COP 27: अर्थव्यवस्था की सनातन अवधारणा से ही बच सकेगी धरती मां
जीडीपी पृथ्वी पर विकास का उचित पैमाना नहीं है, यह अति उत्पादन को बढ़ावा देने वाला है जो मशीनों से ही प्राप्त किया जा सकता है जिससे प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन होना स्वाभाविक है।
इसी माह 6 से 18 नवंबर तक, कई देशों के प्रमुख, मंत्री, मेयर, प्रतिनिधि वार्ताकार, पर्यावरण कार्यकर्ता, स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि और सीईओ एक साथ बैठकर मिस्र के तटीय शहर शर्म अल-शेख में जलवायु कार्रवाई पर वार्षिक सभा कर रहे हैं। इसे नाम दिया गया है COP-27। COP का मतलब है कांफ्रेंस ऑफ़ पार्टीज। यह जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के पक्षकारों का 27वां सम्मेलन है जो COP-26 के परिणामों पर आधारित है।

इस सभा का मुख्य उद्देश्य है जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपातकाल से निपटने के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर कार्रवाई की जा सके। बढ़ते ऊर्जा संकट, रिकॉर्ड ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और मौसम की चरम घटनाओं का सामना करते हुए, COP-27 पृथ्वी और मनुष्यों के लिए ऐतिहासिक पेरिस समझौते के लंबित मसलों को पूरा करने हेतु सभी देशों के बीच नए सिरे से एकजुटता चाहता है। पेरिस समझौते में विकसित देशों ने विकासशील देशों से जो वादा किया था उस पर भी इस बैठक में बात हो रही है।
जीडीपी पृथ्वी पर विकास का उचित पैमाना नहीं है, यह अति उत्पादन को बढ़ावा देने वाला है जो मशीनों से ही प्राप्त किया जा सकता है जिससे प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन होना स्वाभाविक है। इसकी जगह हमें पड़ोसी देश भूटान का मॉडल अपनाना चाहिये जहां जीएनएच (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) का पैमाना है। पृथ्वी पर आपातकाल बीते लाखों वर्षों में नहीं आया, इसकी प्रस्तावना लिखी गई 1760 में लेकिन अंधाधुंध जीडीपी आधारित विकास हमने शुरू किया बीते 100 वर्षों में जब जीवाश्म ईंधन कोयला और पेट्रोलियम पदार्थों का अंधाधुंध दोहन शुरू किया।
इन सौ वर्षों में भी बीते 50 वर्षों में हमने अपनी धरती को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। जीवाश्म ईंधन के अलावा यूज एंड थ्रो की सभ्यता हमने बीते 50 वर्षों में बहुत फैला दी है जिससे अनावश्यक उत्पादन और उस कारण अनावश्यक कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि हुई है।
मिस्र में आयोजित COP-27 में जिन चिंताओं को रेखांकित कर समाधान खोजे जायेंगे, उन पर भारत सनातन काल से ही प्रकृति, पारिस्थितिकीय और जैव विविधता संरक्षण करता आ रहा है। लेकिन लगातार पिछले 50 सालों में भारत की इस मूल आत्मा पर भी इस नई उपभोक्ता संस्कृति ने चोट पहुंचाई है।
हमें यह समझने की जरूरत है कि आज पेरिस ग्लासगो और शर्म अल शेख में पर्यावरण को बचाने के जो रास्ते खोजे जा रहे हैं उसका रास्ता भारत अपने सनातन अर्थशास्त्र के आधार पर सदियों से दिखाता आया है।
भारत की परम्परावादी अर्थव्यवस्था में सुधार (रिपेयर) और पुन: उपयोग (रीसाइक्लिंग) को अत्यधिक महत्त्व दिया गया था। हर गांव कस्बे में कामगार वर्ग का ऐसा तानाबाना मिल जाता है, जो उपयोग की वस्तुओं को ठीक करके दोबारा उपयोग लायक बनाते हैं। इसे ही आधुनिक शब्दों में सर्कुलर इकॉनमी बोलते हैं। यह सनातन अर्थव्यवस्था का एक प्रकार है। यह तानाबाना भारत में बचत और मितव्ययिता को बढ़ाता था, प्रकृति को न्यूनतम नुकसान पहुंचाता था और न के बराबर कार्बन उत्सर्जन करता था।
यदि इस सामाजिक व्यवस्था की बसावट और बनावट में रिपेयर और रीसाइक्लिंग करने वाले छोटे छोटे उद्योगों और कुशल कारीगरों की व्यवस्था की जाये तो यह हजारों करोड़ की बचत कराने में सक्षम तो होंगे ही, यह संयुक्त राष्ट्र के COP के उद्देश्यों के अनुकूल भी होंगे। कुछ लोग कह सकते हैं कि यदि सभी लोग ऐसे ही मरम्मत करवाते रहे तो उद्योगों का क्या होगा? उत्पादन कम होगा तो जीडीपी कम होगा। लेकिन यहां यह समझना चाहिए कि पर्यावरण के संकट से अर्थव्यवस्था को दीर्घकालीन नुकसान हो रहा है।
हमें औद्योगिक उत्पादन और जीडीपी की अंधी दौड़ में नहीं दौड़ना है। जो भी पृथ्वी के इकोसिस्टम के अनुकूल नहीं है उसे हतोत्साहित करना है। प्रोत्साहित उसे करना है जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हो। बाजार का एक हिस्सा उन कुटीर कारीगरों के लिये भी छोड़ें जो असल में प्रकृति संरक्षक की भूमिका में भी हैं। रिपेयर इकॉनमी को इग्नोर कर यदि हम अति औद्योगिक उत्पादन की तरफ बढ़ेंगे तो हम खुद ही अपने और आने वाली पीढ़ियों के विनाश का दस्तावेज लिखेंगे।
भारत की सतत सनातन सामाजिक अर्थव्यवस्था में इनकी बसावट और बनावट ऐसी थी जो पृथ्वी और मानव समाज के इकोसिस्टम के अनुकूल था। औद्योगिक उत्पादन उतना ही था जितने की मौलिक जरुरत थी, लेकिन आज के उपभोक्तावाद ने समाज का पूरा आर्थिक और सामाजिक तानाबाना बदल दिया है। आज हम रिपेयर इकॉनमी की जगह रिप्लेसमेंट इकॉनमी वाले चरण में आ गये हैं। ऐसा इसलिये है क्योंकि यह बाजारवाद और पूंजीवाद की अंधी दौड़ है हर पूंजीपति अधिक से अधिक कमाना चाहता है और अथाह खर्च करना चाहता है।
यदि हमारी सरकारी नीतियां कामगार वर्ग को सरंक्षण, प्रोत्साहन और सम्मानजनक जीवन देने में असफल रही तो एक दिन भयंकर आर्थिक दुष्प्रभाव देखने को मिलेगें। कुशल कारीगरों की जो सामाजिक व्यवस्था है वह व्यक्ति को आर्थिक सक्षमता देने के साथ लोगों की बचत को बढ़ाते हुए राष्ट्रीय विनियोग में वृद्धि करती है। ये कोई छोटा धंधा या छोटे लोग नहीं हैं। ये पृथ्वी के पर्यावरण को बचाये रखने वाले लोग हैं। इनके अस्तित्व को मजबूत रखना जरुरी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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