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Savings by Indians: खर्च बढ़ाने के खेल में बचत की मानसिकता हुई फेल

नयी कर प्रणाली में लोगों को बचत की बजाय खर्च के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। बाजार की मांग को बनाये रखने के लिए सरकार को ऐसा करना जरूरी लगता है। लेकिन बचत में कमी आयी तो क्या इससे अर्थव्यवस्था प्रभावित नहीं होगी?

budget new tax system encouraged to spend instead of saving

Savings by Indians: भारत दुनिया के समक्ष एक बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दौड़ में है। 5 ट्रिलियन से लेकर 10 ट्रिलियन तक की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए खर्च को प्रोत्साहित किया जा रहा है। बड़े पैमाने पर हो रहे खर्च के प्रोत्साहन का ही नतीजा है कि हम बचत के मोर्चे पर बिल्कुल नीचे आ गए हैं। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक महंगाई और खर्च बढ़ने के कारण भारतीय परिवारों की वित्तीय बचत घटकर करीब 35 साल के निचले स्तर पर आ गई है।

वित्त वर्ष 2022-23 की पहली छमाही में घरेलू बचत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4% के बराबर दर्ज की गई थी। वित्त वर्ष 2021-22 में यह 7.3% के स्तर पर थी, जबकि वर्ष 2020-21 में यह 12% की ऊंचाई पर थी। इसे कुल धनराशि के रूप में देखें तो पिछली छमाही में कुल बचत मात्र 5.2 लाख करोड़ की रह गई है जो एक साल पहले की समान छमाही में 17.4 लाख करोड़ की थी।

ऐसे में आने वाले दिनों में अगर बचत में तेजी नहीं लाई जाती तो अर्थव्यवस्था में खपत और निवेश दोनों ही प्रभावित होते दिखने लगेंगे। घरेलू बचत को बढ़ाने के लिए हमें छोटी बचत योजनाओं को ब्याज दर के मद्देनजर और आकर्षक बनाए जाने की जरूरत है। हालांकि सरकार ने बजट 2023-24 में बचत प्रोत्साहन के लिए कई योजनाओं की घोषणा की है। महिलाओं, बुजुर्गों के लिए अलग से बचत प्रोत्साहन की स्कीमों के साथ-साथ मियादी जमा पर भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी का ऐलान किया गया है। लेकिन आयकर ढांचे में छूट की सीमा 5 लाख से बढ़ाकर 7 लाख किया जाना बचत को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा। यह ठीक है कि सरकार ने अपनी ओर से यह विकल्प दिया है कि उपभोक्ता अपनी इच्छा अनुसार टैक्स स्लैब का चयन कर सकता है, और जो उपभोक्ता बचत को प्राथमिकता देते हैं, वह पुराने ढांचे में भी रह सकते हैं। लेकिन स्वाभाविक रूप से यह व्यवहारिक नहीं लगता है। वैसे भी सहज उपलब्ध कर्ज की स्थिति में देसी विदेशी कंपनियों के चमचमाते शोरूम में सजे सामानों को घर ले आने के लोभ से कौन बच पायेगा?

भारतीय जनमानस का आर्थिक सिद्धांत सदैव से यही मानता रहा है कि "खर्चे में कटौती का नाम ही आमदनी है", लेकिन पश्चिम दुनिया की तर्ज पर उदारीकरण के बाद भारत जैसे प्राचीन और पारंपरिक मूल्यों वाले देश में भी "खर्च जितना बढ़ाएंगे, आमदनी भी उसी अनुपात में बढ़ेगी" के यूरोपीय आर्थिक सूत्र का पालन आमतौर पर किया जा रहा है। यही कारण है कि एक बटन दबाते ही मुनाफा कमाने के लिए बाजार में बैठी कंपनियां लाखों करोड़ों का सामान उपभोक्ताओं के दरवाजे पर लेकर पहुंच रही हैं। सरकार का भी दावा है कि उत्पादन के लिहाज से खर्च में वृद्धि के कारण देश में विकास का पहिया तेजी से घूम रहा है।

दुनियाभर में कोरोना की महामारी और वैश्विक मंदी की आशंका के बावजूद भारत का उपभोक्ता बाजार अपना खर्च बढ़ाने पर उतारू है। इसे हम देश में बिक रही लग्जरी गाड़ियों, महंगे इलेक्ट्रॉनिक सामानों, ब्रांडेड पहनावे और गहनों की खरीदारी के उदाहरण से समझ सकते हैं। एक तरफ गाड़ियों का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और दूसरी तरफ खरीददारों की प्रतीक्षा सूची भी लंबी होती जा रही है। फिलहाल भारतीय बाजार में कम दाम से लेकर और महंगे दाम तक की सभी गाड़ियों पर प्रतीक्षा सूची महीनों की बताई जा रही है। कर्ज लेकर खर्च बढ़ाने का यह चार्वाकी दर्शन हमारी लगातार कम हो रही बचत पूजी को कहीं बिल्कुल ही स्वाहा ना कर दे।

सरकार ने अपने बजट में बचत के निवेश के बेहतर विकल्प पर ध्यान दिया है। नई कर व्यवस्था में वेतनभोगी व्यक्ति को ₹50,000 की मानक कटौती का लाभ देने और परिवार पेंशन से 15 हजार तक कटौती करने का प्रस्ताव आया है। बजट में वरिष्ठ नागरिक खाता स्कीम की सीमा ₹15 लाख से बढ़ाकर ₹30 लाख कर दी गई है। इसके साथ ही एकाकी वरिष्ठ खाताधारकों के लिए भी जमा राशि की सीमा दोगुना कर दी गई है। महिला सम्मान बचत पत्र के तहत 2 लाख रुपए की बचत पर 7.5% का ब्याज दिए जाने की घोषणा हुई है।

सरकार की घोषणा के बाद देश में सरकारी बैंको के साथ साथ डीसीबी बैंक, इंडसइंड बैंक, स्मॉल फाइनेंस बैंक, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक ने भी बचत पर ब्याज दरें बढ़ा दी है। बुजुर्गों के लिए मियादी जमा पर 7.5% से लेकर 8.10% तक की ब्याज दर की घोषणा बैंकों ने की है। लेकिन कई अर्थशास्त्री इसे नाकाफी बताते हैं।

कोविड-19 की चुनौतियों से लेकर महंगाई की मार के बीच देश में आम आदमी के सामने बड़ी चिंता बचत योजनाओं को लेकर ही है। आम आदमी जो दिन भर कमाता है, शाम होते-होते सब खर्च भी हो जाता है। कोरोना के बाद रूस यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ने से वैश्विक खाद्यान्न उत्पादन में भी कमी आई है। इसी बीच अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा 2023 में मौद्रिक नीति को सख्त बनाए जाने से डॉलर की तुलना में रुपए की कीमत चिंतनीय स्तर तक घट गई।

हालांकि वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था अब भी गतिशील है और कारोबार से कर्ज की मांग भी बनी हुई है। पर दिक्कत यह है कि बैंकों में कर्ज के मुकाबले जमा की रफ्तार बिल्कुल धीमी है। रिजर्व बैंक के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि बैंकों की ऋण वृद्धि दर जमा वृद्धि दर की तुलना में डेढ़ गुना से भी अधिक है। ऐसे में तमाम बैंकों में बढ़ते ऋणों की जरूरत के मद्देनजर जमा धनराशि बढ़ाने के लिए सावधि जमा पर ब्याज दरों में वृद्धि की होड़ लग गई है।

वस्तुत देश में बचत की प्रवृत्ति के लाभ आमजन के साथ ही समाज और अर्थव्यवस्था के लिए भी है। अधिक बचत की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि हमारे यहां विकसित देशों की तरह सामाजिक सुरक्षा का उपयुक्त ताना-बाना नहीं है। ऐसे में छोटी बचत योजनाएं अपनी खास विशेषताओं के कारण आज भी आम आदमी के विश्वास और निवेश का माध्यम है। सरकार को इसे और पुख्ता बनाने की दिशा में कारगर कदम उठाना चाहिए।

भारतीयों की प्रवृत्ति हमेशा से बचत की रही है। वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी में जब दुनिया के देशों में हाहाकार मचा था, भारतीयों ने अपनी घरेलू बचत के दम पर उस विपदा की आंच भारत पर नहीं आने दी। कोरोना के दौरान भी जब सारे तंत्र ने एक तरह से हाथ खड़े कर दिये थे तब भारतीयों की घरेलू बचत विश्वसनीय हथियार के रूप में काम आई। नेशनल सेविंग इंस्टीट्यूट द्वारा भारत में निवेश की प्रवृत्ति से संबंधित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि लोगों के लिए छोटी बचत योजनाएं लाभप्रद हैं। बचत का कोष बढ़ेगा तो निवेश का आंकड़ा भी बढ़ाया जा सकेगा। इसलिए बचत को हतोत्साहित करने वाली नीतियां दीर्घकाल में भारत की अर्थव्यवस्था की नींव को हिला सकती हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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