Censor Board: ‘पठान’ पर हुआ एक्शन, लेकिन बाकी पर लापरवाही क्यों?
पठान पर सेंसर बोर्ड के फैसले से फिल्मों में एजेंडा चलाने वाले फिल्मकारों में स्पष्ट संदेश गया है। लेकिन ऐसे ही बाकी मामलों में सेंसर बोर्ड लापरवाह क्यों हो जाता है?

Censor Board: सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष जब पहलाज निहलानी थे तो हर दूसरी तीसरी मूवी किसी ना किसी सीन कट के साथ ही सेंसर बोर्ड से पास होती थी। ऐसे में प्रसून जोशी जैसा हर कैम्प का लाडला और अपेक्षाकृत लिबरल चेहरा सेंसर बोर्ड प्रमुख के तौर पर सामने आया, तो लगा कि अब कोई शिकायत नहीं करेगा। लेकिन इस साल फिल्मों में ऐसे कई सीन आए थे कि राष्ट्रवादियों का भी भरोसा सेंसर बोर्ड से उठने लगा था, ऐसे में 'पठान' के खिलाफ उनका एक्शन सभी खेमों को चौंकाने वाला है।
पठान के दो गानों और हिंसा के कुछ दृश्यों में सेंसर बोर्ड ने बदलाव के सुझाव दिए हैं। साथ ही सेंसर बोर्ड प्रमुख प्रसून जोशी ने मीडिया से बातचीत में कहा, "हमें समझना चाहिए कि हमारी संस्कृति और सभ्यता गरिमापूर्ण, जटिल और सूक्ष्म है। हमें सावधान रहना होगा कि यह इस तरह से परिभाषित न हो जाए जो ध्यान को वास्तविकता और सत्य से दूर ले जाए"। देर आयद दुरुस्त आयद। पैसे कमाने या एजेंडे के चलते जो फिल्मकार लगातार लोगों की भावनाओं से खेलते हुए इस तरह के सीन फिल्मों में डाल रहे थे, उनको स्पष्ट संदेश गया है।
लेकिन केवल इस एक केस से सेंसर बोर्ड की वाहवाही नहीं की जा सकती। इस साल कई ऐसी फिल्में आईं, जो प्रसून जोशी के बयान के दायरे में गलत ही साबित होंगी, तो फिर बोर्ड की नजर में क्यों नहीं आईं? क्या पठान जैसा दमदार विरोध होगा, तभी सुनवाई होगी? या फिर बोर्ड के पास ऐसे लोग कम हैं, जो भारतीय संस्कृति, धार्मिक पहलुओं आदि को ढंग से समझ नहीं पाते? इस साल की फिल्मों के कुछ उदाहरणों से आप इसे ढंग से समझ पाएंगे।
अजय देवगन और सिद्धार्थ मल्होत्रा की हालिया फिल्म आई 'थैंक गॉड', इसमें अजय चित्रगुप्त के रोल में हैं। चलिए उनके उपनाम यानी सीजी पर सवाल नहीं उठाते, आधुनिक दुनियां में शॉर्ट नेम चलन में हैं, जैसे रामसेतु में अंजनि पुत्र को एपी कहा गया, इसमें चित्रगुप्त को 'सीजी' कहा गया। लेकिन सवाल इस बात पर उठता है कि मूवी का एक बड़ा टर्निंग प्वॉइंट है, एक भिखारी महिला का मुंबई के किसी बड़े मंदिर में चार दिन भूख से तड़पकर मर जाना। कौन यकीन करेगा इस बात पर? मंदिरों में कब से खाने और पैसे देने वालों की कमी हो गई? जबकि ऐसा भी नहीं था कि भिखारी ज्यादा थे। हीरो को बुरा दिखाने के चक्कर में निर्देशक ने पूरी सनातन परम्परा को ही गलत दिखा दिया। लेकिन ना विरोध हुआ और ना सेंसर बोर्ड के किसी सदस्य ने ऐतराज किया।
हृतिक रोशन और सैफ अली खान की मूवी 'विक्रम वेधा' को ही लीजिए। उसमें एक सीन है जिसमें बड़े गुंडे के रूप में हृतिक यानी वेधा गैंग के एक छोटे गुंडे से बोलते हैं, 'जानते हो भोले के गले में वो सांप क्यों होता है? अगर वो सांप शंकरजी को छोड़कर चला जाए तो शंकरजी का क्या नुकसान होगा? कुछ नहीं, लेकिन उस सांप को चील, कव्वे नोच कर खा जाएंगे। जब तक शिवजी के गले में है, तब तक वो सेफ है। फिर उस गुंडे से कहते हैं, कि "सुन, भोले हम हैं और वो सांप तुम हो"। दिलचस्प बात है कि फिल्म के क्लाइमेक्स में हृतिक रोशन उस गुंडे यानी शारिब हसन का गला काट देते हैं।
किसी और धर्म के पूजनीय व्यक्तित्व को लेकर ये गल्प कथा लेखक और निर्देशक इस तरह के सीन फिल्मा सकते थे? दिलचस्प है कि सेंसर ने भी पास कर दिया। शिवजी के गले में जो सांप होता है, वो नागराज वासुकी हैं, जिस नाग को मेरू पर्वत के इर्दगिर्द रस्सी की तरह लपेटकर समुद्र मंथन किया गया था, वो नागराज वासुकी ही थे। वासुदेव जब बाल कृष्ण को टोकरी में लेकर तूफानी रात में यमुना पार कर रहे थे तो टोकरी के ऊपर छाया देते हुए जो नाग चल रहा था, वो भी वासुकी थे।
अब ये कैसे पता चले कि ये सीन लेखक ने जानबूझकर लिखा या एजेंडे के तहत? सेंसर बोर्ड के पास इन्हें पकड़ने की तरकीब क्या है? अब सारे साधु, मुनि या इतिहास के जानकार तो हर फिल्म को इतनी बारीकी से देखेंगे नहीं सो ज्यादातर मूवीज बिना विरोध के चल जाती हैं और सेंसर बोर्ड बच जाता है। लोगों ने विरोध किया तो बस इस बात का कि विलेन का नाम परशुराम क्यों है?
लाल सिंह चड्ढा भले ही पिट गई, लेकिन वो भी बाज नहीं आए थे। आमिर खान के किरदार से इस मूवी में एक सवाल पूछा जाता है कि तुम कोई पूजा पाठ नहीं करते? कभी देखा नहीं तो उसका जवाब होता है- "मां कहती थी कि मजहब मलेरिया होता है"। फिर आमिर 72 हूरों वाले मौलवी के बयान को टीवी में दिखाकर उस पर एक सीन में सवाल भी उठाते हैं। हालांकि देखा जाए तो लाल सिंह का किरदार भी इस मामले में पीके से प्रभावित लगता है।
हालांकि आमिर के बारे में उनके विरोधी मानते हैं कि वो एजेंडा बड़े ही 'ब्रॉडर नरेटिव' में दिखाते हैं, जो आसानी से पकड़ में नहीं आता। लाल सिंह चड्ढा में भी वो ऐसा करने से नहीं चूके। मूवी में सिख के रोल में हीरो है, ईसाई के रोल में हीरोइन, मुस्लिम रोल में उसका पाकिस्तानी दोस्त मोहम्मद है और साउथ इंडियन दोस्त बाला है।
रणवीर सिंह और संजय दत्त की 'शमशेरा' में भी लोगों की भावनाओं से खेला ही गया था। शमशेरा में कितनी चालाकी से अंग्रेजों को अच्छा बताकर एक ऐसा विलेन तैयार किया गया है, जिसका नाम है शुद्ध सिंह और जो माथे पर तिलक छापा लगाकर पूरे समय रखता है। शुद्ध सिंह के पूरे माथे पर तिलक छापा, मंदिरों की नगरी है 'नगीना' और उसमें दूध सिंह (सौरभ शुक्ला) का डायलॉग- ''दुनियां में धर्म से बड़ा मुखौटा क्या है''।
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नायक का गुरू पीर बाबा को बनाना, उसके ताबीज को तबज्जो देना, नायक के साथी को घंटी चोर दिखाना, एक सीन में शायद किसी जैन साधु को पालकी से गिरते जमीन पर दिखाना, शादी के हवन कुंड को तोड़कर उसके नीचे से लोगों का निकलना आदि उसी कड़ी में पिरोई जा सकती हैं। कुल मिलाकर साफ लगता है कि ये सारे प्रतीक किसी खास वजह से इस्तेमाल किए जा रहे हैं, लेकिन सेंसर बोर्ड में कोई इन्हें इतने गौर से देखता ही नहीं। समझो तो बहुत कुछ और ना समझो तो कुछ भी नहीं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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