Centre vs State: केंद्र सरकार के संवैधानिक अधिकारों पर सवाल की राजनीति
संविधान में करंसी, सीमाओं की रक्षा और विदेशों से संबंधों के मुद्दे केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है। लेकिन CM, मंत्रियों के विदेशी दौरे के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी पर विवाद खड़ा होने से संवैधानिक ढांचे पर सवाल उठ रहे हैं

Centre vs State: सुप्रीमकोर्ट से दिल्ली सरकार के अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग का फैसला आम आदमी पार्टी सरकार के पक्ष में आने और उसके बाद केंद्र सरकार के अध्यादेश से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को राष्ट्रीय नेता बनने का अवसर मिल गया| हालांकि 1991 के क़ानून में दिल्ली को सिर्फ विधानसभा दी गई थी, प्रशासनिक अधिकार नहीं दिए गए थे| क़ानून में प्रशासनिक अधिकारों का जिक्र नहीं होने के कारण सुप्रीमकोर्ट ने यह फैसला दे दिया था, लेकिन साथ ही फैसले के पैरा 95 में लिख दिया था कि कल को अगर संसद कोई क़ानून बना देती है, तो उपराज्यपाल के अधिकार उसी के अनुरूप बदल जाएंगे और राज्य सरकार को उसे मानना होगा|

इसके बावजूद अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार के अध्यादेश को सुप्रीमकोर्ट का अपमान, अदालत की अवमानना, असंवैधानिक और देश के संघीय ढांचे को खतरे जैसे जुमले उछाल कर मोदी विरोधी दलों को अपने साथ ले लिया है| कांग्रेस ने अभी तक समझदारी बरती है, उसकी तरफ से अध्यादेश पर आधारित बिल का विरोध किए जाने का कोई संकेत नहीं आया है| दिल्ली और पंजाब के कांग्रेसी नेता इस मुद्दे पर केजरीवाल का विरोध कर रहे हैं| कांग्रेस ने कहा था कि वह अपने नेताओं और समान विचारधारा वाले दलों से विचार विमर्श कर के फैसला करेगी|
केजरीवाल ने संघीय ढाँचे को खतरा बता कर कांग्रेस की समान विचारधारा वाले क्षेत्रीय दलों के साथ साथ तृणमूल कांग्रेस, भारत राष्ट्र समिति और समाजवादी पार्टी का भी समर्थन हासिल कर लिया है| वह इस मुद्दे को 23 जून की विपक्षी बैठक का भी मुख्य मुद्दा बनाने जा रहे हैं| कांग्रेस के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है, क्योंकि केजरीवाल ने इस मुद्दे को 2024 का सेमीफाईनल बता दिया है और उनकी विपक्षी एकता की शर्त भी यही होगी कि सभी राज्यसभा में उनके पीछे खड़े हों|
दिल्ली की पोस्टिंग ट्रांसफर को संघीय ढांचे पर खतरे का मुद्दा बनाने के बाद केजरीवाल ने संघीय ढांचे का एक नया मुद्दा भी खोज लिया है| जैसे ट्रांसफर पोस्टिंग के मुद्दे को वह पहले दिल्ली हाईकोर्ट लेकर गए थे, वैसे ही इस नए मुद्दे को भी दिल्ली हाईकोर्ट ले कर गए हैं| पहले उन्होंने कहा था कि दिल्ली सरकार को अपने अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग की इजाजत केंद्र सरकार से क्यों मांगनी चाहिए| अब नई याचिका यह है कि राज्यों के मुख्यमंत्री और मंत्रियों को अपने विदेश दौरे की इजाजत केंद्र सरकार से क्यों मांगनी चाहिए|
पहले भी कई केन्द्रीय मंत्रियों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को विदेश दौरों की इजाजत नहीं मिली है, लेकिन किसी भी मुख्यमंत्री ने कभी केंद्र सरकार के फैसले को अदालत में चुनौती नहीं दी थी| यूपीए सरकार के समय असम के कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को अमेरिका और इजराईल जाने की इजाजत नहीं मिली थी। झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को थाईलैंड जाने की इजाजत नहीं मिली थी| ममता बनर्जी को तीन बार विदेश यात्रा की इजाजत नहीं मिली थी| यह एक सेट पैरामीटर है, जिसके अंतर्गत सरकार फैसला करती है|
केंद्र सरकार के केबिनेट मंत्रियों, राज्य मंत्रियों, अधिकारियों, सांसदों, राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों की आधिकारिक और निजी विदेश यात्राओं का एक प्रोटोकोल बना हुआ है| आधिकारिक यात्राओं की विदेश मंत्रालय के साथ साथ एफसीआरए की इजाजत भी लेनी पड़ती है| निजी यात्राओं के लिए विदेश मंत्रालय से सिर्फ राजनीतिक मंजूरी लेनी पड़ती है| केन्द्रीय मंत्रियों को सीधे प्रधानमंत्री से इजाजत लेनी पड़ती है। संसद सत्र के दौरान निजी यात्रा की भी प्रधानमंत्री से इजाजत लेनी पड़ती है| बताना पड़ता कि इस दौरे पर कितना खर्च होगा, और भारत को इससे कितना फायदा होगा|
सांसदों को भी अपने सदन के अध्यक्ष से क्लीयरेंस लेनी पड़ती है| इस प्रोटोकोल को मोदी सरकार ने नहीं बनाया, यह आज़ादी के बाद से ही बना हुआ है। यह प्रोटोकोल सिर्फ भारत का ही नहीं है, दुनिया के हर देश का ऐसा ही प्रोटोकोल होता है| समय समय पर जो नई बातें सामने आती हैं, उन्हें देख कर प्रोटोकोल में परिवर्तन भी किया जाता है, लेकिन इस प्रोटोकोल में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता|
इस साल 28 फरवरी को केबिनेट सचिवालय के अतिरिक्त सचिव ने एक रिमाइंडर जरुर इश्यू किया है कि 2010 और 2014 के नोटिफ़िकेशन का पालन किया जाए| ऐसा रिमाइंडर हर साल भेजा जाता है| आख़िरी बार 1995 में नियमावली बनाई गई थी, जिसमें समय समय पर मामूली संशोधन हुए| मोदी सरकार ने 29 सितंबर 2014 को सिर्फ एक नया सर्कुलर जारी किया था, जिसमें दो बातें रखी गई थीं| पहली यह कि मुख्यमंत्रियों और राज्य सरकारों के मंत्रियों की विदेश यात्राओं की जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय को भी दी जाए और दूसरी यह कि जब आधिकारिक यात्रा हो तो विदेश मंत्रालय को सूचित किया जाए|
पिछले साल केंद्र सरकार ने केजरीवाल को सिंगापुर दौरे की इजाजत नहीं दी थी| क्योंकि वह मेयरों की कांफ्रेंस में जाना चाहते थे, उससे पहले 2019 में डेनमार्क जाने की इजाजत नहीं दी थी, डेनमार्क में भी मेयरों की कांफ्रेंस थी| विदेश जाने का मौक़ा मिले तो केजरीवाल खुद को नगरपालिका अध्यक्ष के समान मानने को तैयार हैं। लेकिन भारत में खुद को पूर्ण राज्य का मुख्यमंत्री मानते हैं| जब उन्हें पर्यावरण मंत्रालय से विदेश यात्रा की इजाजत नहीं मिली, तो उन्होंने प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिखी थी|
तब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने कहा था कि वह यह समझ नहीं पा रहे कि मोदी सरकार आम आदमी पार्टी के साथ ऐसा अन्यायपूर्ण व्यवहार क्यों कर रही है। उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री केजरीवाल छुट्टी मनाने के लिए डेनमार्क नहीं जा रहे थे| एशिया के 100 शहरों के मेयरों से प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई लड़ने के तरीकों के विषय में चर्चा करने जा रहे थे|
यह बयान देकर उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि वह मेयरों की कांफ्रेंस थी, इसी लिए केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इजाजत नहीं दी थी| केजरीवाल के पास तो कोई विभाग भी नहीं था, वह पर्यावरण मंत्री का नाम भेजते तो बात कुछ समझ भी आती, जैसे ममता बनर्जी ने भी कोलकाता के मेयर को भेजने की बजाए, एक मंत्री का नाम आगे बढ़ा दिया था| संजय सिंह ने सर्वदलीय बैठक में मोदी के सामने यह मुद्दा उठाया और यहां तक कहा कि मुख्यमंत्रियों के लिए अपने विदेश दौरे की केंद्र से मंजूरी लेना क्यों जरूरी है| यानि आम आदमी पार्टी सारे सिस्टम को बदल कर हर मामले में खुद मुख्तियारी चाहती है|
अब ताजा किस्सा यह है कि नई नई मंत्री बनी आतिशी मार्लिना तुरंत ब्रिटेन यात्रा पर जाना चाहती हैं| केंब्रिज यूनिवर्सिटी के जज कालेज से उन्हें न्योता भी मिल गया है| 10 मई को उन्हें न्योता मिला, 18 मई को दिल्ली सरकार ने फाईल आगे बढ़ा दी थी, एलजी ने भी 26 मई को फाईल विदेश मंत्रालय को भेज दी थी, लेकिन 5 जून तक केंद्र से इजाजत नहीं मिली तो वह हाईकोर्ट पहुंच गई| हाईकोर्ट में उनकी दलील यह थी कि उनके विदेश दौरे के अधिकार को रोकना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है|
पहली बात तो यह है कि किसी मंत्री का सरकारी खर्चे पर विदेश यात्रा पर जाना उसका अधिकार कैसे है, और यह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का हनन कैसे हुआ| इस दलील का मतलब साफ़ है कि सरकारी खर्चे पर होने वाली विदेश यात्राओं को आम आदमी पार्टी के मंत्री और मुख्यमंत्री व्यक्तिगत स्वतन्त्रता मानते हैं| और वे विदेश यात्राओं पर केंद्र सरकार का अंकुश नहीं चाहते| हालांकि सात जून को जब कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई तो केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि 6 जून को ही पॉलीटिकल क्लीरेंस दिया जा चुका है, अब वह फाइनेंशियल क्लीयरेंस के लिए आवेदन करें|
इस पर याचिका का निपटारा तो हो गया, लेकिन बहस के दौरान आतिशी के वकील ने यह दलील भी दी कि मुख्यमंत्रियों और राज्य सरकारों के मंत्रियों के लिए विदेश यात्राओं की केंद्र से इजाजत लेने की जरूरत ही क्या है| यह वही दलील है, जो आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने सर्वदलीय बैठक में उठाई थी| यानि यह आम आदमी पार्टी के एजेंडे पर है, और आने वाले समय में क्षेत्रीय दलों के मुख्यमंत्रियों के साथ मिल कर कभी भी संघीय ढाँचे का मुद्दा बनाया जा सकता है, जबकि संविधान में करंसी, सीमाओं की रक्षा और विदेशों से संबंधों के मुद्दे केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है| लेकिन आम आदमी पार्टी जिस तरह आधिकारिक तौर पर विदेश यात्राओं को मुद्दा बना रही है, यह आने वाले दिनों में देश की एकता और संवैधानिक ढांचे के लिए खतरे की घंटी है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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