Mallikarjun Kharge: कर्नाटक विधानसभा चुनाव में क्या होगा मल्लिकार्जुन खड़गे के नए अध्यक्ष बनने का असर ?
New Congress President Mallikarjun Kharge: कांग्रेस में 24 साल बाद गांधी-नेहरू परिवार से अलग व्यक्ति के पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ हुआ है। राज्यसभा सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकसभा सांसद शशि थरूर को भारी मतों के अंतर से इस संगठनात्मक चुनावों में हरा दिया है। कांग्रेस पार्टी संगठन में नई शुरुआत को बहुत बड़ा बदलाव होने का दावे कर रही है। खड़गे के सामने अगली सबसे बड़ी चुनौती कर्नाटक विधानसभा चुनाव की होगी। क्योंकि, हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों में पार्टी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं भी कर पाती तो उनपर उंगलियां नहीं उठाई जा सकेंगी। लेकिन, कर्नाटक चुनाव में वक्त है और वह उनका गृहराज्य भी है। ऐसे में यह देखने वाली बात होगी कि उनका कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने से प्रदेश में पार्टी को कितना फायदा मिलेगा।

कर्नाटक चुनाव पर खड़गे का असर क्या होगा ?
कांग्रेस के नए अध्यक्ष और 80 वर्षीय दलित नेता जिस कर्नाटक राज्य से आते हैं, वहां अगले साल यानि 2023 में ही विधानसभा चुनाव होने वालें हैं। यहां 2018 में कांग्रेस की अगुवाई में जेडीएस के साथ गठबंधन सरकार बनी थी। लेकिन, 2019 में यह सरकार गिर गई या गिरा दी गई और तब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्ता में है। कांग्रेस की सरकार गिरने की वजह अपने विधायकों का विद्रोह था। तो बीजेपी के अंदर भी कलह कम नहीं है और बीएस येदियुरप्पा की जगह पर अब बसवराज बोम्मई की सरकार चल रही है। यानि यहां अगले चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका सटीक अंदाजा लगाना चुनाव विश्लेषकों के लिए भी आसान नहीं है। जाहिर है कि कांग्रेस ने 24 साल बाद गांधी परिवार से बाहर के खड़गे को पार्टी की कमान सौंपी है तो उसने कर्नाटक की राजनीति का भी गुणा-गणित किया होगा।

कर्नाटक में कितना बड़ा है दलित-मुस्लिम वोट बैंक ?
कांग्रेस के लिए कर्नाटक अहम राज्य है। बाकी राज्यों से प्रदेश में उसकी स्थिति बेहतर मानी जा सकती है और यहां अभी भी कार्यकर्ताओं और नेताओं में चुनावी जान बची हुई है। न्यूज18 ने जनगणना डेटा के आधार पर 2018 में एक रिपोर्ट दी थी, जिसके मुताबिक कर्नाटक में दलितों या अनुसूचित जाति की आबादी सबसे ज्यादा 19.5% है। इसके अलावा प्रदेश में मुस्लिम आबादी भी 16% है। यह आंकड़े मल्लिकार्जुन खड़गे के अध्यक्ष बनने के साथ कांग्रेस के एजेंडे में फिट बैठ सकते हैं। इनके अलावा प्रदेश में अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या भी 6.95% है।

खड़गे के खिलाफ बीजेपी के पास क्या हैं चुनावी हथियार ?
बीजेपी को भी कांग्रेस के इन मंसूबों का पूरा अंदाजा है। वह जान रही है कि खड़गे के जरिए पार्टी राज्य में अपनी वापसी के लिए जी-जान लगा सकती है। शायद यही वजह है कि कर्नाटक की बीजेपी सरकार राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का कोटा बढ़ाने का दांव चलना शुरू कर चुकी है। ऊपर से खड़गे विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों से वंचित भी नहीं हैं। इसी साल अगस्त में नेशनल हेराल्ड केस में उनसे पूछताछ भी हो चुकी है। 2014 में लोकायुक्त के पास उनके खिलाफ शिकायत की गई थी कि उन्होंने 50,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति जमा कर रखी है। भ्रष्टाचार के अलावा कर्नाटक भाजपा उनके खिलाफ परिवारवाद के आरोपों में भी निशाना साधती रही है।

मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए बहुत आसान नहीं कर्नाटक का रास्ता
खड़गे कर्नाटक के बड़े दलित नेता जरूर हैं, लेकिन प्रदेश की राजनीति यह भी देख चुकी है कि कैसे कांग्रेस में उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से एक बार नहीं, बार-बार रोका गया। आलाकमान के प्रति हर बार वफादारी का मान नहीं रखा होता तो शायद पार्टी उन्हें केंद्र की राजनीति में भी इतना आगे नहीं बढ़ाया होता। ऐसे में खड़गे के चेहरे के दम पर कांग्रेस के लिए कर्नाटक विधानसभा में कोई बड़ा उलटफेर कर पाना बहुत आसान नहीं दिख रहा है। सिर्फ उनके नाम पर वोट बटोर कर कांग्रेस के लिए अपनी सरकार बनाना आसान हो पाएगा, ऐसा लगता नहीं है। क्योंकि, दलित वोट बटोरने के लिए बीजेपी ने भी पूरा दांव लगा रखा है। वह रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनवा चुकी है तो पहली बार एक आदिवासी और वह भी महिला द्रौपदी मुर्मू को दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र का राष्ट्रपति बनवाया है।

केंद्र की राजनीति में आने के बाद कर्नाटक में खड़गे का रिकॉर्ड
मल्लिकार्जुन खड़गे 1972 से ही कर्नाटक की चुनावी राजनीति में सक्रिय हैं। इसके बाद वे लगातार 9 बार वहां विधानसभा चुनाव जीते और फिर 2009 और 2014 में लोकसभा का चुनाव भी जीता। कांग्रेस ने संगठन में उन्हें सबसे बड़ा पद तब दिया, जब वे सोनिया गांधी और राहुल गांधी के रहते हुए भी लोकसभा में कांग्रेस के सदन के नेता नियुक्त किए गए। लगातार पांच साल तक संसद से लेकर सड़क तक वह आगे रहे और पार्टी ने बाकी नेताओं को पीछे रखा। लेकिन,इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में वो अपनी परंपरागत गुलबर्गा सीट भी नहीं बचा पाए। 47 साल के चुनावी करियर में यह उनकी पहली हार थी। 2014 के मोदी लहर में कांग्रेस को कर्नाटक में 28 में से 9 सीटें मिलीं थीं और 41.15 फीसदी वोट आया था। खड़गे की बड़ी राष्ट्रीय भूमिका के बावजूद 2019 में कांग्रेस किसी तरह से सिर्फ 1 सीट बचा पाई और वोट प्रतिशत भी घटकर 32.11 रह गया। जबकि, भाजपा पूरे 25 सीटें जीत गई।












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