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BJP in North East: राजनीतिक लाभ से ज्यादा स्वीकार्यता का संतोष

भारत से कितने लोग होंगे जिन्होंने सूदूर त्रिपुरा या फिर नागालैण्ड की यात्रा की होगी। जब सीधे तौर पर लोग ही वहां से नहीं जुड़े तो फिर वहां की राजनीतिक घटनाओं में भी रुचि क्योंकर होगी?

BJP in North East politics Satisfaction of acceptance more than political gain

BJP in North East: नार्थ ईस्ट या फिर उत्तर पूर्व को शेष भारत के लोग इस रूप में ही जानते समझते हैं कि वो हमारे जैसे नहीं होते। दिल्ली में कई जगह तो उन्हें चिंकी कहकर संबोधित किया जाता रहा है। उनके नैन नक्श और भाषा के कारण कई बार उन्हें चाइनीज तक बता दिया जाता है। उनके लिए यह सब स्वाभाविक तौर पर अपमानजनक ही होगा जो भारत के होकर भी शेष भारत में विदेशी बन जाते हैं।

संयोग से भारत सरकार के स्तर पर नार्थ ईस्ट के लोगों के साथ मेलजोल बढाने के उपाय लंबे समय से चल रहे हैं। उनके हस्तशिल्प, कारीगरी और भोजन संस्कृति से जुड़े आयोजन भारत सरकार के प्रयास से दिल्ली में होते रहते हैं। लेकिन मेलजोल का यह प्रयास भी दिल्ली तक ही सिमटकर रह जाता है। शेष भारत तब भी उनसे लगभग अनजान ही रहता है, फिर उनकी राजनीति में भला लोगों की क्या रुचि होगी?

भारत के लोग नार्थ ईस्ट की राजनीति के बारे में कुछ जाने या न जाने लेकिन भारतीय राजनीति की सच्चाई यह है कि देश में वास्तविक अर्थों में राष्ट्रीय दल वही साबित हुआ जिसने नार्थ ईस्ट के राज्यों में सरकारें बनायीं। कुल 25 लोकसभा सीटों वाले वहां के आठ राज्यों का राजनीतिक महत्व ऐसा है कि बिना यहां जीते कोई भी दल पूरे देश के प्रतिनिधित्व का दावा नहीं कर सकता।

इसका एक बड़ा कारण उत्तर पूर्व की विविधता है। उत्तर पूर्व में मुख्य रूप से हिन्दू और ईसाई बहुलता वाले राज्य हैं। लेकिन इनसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि लगभग पूरा उत्तर पूर्व पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्र है। यहां की दुर्गम बनावट में जो बसावट है उसमें कल्पना से भी अधिक सांस्कृतिक विविधता है। उदाहरण के लिए नागालैण्ड को ही देखें तो वहां की जनसंख्या 19 लाख के आसपास है लेकिन 19 लाख की जनसंख्या वाले राज्य में 17 भाषाएं बोली जाती हैं। 17 प्रमुख जनजातियों सहित कुल 22 जनजातियां हैं। इसके अलावा पंजाबी, नेपाली, मारवाड़ी और बंगाली हैं वो अलग।

कमोबेश ऐसा ही हाल नार्थ ईस्ट के अधिकांश राज्यों का है। 30-32 लाख की आबादी वाले मेघालय में आठ से दस भाषाएं बोली जाती हैं जो उनके जनजातीय अस्तित्व के साथ जुड़ी हुई है। त्रिपुरा जो कि बंगाली बहुल राज्य है वहां भी जनजातियों का प्रभाव है जो राज्य की विविधता में चार चांद लगाते हैं।

कहने का आशय यह है कि नार्थ ईस्ट में इतनी विविधता है कि अगर किसी दल को नार्थ ईस्ट समझ आ जाए, और वह वहां सफल हो जाए तो उसके बारे में ये कहा जा सकता है कि वह राजनीतिक रूप से बहुत परिपक्व हो गया है। वहां की राजनीतिक जटिलताओं को समझना और उसके अनुरूप अपने आप को ढालकर वहां सफल होना किसी राष्ट्रीय दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। अभी तक पूरे नार्थ ईस्ट में कमोबेश कांग्रेस का ही शासन रहा है इसलिए वहां सीट जीतने से अधिक राजनीतिक स्वीकार्यता का संतोष मिलता था।

भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी इस बात को समझते थे। इसलिए 2014 में जब वो प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने नार्थ ईस्ट में राजनीतिक रूप से सफल होने पर पूरा जोर दिया। भाजपा की जैसी बनावट थी उसे देखते हुए भाजपा का नार्थ ईस्ट में सफल होना आसान नहीं लग रहा था। असम के अलावा बाकी के राज्यों में धार्मिक ध्रुवीकरण भी ऐसा संभव नहीं था कि भाजपा वहां पैर जमा पाती। लेकिन इस असंभव को संभव किया नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम ने। इसलिए त्रिपुरा और नागालैण्ड में जब बीजेपी की सरकार बनी तो दिल्ली से नरेन्द्र मोदी ने इसे अपनी व्यक्तिगत जीत बताया। खासकर नागालैण्ड में बीजेपी की जीत तो सचमुच एक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि कही जाएगी।

नार्थ ईस्ट के राज्यों की राजनैतिक हैसियत यह नहीं है कि उनकी विधानसभाओं में अधिक विधायक हैं या फिर वहां से ज्यादा संख्या में सांसद चुनकर आते हैं। नार्थ ईस्ट राज्यों का महत्व इस बात को लेकर है कि वहीं के राज्य किसी पार्टी को वास्तविक अर्थों में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा देते हैं। नार्थ ईस्ट के 6 राज्यों में सीधे या गठबंधन की सरकार बनाकर भाजपा ने बड़ा संदेश दिया है कि वास्तविक अर्थों में अब वही इकलौती ऐसी राष्ट्रीय पार्टी है जिसे नार्थ ईस्ट ने भी स्वीकार कर लिया है। इसीलिए नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली से ऐलान किया है कि वह दिन दूर नहीं जब केरल में भी भाजपा की सरकार होगी। यानी, भाजपा सीट के मुताबिक ही सबसे बड़ा दल नहीं रहेगी बल्कि क्षेत्र और समुदायों के अनुसार भी भारत की सर्वस्पर्शी पार्टी बन जाएगी।

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    किसी राजनीतिक दल को भला इससे अधिक और क्या चाहिए कि इतनी सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई विविधता वाले देश के हर कोने में उसे स्वीकार कर लिया जाए। खासकर पूर्वोत्तर में भाजपा के वर्चस्व का एक सीधा संदेश यह भी है कि मुस्लिम विरोधी होने का आरोप झेल रही भाजपा के साथ अब ईसाई मतदाताओं को कोई समस्या नहीं है। यही कारण है कि जीत के जश्न के मौके पर मोदी ने केरल का नाम लिया है। अगर पूर्वोत्तर में हिन्दू ईसाई एकसाथ भाजपा के साथ आ सकते हैं तो केरल में क्यों नहीं?

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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