क्या किसी विवाद की आड़ में देशव्यापी हिंसा मंजूर है ?
नई दिल्ली, 13 जून। क्या एक विवादित बयान के आधार पर देशव्यापी हिंसा को जायज ठहराया जा सकता है ? किसी भी गलती की सजा कानून तय करता है। कोई व्यक्ति या संगठन नहीं। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है। लेकिन इसकी आड़ में हिंसा और आगजनी की घटना जंगल की आग की तरह फैल रही है। पूरे भारत में हिंसा का वातावरण तैयार तैयार कर देश को अस्थिर किया जा रहा है। इस हिंसा पर कड़ाई से रोक लगनी चाहिए। जिस तरह से धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है वह देश और समाज के लिए घातक है।

हेट स्पीच के मामले में सिर्फ नूपुर शर्मा पर ही क्यों उंगली उठायी जा रही है ? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर मुस्लिम नेताओं के 15 हेट स्पीच की सूची सौंपी गयी है। इस सूची में मुस्लिम नेताओं और मौलवियों के नाम और उनके बयान हैं जिनमें उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ नरसंहार और जिहाद की बात कही है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से गुहार लगायी है कि ऐसे मुस्लिम नेताओं खिलाफ एफआइआर दर्ज की जानी चाहिए। कानून अपना काम कर रहा है। लेकिन इन नेताओं की गिरफ्तारी की मांग के लिए हिंदू समुदाय ने तो हिंसक प्रदर्शन नहीं किया ?

क्या लोकतंत्र में विरोध के नाम पर हिंसा स्वीकार है ?
रांची में हिंसक प्रदर्शन के दौरान दो लोगों की मौत हो गयी । पश्चिम बंगाल में हिंसा का दौर जारी है। कुछ लोग जानबूझ कर इस आग को हवा दे रहे हैं। हिंसा पर काबू पाना सरकार का दायित्व है। जिन राज्य सरकारों ने लापरवाही बरती वहां हालात खराब हुए। साम्प्रदायिक तनाव के लिए उत्तर प्रदेश जाना जाता है। लेकिन खून-खराबा हुआ रांची में। उत्तर प्रदेश में तो सबसे अधिक हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं लेकिन वहां तो गोली चलाने की नौबत नहीं आयी। फिर रांची में ऐसा हो गया ? पश्चिम बंगाल में भी उपद्रव चरम पर पहुंच गया। भाजपा के कार्यालय को जला दिया गया। हावड़ा में दो दिनों से हिंसा जारी है और राज्य सरकार इसे भाजपा के पाप की नतीजा बता रही है। आरोप लगा रहा है कि कुछ राज्य सरकारें जान बूझ कर ढिलाई बरत रही हैं ताकि भाजपा के खिलाफ एक जबर्दस्त माहौल तैयार हो। रांची के हिंदपीढ़ी इलाके में जब लोग जमा हो रहे थे तब पुलिस क्यों सोयी रही। किसी धार्मिक स्थल के पास इतने पत्थर जमा होते रहे और पुलिस को भनक तक नहीं लगी, आखिर क्यों ? इसका नतीजा ये हुआ कि पत्थरबाजी में कई पुलिस वाले घायल हो गये। जब भीड़ बेकाबू हो गयी तो गोलीबारी भी हुई। दो लोगों की मौत दुखद घटना है। झारखंड के मुख्यमंत्री ने समय रहते स्थिति को नियंत्रित क्यों नहीं किया ? क्या सरकार ने जानबूझ कर समय रहते सख्ती नहीं की ? यही स्थिति पश्चिम बंगाल की है। वहां पहले हिंसा पर काबू पाना जरूरी है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के लिए तो बाद में भी समय मिलेगा। लेकिन अगर जान-माल का कोई नुकसान हुआ तो कौन जिम्मेदार होगा ?

स्वीडन ने हिंसक प्रदर्शन पर कैसे पाया था काबू
करीब दो महीना पहले यूरोपीय देश स्वीडन में जबर्दस्त साम्प्रदायिक हिंसा फैली थी। इस घटना में 40 लोग घायल हुए थे। कई वाहन जला दिये गये थे। उपद्रवी भीड़ को काबू करने के दौरान 9 पुलिस वाले घायल हो गये। तब पुलिस को गोली चलानी पड़ी थी। जिसमें तीन लोग जख्मी हुए थे। वहां की पुलिस ने जांच में पाया था कि एक गैंग के नेटवर्क ने ये हिंसा फैलायी थी। विवाद शुरू हुआ था एक धर्मग्रंथ की बेअदबी से। इसकी वजह से मुस्लिम समुदाय के लोग उग्र हो गये थे। इस पर सरकार ने कहा था कि जिस व्यक्ति ने धर्मग्रंथ से बेअदबी की है वह एक ' दक्षिणपंथी बेवकूफ' है। स्वीडन एक लोकतांत्रिक देश है और इसमें 'बेवकूफों' को भी अभिव्यक्ति की आजादी हासिल है। लेकिन जो पुलिस पर हमला कर रहे हैं वे अपराधी माने जाएंगे। किसी भी हाल में हिंसा मंजूर नहीं। इसलिए हिंसक प्रदर्शन कर रहे लोगों पर सख्ती से निबटने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। स्वीडन की सरकार ने सख्ती की लेकिन वहां इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया गया। या इसके आधार पर सरकार को हिलाने की कोसिश नहीं की गयी। लेकिन भारत की स्थिति दूसरी है। यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। लेकिन यहां राजनीतिक दलों के अलग अलग हित हैं। वे हिंसा में भी अलग-अलग रंग खोजने लगते हैं।

क्या बाहरी नेटवर्क फैला रहा है देश में हिंसा ?
इस विवाद की आड़ में अराजक तत्व अपने नापाक मंसूबे पूरा करना चाहते हैं। स्वीडन में एक गैंग के नेटवर्क ने हिंसा फैलायी थी। माना जा रहा है कि इसी पैर्टन पर रांची में भी हिंसा भड़की है। चर्चा है कि उत्तर प्रदेश के कुछ लोग एक हफ्ते से रांची में डेरा डाले हुए थे। उन्होंने ने ही हिंदपीढ़ी के लोगों को हिंसा के लिए उकसाया था। वैसे ये जांच का विषय है। रांची में जब हिंसा फैली थी तब बिहार के मंत्री नितिन नवीन भी उसमें फंस गये थे। वे एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पटना से रांची गये हुए थे। उनकी गाड़ी जब रांची की मुख्य सड़क से गुजर रही थी तब एक बहुत बड़ी भीड़ ने उनकी कार को चारो तरफ से घेर लिया। कार पर हमला कर उसके शीशे तोड़ दिये गये। मंत्री का कहना है कि चालक की सूझबूझ के कारण ही उनकी जान बची थी। मंत्री का आरोप है कि झारखंड सरकार ने उनकी सुरक्षा के लिए केवल पुलिस जवान दिये थे। रांची की हिंसा बहुत लोगों के लिए आश्चर्य का विषय है क्यों कि वहां हालात इतने बदतर नहीं थे।
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