Brokers and Middlemen: किसान और उपभोक्ता, दोनों का शोषण करते हैं बिचौलिये
बढ़ती महंगाई के बीच उत्पादक और उपभोक्ता के बीच बिचौलियों की मनमानी पर नियंत्रण रखने की जरूरत है। वरना ये बिचौलिये जहां एक ओर किसानों एवं छोटे उत्पादकों का हक मारते हैं वहीं दूसरी ओर ग्राहकों को भी लूटते हैं।

Brokers and Middlemen: जब हम आर्थिक तौर पर देश की मजबूती की बात करते हैं तो हमारे सामने मोटे तौर पर दो बड़े सवाल खड़े होते हैं। पहला, आम आदमी की विकास में सहभागिता और उपयोगिता तथा दूसरा, अपने पारंपरिक आर्थिक तंत्र को बचाए रखते हुए नवाचार में देश के नागरिकों की भागीदारी। अर्थशास्त्र का एक स्थापित सत्य है कि जब नागरिकों के हाथ में पैसा आता है तो उनके द्वारा खर्च भी बढ़ता है। इस आय व्यय के समानुपाती रोजगार चल निकलता है और देश की अर्थव्यवस्था मजबूती पाती है।
लगभग एक दशक पहले केंद्र की तत्कालीन संप्रग सरकार ने जब भारत के खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी थी तब यह कहा गया था कि इससे देश में बड़े-बड़े निवेश आएंगे और बड़ी कंपनियां खड़ी होंगी। बिचौलियों की भूमिका खत्म हो जाएगी और उपभोक्ताओं को आदर्श मूल्य पर जरूरी चीजें उपलब्ध होंगी। यहां तक कि कृषि प्रधान देश भारत के किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य मिलेगा।
सरकार ने यह दलील दी थी कि कृषि उपज व विपणन क्षेत्र में निवेश आने से किसानों की हालत सुधरेगी, क्योंकि कृषि उपज आपूर्ति श्रृंखला कई टुकड़ों में बंटी है। उसमें बुनियादी सुविधाओं का अभाव है जिससे उत्पादक और उपभोक्ता दोनों परेशान है। उपभोक्ता वस्तुओं के महंगे दाम चुकाते हैं लेकिन इसका लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता।
गुजरे सालों में ढेर सारे मल्टीनेशनल ब्रांड बाजार में आए लेकिन सभी अपनी बैलेंस शीट मजबूत करने में ही लगे रहे। मंडियों से बिचौलिए तो खत्म नहीं हुए, बल्कि नए किस्म के कुछ बड़े बिचौलिए जरूर स्थापित हो गए। तमाम कायदे कानून बनाए जाने के बावजूद मंडियों में बिचौलियों का एक तरह से कब्जा है। बानगी के तौर पर एशिया की सबसे बड़ी अनाज एवं सब्जी मंडी आजादपुर के तौर तरीकों से हम इसे ठीक से समझ सकते हैं। आजादपुर मंडी में कुल 300 के आसपास बिचौलियों (आढ़तियों) का बोलबाला है। यदि कोई व्यक्ति यहां कारोबार करने के लिए लाइसेंस लेना चाहे तो उसे आसानी से नहीं मिलेगा, क्योंकि यहां पहले से जमे हुए बिचौलियों को डर है कि कारोबारियों की संख्या बढ़ने से उनका एकाधिकार समाप्त हो जाएगा।
कृषि विपणन अधिनियम 1954 में स्पष्ट प्रावधान है कि किसानों की फसल की बिक्री या नीलामी खुले में की जाएगी, लेकिन हकीकत यह है कि प्रतिदिन सैकड़ों क्विंटल माल की खरीद फरोख्त कपड़े के अंदर उंगलियों के इशारों में हो जाती है। किसान की साल भर की खून पसीने की कमाई चंद मिनटों में ओने पौने दाम में लूट ली जाती है। कमोबेश यह स्थिति देश भर की अन्य छोटी बड़ी मंडियों की भी है।
केंद्र की मौजूदा राजग सरकार ने बिचौलियों की इस बाड़ेबंदी को ध्वस्त करने के लिए कदम उठाते हुए तीन कृषि कानूनों का प्रस्ताव पास किया, लेकिन विपरीत परिस्थितियों के कारण सरकार को अपने कदम वापस खींचने पड़े। हकीकत यह है कि बिचौलियों की पहुंच काफी दूर तक है। सत्ताधारी और विपक्षी सभी दलों से इनका सीधा संबंध है। सभी राजनीतिक दलों से उनका संपर्क है। चूकि भारत में महंगे चुनाव का प्रचलन है और चुनाव में यह बिचौलिए मोटा चंदा देते हैं तो फिर आम आदमी के हितों की चिंता किसे और कैसे होगी?
देश के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकाधिक शीत भंडार गृह स्थापित करने, उनमें रखी फसल के एवज में बैंकों द्वारा किसानों को जमा राशि पर ऋण मुहैया कराने तथा उन रसीदी दस्तावेजों के क्रय विक्रय की सम्यक मांगे होती रही हैं। अगर ऐसी व्यवस्था हो तो किसान को फसल आते ही अपनी जींस सस्ते में बेचने की विवशता नहीं होती। उसे भारी राहत मिलती। साल भर जी तोड़ मेहनत कर आज देश के आलू, प्याज, टमाटर उत्पादक किसान खून के आंसू रो रहे हैं।
मुनाफा तो दूर की कौड़ी है उनकी लागत भी नहीं निकल पा रही है। अपने उत्पादों को किसान खुद ही ट्रैक्टर चलाकर खेतों में ही नष्ट कर रहे हैं, क्योंकि जितनी मजदूरी लगाकर और परिवहन व्यय खर्च करने के बाद अपना उत्पाद लेकर मंडियों में जा रहे है, वहां उन्हें मजदूरी और परिवहन का भी खर्चा नहीं मिल रहा है।
इस बीच खबर है कि दुनिया की दिग्गज रिटेल कंपनी वॉलमार्ट भारत में अपने कारोबार का और अधिक विस्तार करने जा रही है। इस निमित्त कंपनी के उच्च अधिकारियों ने उनके मातहत काम करने वाली कंपनियों को रणनीति के साथ आगे बढ़ने की और भारत को चीन से बड़ा बाजार बनाने का टास्क दिया है। संभव है कि इन कंपनियों की पहुंच देश के दूरदराज छोटे बड़े इलाकों में भी होगी। इनका भी दावा है कि उनके स्टोर से उपभोक्ताओं को वाजिब मूल्य पर सामान मिलेगा तथा किसानों को उनकी उपज की अधिकाधिक कीमत।
भारत में 88% खुदरा कारोबार गली, नुक्कड़, चौराहे पर होता है। हमारा पारंपरिक खुदरा बाजार 5 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है। ऐसे में बड़े मल्टीनेशनल ब्रांड हमारे खुदरा व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं। रोजगार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अगर कोई गलतफहमी ना पाली जाए तो कोई भी विदेशी कंपनी परोपकार के लिए नहीं आती। हर कंपनी का एक ही धर्म होता है मुनाफा कमाना। संभव है कि बड़ी कंपनिया बिचौलियों से सांठगांठ कर आगे बढ़ें, अथवा सबसे बड़े बिचौलिए के रूप में खुद को स्थापित कर लें।
मुद्रास्फीति को काबू करने के लिए सरकार लगातार कोशिश कर रही है, लेकिन सरकार यह क्यों नहीं सोच रही है कि किसानों की उपज और बाजार में मौजूद खाद्य उत्पादों की कीमत में इतनी बड़ी खाई क्यों है? अगर सरकार किसानों की हमदर्द नहीं हो सकती तो किसी व्यापारी से आम नागरिकों का हित तलाशना "चील के घोसले में मांस खोजने" जैसा ही होगा।
विविधताओं से पूर्ण भारत अन्य विकासमान और उभरते बाजारों से सर्वथा भिन्न है। भारत के पास उद्यमियों का बड़ा वर्ग है, जिनके पास अपार समृद्धि है। भारत की अधिकांश आबादी गांव में रहती है और खुदरा बाजार और इस बाजार के व्यापारियों का एक पारंपरिक तंत्र पहले से मौजूद है। खुदरा बाजार का देश के सकल घरेलू उत्पाद में 15% से अधिक का योगदान है। ऐसे में जरूरी है कि खुदरा बाजार के इस पारंपरिक तंत्र को बचाया जाए, साथ ही बिचौलियों से किसानों की रक्षा की जाए। यह इसलिए ताकि खुदरा व्यापारियों एवं किसानों को उनकी मेहनत का अपेक्षित फल मिल सके।
देश के लोगों के हाथ में पैसा रहेगा तो बाजार अपने आप बढ़ेगा और बाजार गति के साथ चलेगा तो देश आर्थिक ऊंचाई को प्राप्त कर सकेगा। इसलिए जरूरी है कि सरकार हर प्रकार के बिचौलियों को हतोत्साहित करे। फिर वह चाहे किसी मंडी में बैठा हो या फिर किसी कॉरपोरेट हाउस में। बिचौलियों पर कमर कसकर नजर रखने की जरूरत है ताकि किसी भी व्यापार पर उनका एकाधिकार न होने पाये।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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