Mallikarjun Kharge: खड़गे के जरिए खोये हुए दलित वोटरों की खोज में कांग्रेस
Mallikarjun Kharge: भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम् में है। उनका नाम मल्लिकार्जुन है। असंख्य भारतीयों के लिए यह प्रात: स्मरणीय है। अब मल्लिकार्जुन नाम वाले दक्षिण के ही एक बुजुर्ग नेता देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के नवनिर्वाचित अध्यक्ष चुने गये हैं। अस्सी साल के मल्लिकार्जुन खड़गे दलित समुदाय से हैं।

हालांकि वो स्वयं को दलित या हिंदू कहने की बजाय बौद्ध कहलाना पसंद करते हैं। फिर भी राजनीति में प्रतीकों का अपना महत्व है। मल्लिकार्जुन खड़गे देश में दलित राजनीति के नए आइकॉन बन पाते हैं या नहीं, यह आने वाले दिनों में देखने वाली बात होगी। लेकिन उनका अध्यक्ष बनना बता रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने खोए दलित वोट बैंक को हासिल करने की परवाह तेज की है।
ऐसा पिछला प्रयोग पंजाब में चुनाव से ऐन पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर किया गया था, जो बुरी तरह से फेल हो गया था।
चन्नी का असफल प्रयोग यह बताता है कि दलित वोट बैंक को वापस कांग्रेस से जोड़ने का काम उतना आसान नहीं रहा जितना कभी हुआ करता था। अंबेडकर, पेरियार औऱ कांशीराम के बाद चुनावी मैदान में अब इस काम के कई दिग्गज चैम्पियन मुकाबले में खड़े हैं। सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और द्रौपदी मूर्मू को राष्ट्रपति बनाकर पहले ही बड़ी लकीर खींच रखी है।
इसी दलित राजनीति का तकाजा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तुरंत कांग्रेस के निर्वाचित अध्यक्ष खड़गे को सफल कार्यकाल की शुभकामनाएं प्रेषित कर दी। सोनिया गांधी ने महासचिव प्रियंका वाड्रा के साथ मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास दस राजाजी मार्ग पर जाकर बधाई देने का फोटो ऑप भी किया।
मल्लिकार्जुन खडगे ग्रैंड ओल्ड कांग्रेस पार्टी के दलित समाज से आने वाले दूसरे अध्यक्ष हैं। 1971 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने "गरीबी हटाओ" का नारा दिया। तब नारे पर प्रतीकात्मक अमल की झलक पेश करनी थी। सो, बाबू जगजीवन राम को कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। अब मल्लिकार्जुन खड़गे बने हैं। उनके लिए अवसर है। देखना होगा कि वह अपने पूर्ववर्तियों की तरह सिर्फ प्रतीक बन कर कार्यकाल पूरा कर जाते हैं या पहल करने वाले अध्यक्ष के तौर पर खुद को साबित करते हैं।
तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदूर में 21 मई 1991 की रात लिट्टे आतंकवादियों के आत्मघाती हमले में राजीव गांधी के आसमियक निधन के बाद से कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पी वी नरसिंहराव के पास पहुंची थी। राजीव गांधी को यह कुर्सी 1984 में खालिस्तानी आंतकवादियों के हाथों प्रधानमंत्री व कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद मिली थी। दुर्घटना से राव को मिली कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी ने प्रधानमंत्री बनवा दिया था। हालांकि इस ताक में प्रणव मुखर्जी, शरद पवार, अर्जुन सिंह सरीखे कई नेता लंबे समय से लगे थे लेकिन सफल नहीं हो सके।
1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार का ठीकरा नरसिंह राव के सिर फोड़ने के बाद गांधी परिवार के शुभचिंतकों ने पूरी ताकत से सोनिया गांधी के सक्रिय राजनीति में लौटने का रास्ता तैयार किया था। नरसिंह राव को घेरकर कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी से हटाया गया। परिवार के विश्वस्त कोषाध्यक्ष सीताराम केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाया गया।
साल भर के अंदर सीताराम केसरी अध्यक्ष के तौर पर राव की तरह ही दस जनपथ को भरोसे में लिए बिना स्वतंत्र निर्णय लेने की कोशिश करने लगे। इससे चौकस हुई कोटरी ने उनको नया नरसिंह राव बनने का मौका देने की बजाय बेआबरु कर कांग्रेस से निकलवा दिया। केसरी से जबरन इस्तीफा लेकर 1998 में सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद की कुर्सी पर कब्जा जमा लिया।
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सोनिया गांधी के बाद इस कुर्सी पर राहुल गांधी आए, जिन्होंने बीते लोकसभा चुनाव के बाद इस्तीफा देकर परिवार के कोटरी को झटका दे दिया। अब भी वो बार बार नये अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की अगुवाई में ही अपनी नयी भूमिका निभाने की बात कर रहे हैं।
अध्यक्ष पद के लिए दलित चेहरे की तलाश में कांग्रेस पार्टी में कई प्रयोग हुए गए। लेकिन किस्मत की सूई 80 साल के बुर्जुग मल्लिकार्जुन खड़गे पर जाकर ठहर गई। इसकी बड़ी वजह राज्यसभा सदस्य खड़गे का 47 साल का सफल राजनीति कैरियर है।
कांग्रेस की आंतरिक राजनीति के जानकार बताते हैं कि केंद्र में बड़े रोल के लिए तैयार करने के मकसद से अपेक्षाकृत युवा दलित चेहरों को लगातार आजमाया जाने लगा था। पीवी नरसिंह राव सरकार में सबसे युवा दलित चेहरा रहीं कुमारी सैलजा की क्षमता को परखने के लिए हरियाणा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।
विधानसभा चुनाव से ऐन पहले अध्यक्ष बनी सैलजा के पार्टी नेतृत्व को राज्य में पहले से बेहतर प्रदर्शन करके तो दिखा भी दिया, लेकिन वह खुद भूपिन्दर सिंह हुड्डा के बिछाए सियासी बिसात में फंसने से बच नहीं सकी। आखिरकार आंतरिक राजनीतिक दबाव में हारकर किनारे हो गईं।
उनके अलावा कांग्रेस में उत्तर भारत की राजनीति से ताल्लुक रखने वाले दलित समाज के मुकुल वासनिक और अजय माकन को अध्यक्ष पद के उपयुक्त उम्मीदवार के तौर पर अंदरुनी तौर पर आंका जाता रहा। वे राजीव गांधी के दिनों में कांग्रेस की छात्र इकाई भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनसीयूआई) के अध्यक्ष हुआ करते थे।
अशोक गहलोत के नाम पर सोनिया गांधी की मुहर होने के बाद भी मुकुल वासनिक को डार्क हार्स कहा जा रहा था, लेकिन राजस्थान में कांग्रेस का राजनीतिक विवाद इतना बढा कि अशोक गहलोत के साथ ही मुकुल वासनिक, अजय माकन इत्यादि सब किनारे हो गये और मल्लिकार्जुन खड़गे सबसे ऊपर पहुंच गये।
मल्लिकार्जुन खड़गे 26 अक्टूबर से अध्यक्ष की कुर्सी सम्हालने जा रहे हैं। तब तक संभव है कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के उम्मीदवारों के नाम तय हो जाएं। उनके बाद गुजरात चुनाव की तारीखों का ऐलान होना है।
नए अध्यक्ष के नाते उन्हें चुनाव में जीतने वाले उम्मीदवार तय करने हैं। गुजरात में आम आदमी पार्टी की अतिरिक्त सक्रियता के बीच गुजरात में सरकार बनाने की बात तो दूर कांग्रेस पार्टी के लिए पिछली बार के ही प्रदर्शन को दोहरा लेना बड़ी चुनौती बनी हुई है।
उसके बाद मल्लिकार्जुन खड़गे के गृह प्रदेश कर्नाटक की बारी आनी है। कर्नाटक में अनुसूचित जाति की आबादी बीस प्रतिशत है। राज्य में 16 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। दोनों मिलकर सत्तारुढ भाजपा के लिए मुश्किल पैदा करने वाला औऱ कांग्रेस नीत गठबंधन के स्पष्ट जीत की संभावना बनाता है।
लेकिन अब कर्नाटक में जनता दल परिवार के ही वरिष्ठ नेता स्वर्गीय एस आर बोम्मई के पुत्र औऱ भाजपा नेता बसवराज बोम्मई मुख्यमंत्री हैं। अगले साल के आरंभ में कर्नाटक विधानसभा चुनाव होना है। इसलिए नए कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर खड़गे की नेतृत्व क्षमता का पहला बड़ा इम्तिहान कर्नाटक में ही होने वाला है। कर्नाटक में सफलता मिली तो ही खड़गे को अध्यक्ष बनाना कांग्रेस पार्टी के लिए उपयोगी माना जायेगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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