Caste Reservation: मोदी ने मिला दी है मंडल और कमंडल की राजनीति
Caste Reservation: नफरत की राजनीति फिर शुरू हो गई है| कांग्रेस पर काबिज सोनिया गांधी का परिवार 2002 से लगातार नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले करता आ रहा है|
जनता ने उनके हमलों को कभी पसंद नहीं किया| यही कारण है कि कांग्रेस की राजनीतिक हैसियत कम होती चली गई|
सोनिया गांधी भारत की राजनीतिक परंपरा को समझ नहीं पाई, या उनके सलाहाकार ऐसे थे, जिन्होंने उन्हें व्यक्तिगत हमले करना सिखाया| सोनिया गांधी ने सिर्फ नरेंद्र मोदी पर नहीं, बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी पर भी इसी तरह के हमलों के साथ अपनी राजनीति की शुरुआत की थी|

सोनिया गांधी के राजनीति में आने से पहले संसद में भी इतनी तल्खी नहीं हुआ करती थी| सत्रावसान के समय विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री के भाषण हुआ करते थे, जिनमें तल्खी नहीं हुआ करती थी| लेकिन 1999 में सोनिया गांधी के विपक्ष का नेता बनते ही संसद की आबोहवा बदल गई|

समापन भाषण में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर व्यक्तिगत हमले करना शुरू कर दिया था| तो अंतिम भाषण में प्रधानमंत्री वाजपेयी ने भी उन हमलों का जवाब देना शुरू किया| उन्होंने एक बार सदन में कहा भी था कि सदन में कभी इतनी तल्खी नहीं हुआ करती थी। वाजपेयी खुद भी 1993 से 1997 तक (बीच में 13 दिन की सरकार छोड़कर) विपक्ष के नेता रहे थे|
सोनिया गांधी से पहले वाजपेयी के 13 महीनों के पहले कार्यकाल में शरद पवार विपक्ष के नेता थे| सोनिया गांधी के तल्खी भरे भाषणों का नतीजा यह निकला कि संसद सत्र के समापन के समय विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री के भाषण की परंपरा ही बंद करनी पड़ी| अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब वाजपेयी जैसे सौम्य नेता के साथ नफरत भरा व्यवहार हो सकता है, तो आक्रामक स्वभाव के नरेंद्र मोदी के साथ तो होना ही था|
सोनिया गांधी और उनकी दोनों संतानें नरेंद्र मोदी को दशकों से चली आ रही अपनी पारिवारिक राजनीति का सबसे बड़ा विलेन मानते हैं, इसका कारण यह है कि मोदी देश के पहले ऐसे गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें सांसदों ने नहीं सीधे जनता ने बहुमत दिया है| मोदी से पहले ऐसा दावा सिर्फ नेहरू - इंदिरा परिवार ही कर सकता था|
मोदी की लोकप्रियता के कारण ही 2013 में भाजपा उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने को मजबूर हुई थी| उनकी लोकप्रियता का कारण भी सभी जानते हैं कि गोधरा में ट्रेन जलाए जाने के बाद उन्होंने अपने 12 साल के शासन काल में गुजरात में एक भी दंगा नहीं होने दिया था| इससे गुजरात के हिन्दुओं ने बहुत बड़ी राहत की सांस ली थी, क्योंकि लगभग हर साल होने वाले साप्रदायिक दंगों का वही शिकार होते थे|
मोदी के मुख्यमंत्री काल में शान्ति स्थापित होने के कारण गुजरात का विकास हुआ| हिन्दुओं को दंगों से राहत के कारण गुजरात के विकास का वह मेसेज पूरे देश में फैला और वह हिन्दुओं के लोकप्रिय नेता बनते चले गए| तब तक देश को यह पता ही नहीं था कि नरेंद्र मोदी ओबीसी समुदाय से आते हैं| मोदी एक गरीब परिवार से जरुर थे, लेकिन उन्होंने खुद भी कभी यह नहीं बताया था कि वह ओबीसी समुदाय से हैं|
नरेंद्र मोदी का बचपन गरीबी में निकला है| गरीब की जाति कोई भी हो, उसकी तकलीफ एक समान होती है। इसलिए मोदी अक्सर कहते भी रहे हैं कि वह अमीर और गरीब दो ही जातियां मानते हैं| मोदी की उपलब्धि यह है कि उन्होंने 1990 से देश में शुरू हुई मंडल कमंडल की राजनीति का स्वरूप बदल दिया है| उन्होंने अपनी कमंडल वाली पार्टी में मंडल घुसा दिया है, दोनों का एकीकरण कर दिया है|
इस एकीकरण से भारतीय जनता पार्टी का स्वरूप भी बदल गया और देश की राजनीति भी बदल गई| जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक भी एक जमाना था, जब कांग्रेस का भी यही स्वरूप था, जो आज भारतीय जनता पार्टी का है| भाजपा की तरह कांग्रेस भी राष्ट्रीय मुद्दों पर राजनीति करती थी और जातिवादी सोच को बढावा नहीं देती थी|
इसका प्रमाण नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में दिए अपने भाषण में दिया है, जिसमें उन्होंने जवाहर लाल नेहरू की मुख्यमंत्रियों को लिखी गई चिठ्ठी का हवाला दिया, उस चिठ्ठी में उन्होंने लिखा था कि वह व्यक्तिगत तौर पर जातिवाद की राजनीति को बढ़ावा देने के खिलाफ हैं, और वह आरक्षण के भी खिलाफ हैं| बहुत पुरानी बात नहीं है, जब वीपी सिंह ओबीसी को आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर रहे थे, तब राजीव गांधी ने संसद में आरक्षण का विरोध करते हुए कहा था कि यह समाज को तोड़ देगा|
आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने जाति आधारित जनगणना बंद करवा दी थी| उसके बाद कभी भी जाति आधारित जनगणना नहीं हुई| पिछड़ी जातियों की ओर से एससी एसटी की तरह आरक्षण की मांग को भी कांग्रेस ने हमेशा अनसुना किया| ओबीसी को आरक्षण की मांग पर पहली बार जनता सरकार ने ध्यान दिया और मोरारजी देसाई ने 1979 में मंडल कमीशन बनाया। हालांकि मोरारजी देसाई ओबीसी नहीं, ब्राह्मण थे।
दुर्भाग्य से जब तक मंडल कमीशन की रिपोर्ट आई, तब तक मोरारजी देसाई सरकार गिर गई थी, और इंदिरा गांधी दुबारा सत्ता में आ गई थी| कांग्रेस की इंदिरा सरकार ने मंडल आयोग की ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश को रद्दी की टोकरी में फैंक दिया| कांग्रेस की इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सरकारों ने 1989 तक आरक्षण की सिफारिश वाली रिपोर्ट को दबाए रखा| 1990 में जनता दल सरकार के प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने आरक्षण की रिपोर्ट को लागू किया, वीपी सिंह भी ओबीसी नहीं थे, ठाकुर थे| लेकिन मंडल की राजनीति करके अपने राजनैतिक आधार को बढ़ाने की कोशिश में उन्होंने यह निर्णय ले लिया।
जब ओबीसी को आरक्षण की रिपोर्ट लागू हो गई तो कांग्रेस को लगा कि उसके वोट का आधार ही खिसक जाएगा, इसलिए उसने देश भर में आंदोलन करवा दिए| वीपी सिंह सरकार भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से चल रही थी, भाजपा को भी लगा कि हिन्दू समाज जातियों में बंट गया तो उसके वोट का आधार खिसक जाएगा|
भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवानी ने हिन्दुओं को एकजुट करने के लिए विश्व हिंदू परिषद के रामजन्मभूमि आन्दोलन में सक्रिय होना शुरू कर दिया| इसे मंडल की राजनीति के जवाब में कमंडल की राजनीति कहा जाने लगा। उनकी सोमनाथ से शुरू हुई रथयात्रा को मंडल राजनीति के मसीहा और बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने बिहार में रोक दिया| लालू यादव उसी जनता दल के नेता थे, जिसकी केंद्र में सरकार भाजपा के समर्थन से चल रही थी| आडवाणी की रथयात्रा रोकने से नाराज भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई|
कमंडल की राजनीति की प्रतीक बन गई भाजपा ने आरक्षण का कभी विरोध नहीं किया था| लेकिन मंडल बनाम कमंडल कह कर भाजपा को आरक्षण विरोधी बताने की कोशिश तबसे चलती रही| मंडल आयोग बनने से भी पहले पिछड़ों और अत्यंत पिछड़ों को आरक्षण देने वाले कर्पूरी ठाकुर और कमंडल राजनीति के प्रतीक लाल किशन आडवाणी को एक साथ भारत रत्न से सम्मानित करके नरेंद्र मोदी ने कमंडल में मंडल मिला दिया है|
जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, मंडल का वोट भाजपा की तरफ बढ़ रहा है| पिछड़ी जातियों के नेताओं को भारतीय जनता पार्टी में ज्यादा बढ़ावा मिलना शुरू हुआ| 2014 में पहली बार भाजपा के ओबीसी समर्थकों में दस प्रतिशत का उछाल आया था, 2019 में फिर दस प्रतिशत का उछाल आया|
भाजपा के मौजूदा 303 लोकसभा सदस्यों में से 85 ओबीसी से हैं, इसी तरह देश भर के विधायकों में भी यही अनुपात बरकरार है| सीएसडीएस- लोकनीति के आकलन के मुताबिक़ 2023 में बिहार में जाति आधारित सर्वेक्षण के समय देश भर में 45 प्रतिशत ओबीसी भाजपा समर्थक था, जबकि सिर्फ 14 प्रतिशत ओबीसी कांग्रेस समर्थक है| बाकी क्षेत्रीय दलों के साथ हैं, लेकिन लोकसभा चुनावों के समय स्थिति बदल जाती है| तब 70 से 75 प्रतिशत तक ओबीसी राष्ट्रीय दलों के साथ होता है| कांग्रेस और भाजपा के सीधे मुकाबले या गठबन्धनों में 65 प्रतिशत ओबीसी भाजपा और भाजपा गठबंधन के साथ होता है|
राहुल गांधी की कांग्रेस ने ओबीसी में अपना आधार बढ़ाने के लिए नेहरू, इंदिरा और राजीव के जमाने की नीति को बदल कर जाति आधारित जनगणना के आधार पर आरक्षण देने की नई नीति अपनाई है| पिछड़ी जातियों को अपने पीछे लामबंद करने के लिए राहुल गांधी ने पहला आधार यह बनाया कि केंद्र सरकार की नीतियाँ बनाने वाले अफसरों में एक भी ओबीसी नहीं है| वह इसके लिए नरेद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराते है, और उन्हें ओबीसी विरोधी साबित करने की कोशिश कर रहे हैं|
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार संसद में राहुल गांधी को जवाब दिया है| उन्होंने जवाहर लाल नेहरू की चिठ्ठी का हवाला देकर बताया है कि कांग्रेस कैसे जातिवादी राजनीति और आरक्षण की विरोधी थी| उन्होंने बताया कि कांग्रेस ने ओबीसी को आरक्षण दिया होता तो न जाने कितने आईएएस अफसर तरक्की करके आज भारत सरकार में सचिव के पद पर होते| वैसे उन्होंने कांग्रेस की इस धारणा को भी लोकतंत्र विरोधी बताया है कि देश की नीतियाँ सरकार के सचिव तय करते हैं, उन्होंने बताया कि देश की नीतियाँ चुनी हुई सरकार के मंत्री और प्रधानमंत्री तय करते हैं, और प्रधानमंत्री खुद ओबीसी जाति से है|
इसी के जवाब में राहुल गांधी ने यह कहना शुरू किया है कि मोदी जन्मजात ओबीसी नहीं हैं, इसलिए वह जातीय जनगणना नहीं करवाएंगे और ओबीसी का आरक्षण कोटा नहीं बढ़ाएंगे| उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी ने खुद को ओबीसी कैटेगिरी में शामिल कर लिया है, जो कि तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत है|
राहुल गांधी ने मोदी पर फिर से व्यक्तिगत हमला तो कर दिया, लेकिन यही सवाल उनसे भी पूछा जा सकता है कि वह जन्म से क्या हैं, हिन्दू हैं या पारसी हैं| उनके दादा फिरोज जहांगीर गांधी तो पारसी थे, फिर वह दतात्रेय गौत्र के ब्राह्मण कैसे हो सकते हैं| पहला हमला उन्होंने किया है, अब चुनावों में यह सवाल उनसे भी पूछा जाएगा|
राहुल गांधी की इस बात में क्या वजन है कि क्योंकि मोदी जन्म से ओबीसी नहीं इसलिए वह जाति आधारित जनगणना नहीं करवाएंगे और ओबीसी का आरक्षण कोटा नहीं बढ़ाएंगे| क्या जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने इसीलिए जाति आधारित जनगणना नहीं करवाई थी क्योंकि वे ओबीसी नहीं थे| ओबीसी आरक्षण की नींव रखने वाले मोरारजी देसाई, आरक्षण देने वाले वीपी सिंह क्या ओबीसी थे?
राहुल गांधी कह रहे हैं कि मोदी ओबीसी को बेवकूफ बना रहे हैं, लेकिन वास्तव में कौन बेवकूफ बना रहा है| सच यह है कि सुप्रीमकोर्ट ने आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा तय की हुई है, राहुल गांधी सत्ता में आने पर आरक्षण की सीमा बढ़ाने का वादा कर रहे हैं, जो वह कभी पूरा नहीं कर सकते, क्योंकि सुप्रीमकोर्ट कोटा बढ़ाने की याचिका एक नहीं अनेक बार नामंजूर कर चुकी है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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