Bihari in Tamilnadu: क्या बिहारियों को देशभर में मार खाने की आदत डाल लेनी चाहिए?
तमिलनाडु में बिहारी कामगारों के साथ मारपीट की विरोधाभाषी खबरें आ रही हैं। सोशल मीडिया के वीडियो इन्हें सही तो वहीं दोनों राज्यों के पुलिस अफसर इन्हें फर्जी बता रहे हैं।

Bihari in Tamilnadu: तमिलनाडु से बिहारी मजदूरों को दौड़ा दौड़ाकर मारने, धारदार हथियारों से घायल करने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। बताया ये जा रहा है कि तिरुपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में काम करनेवाले बिहारी मजदूरों को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वो बिहारी हैं और हिन्दी बोलते हैं। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर ऐसे दावों को फेक बताया जा रहा है लेकिन कुछ मजदूर जो लौटकर बिहार आ रहे हैं, वो मीडिया से बात करते हुए ऐसी घटनाओं की पुष्टि कर रहे हैं।
बहरहाल मामला अकेले तमिलनाडु का तो है नहीं। पूरब से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक, असम-मणिपुर हो या कर्नाटक, पंजाब या कश्मीर हो या फिर तमिलनाडु, बिहारियों के खिलाफ हिंसा न हो, ऐसा शायद ही कोई राज्य होगा। भारत भर को मजदूरों की सप्लाई करने वाले भारत के इस उपनिवेश के निवासियों के साथ ऐसी घटनाएं होती भी हैं तो किसी की संवेदनाएं छलक कर बाहर नहीं आती।
नीरो के बांसुरी बजाने वाली कहावत की तर्ज पर कहा जाये तो जब बिहारी मजदूरों को तमिलनाडु में हिन्दी भाषा के कारण पीटा जा रहा था, उस वक्त बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव तमिलनाडु के ही मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर केक खा रहे थे। हिंदी बोलने के कारण या फिर सिर्फ बिहारी होने के कारण जो हिंसा झेलनी पड़ती है, वो बिहारियों के लिए कोई नई बात नहीं है।
इससे पहले भी बिहारियों को अलग अलग जगहों पर हिंसा का सामना करना पड़ा है। बिहार से 1980-2005 के दौर में जो पलायन होता रहा, वो "सुशासन" के आने से कोई थमा नहीं था। गरीबी की स्थिति यह है कि बिहार में जनसंख्या घनत्व सबसे अधिक और जीडीपी सबसे निचले स्तर पर है। बिहार की एक के बाद एक सरकारों ने पलायन को रोकने के लिए जबानी जमा-खर्च करने से अधिक कुछ नहीं किया। देश भर में अगर 22.15% लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं तो बिहार में ये आंकड़ा बढ़कर 30.6% का होता है।
"द हिन्दू" में 2013 में छपी एक खबर के मुताबिक तमिलनाडु में प्रवासी मजदूरों को दैनिक 300 से 400 रुपये दिए जाते थे जबकि तय न्यूनतम मजदूरी 750 रुपये थी। प्रवासी मजदूरों के भागने से स्थानीय मजदूर रखने पड़ते और कंपनियों के लिए खर्च बढ़ता। राज ठाकरे ने 2012 में "टाइम्स ऑफ इंडिया" को दिए अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि बिहारियों के लिए मुंबई में कोई जगह नहीं बची। हमारे शहरों को तबाह करके ये लोग तो अपने गांव लौट जायेंगे मगर हम लोग कहां जायेंगे?
ऐसा भी नहीं कि केवल दक्षिणी राज्यों में इस तरह के बयान बड़े नेताओं ने दिए हैं। इस सिलसिले में आसानी से दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का बयान भी याद आ जाता है, जिसने कहा था कि दिल्ली की आधारभूत संरचनाओं पर बिहारी एक बोझ हैं। करीब-करीब यही बात दोहराते हुए केजरीवाल ने कहा था कि पांच-पांच रुपये में बिहारी दिल्ली के अस्पतालों में इलाज करवाने आ जाते हैं। दिल्ली और केजरीवाल की यही नियत तब भी दिखी थी जब कोविड-19 के लॉकडाउन के दौर में बिहार के मजदूरों को दिल्ली से पैदल, भूखे-प्यासे खदेड़ दिया गया था।
सिर्फ पिछले दस-पंद्रह वर्षों की बात करें तो बिहार से रेलवे भर्ती की परीक्षाएं देने छात्रों को राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस के गुंडों ने 20 अक्टूबर 2008 को पीट दिया था। हजारों छात्रों की इस पिटाई में एक छात्र की और बाद में कल्याण के पास एक गाँव में चार लोगों की मौत हो गयी थी। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उस वक्त भी हाथ जोड़े और महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख से हिंसा रुकवाने का निवेदन करते गिड़गिड़ाते दिखे थे। इस दौर में रेलवे भर्ती परीक्षाओं में स्थानीय भाषाओं को ममता बनर्जी द्वारा शामिल किये जाने की तारीफ करते हुए राज ठाकरे ने ये भी कहा था कि अब मराठियों और गैर हिंदी भाषियों को बराबर का मौका मिल सकेगा।
यहां गौर करने लायक ये है कि बिहार में हिंदी नहीं, मैथिली, मगही, भोजपुरी, अंगिका, और बज्जिका जैसी पांच भाषाएं बोली जाती हैं। बिहारियों को हिंदी से कोई विशेष लाभ मिलता हो, ऐसा लगता तो नहीं है। खुद ममता बनर्जी के राज्य की बात करें तो पिछले ही विधानसभा चुनावों में उन्होंने बिहारियों के खिलाफ जमकर जहर उगला था। एक वीडियो भी कोविड-19 काल में दिखा था जिसमें बांग्ला भाषी डॉक्टर एक बिहारी का हिंदी बोलने की वजह से इलाज करने से इंकार कर देता है।
उत्तर पूर्वी राज्यों की बात करें तो बिहारी वहां उल्फा जैसे उग्रवादी संगठनों के निशाने पर रहे हैं। बसों में बिहारियों को सीट से उठा देना असम आदि क्षेत्रों में कोई बड़ी बात नहीं। एएमएसयू जैसे संगठन बिहारियों को मणिपुर नहीं आने देना चाहते। जनवरी 2007 में भी 40 बिहारियों को उल्फा उग्रवादियों ने गोली मार दी थी। सिर्फ 2000 से 2003 के बीच ऐसी ही घटनाओं में 200-300 बिहारियों को क़त्ल कर दिया गया था। महाराष्ट्र के जाने माने नेता बाल ठाकरे ने अपने एक लेख में सामना में लिखा था "एक बिहारी सौ बीमारी, दो बिहारी लड़ाई की तैयारी, तीन बिहारी ट्रेन हमारी, और पांच बिहारी तो सरकार हमारी"।
बिहारियों के प्रति ऐसी घृणा फ़ैलाने में पूरब, पश्चिम, उत्तर दक्षिण, किसी दिशा में कोई पीछे नहीं रहा। बाल ठाकरे की पार्टी की पुरानी सहयोगी रही भाजपा के एमएलए भवानी सिंह राजावत ने कोटा (राजस्थान) में कहा था कि बिहारी छात्र यहां माहौल खराब कर रहे हैं और इन्हें शहर से खदेड़ देना चाहिए। ये तब का बयान था जब 13 मई 2016 में सत्यार्थ नाम के एक छात्र को पीट-पीटकर मार डाला गया था और दूसरा एक छात्र कोटा में घायल पड़ा था।
सिर्फ राजनैतिक दलों ने बिहारियों के प्रति ऐसी घृणा दर्शाई हो, ऐसा नहीं। खुद सरकारी अमला भी बिहारियों को देखते ही एक अलग रुख अख्तियार कर लेता है। ये तब नजर आया था जब बिहार के राहुल राज को 27 अक्टूबर 2008 को मुम्बई पुलिस ने गोलियों से भून डाला और कहा कि वो राज ठाकरे की हत्या करना चाहता था। और तो और सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच करने गयी बिहार पुलिस को ही मुम्बई पुलिस ने पकड़ कर नजरबन्द कर रखा था।
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ऐसे मामलों में अंतिम संस्कार में शामिल होने से अधिक बिहार के नेता कुछ कर भी नहीं पाए। जब बार-बार बिहारियों के खिलाफ ऐसी हिंसा पर किसी को कोई सजा मिलती ही नहीं, छोटी-छोटी बातों पर "स्वतः संज्ञान" ले लेने वालों को ये सब दिखता ही नहीं, तो कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसी घटनाएँ दोहराई भी जाती हैं। ऐसा लगता है कि बिहारियों को चुपचाप मार खाने और मारे जाने की आदत ही डाल लेनी चाहिए!
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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