर्ष 2014 में पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 को आधार बनाते हुए कहा गया कि इसके नियमों के अनुसार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सिर्फ उन्हीं प्राचीन वस्तुओं की वापस प्राप्ति का मुद्दा उठाता है, जिन्हें देश से बाहर अवैध रूप से निर्यात किया गया था। इसलिए कोहिनूर को वापस नहीं लाया जा सकता। यह ऐतिहासिक रूप से एकदम गलत तथ्य है क्योंकि ईस्ट इंडिया कम्पनी से इसे अवैध रूप से चोरी-छुपे ही लन्दन भेजा था।

कोहिनूर हीरे की भारत वापसी

कोहिनूर हीरे की भारत वापसी

कुछ सालों पहले उच्चतम न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि भारत सहित पाकिस्तान और बांग्लादेश भी कोहिनूर पर अपना दावा पेश करते है। यह भी इतिहास के साथ खिलवाड़ करने जैसी बात है क्योंकि कोहिनूर लन्दन भेजने से पहले तक महाराजा रणजीत सिंह के लाहौर स्थित तोशखाने में रखा हुआ था। यानि यह उनकी संपत्ति थी।

1953 में एनबी सेन की पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ़ कोहिनूर' में कोहिनूर को महाभारत के कालखंड से जोड़कर बताया गया है। जबकि आधुनिक पुरातत्वविदों के अनुसार यह गोलकुंडा स्थित कोलार की खदानों से 8वीं शताब्दी में प्राप्त हुआ था। अतः दोनों ही मामलों - उत्पत्ति और आखिरी बार भारत से बाहर जाने तक यह भारत के ही पास था। यह दौर अविभाजित भारत का था और तब किसी ने न तो किसी पाकिस्तान और न ही बांग्लादेश की कोई कल्पना की थी। अतः इन देशों के दावों में कोई दम नहीं है।

पिछले सात सालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 200 से अधिक प्राचीन भारतीय धरोहरों को वापस भारत लाया जा चुका है। इसमें ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जर्मनी और सिंगापुर जैसे कई देशों ने भारत के साथ अच्छे कूटनीतिक संबंधों के नाते भारतीय संपत्ति को लौटाया है। इसी प्रकार कोहिनूर को भी उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और महाराजा रणजीत सिंह की आखिरी इच्छा के अनुसार भारत लाया जा सकता है।

साथ ही यूनाइटेड किंगडम के नए महाराजा चार्ल्स तृतीय को भी अपने परिवार एवं ईस्ट इंडिया कंपनी की गलती को सुधारते हुए कोहिनूर को उसके असली हकदार भारत को सौंप देना चाहिए। वैसे भी कोहिनूर कहीं भी विदेश में हो, लौटकर भारत ही आता है और इतिहास इस तथ्य का हमेशा साक्षी रहा है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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