Kejriwal and MCD Election: केजरीवाल की सफलता का राज क्या है?

Kejriwal and MCD Election: नवंबर और दिसंबर में तीन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभाओं के बाद दिल्ली नगर निगम के चुनावों का भी एलान हो चुका है। इन तीनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी ने भाजपा और कांग्रेस की नींद खराब करना शुरू कर दिया है।

कांग्रेस को अधिक नुकसान
अब तक आम आदमी पार्टी ने दिल्ली, पंजाब और गोवा में कांग्रेस को नुक्सान पहुंचा कर ही बढत हासिल की है। दिल्ली और पंजाब में उसने कांग्रेस से सत्ता हासिल की। गोवा में अगर आम आदमी पार्टी 6 प्रतिशत वोट और दो सीटें हासिल नहीं करती, तो कांग्रेस सत्ता में आ सकती थी।
अब अगर वह हिमाचल प्रदेश और गुजरात में पूरे मनोयोग से चुनाव लडती तो इन दोनों राज्यों में भी कांग्रेस की वोट कटुआ पार्टी ही साबित होती। जिससे उसे विपक्ष को नुकसान पहुँचाने वाली पार्टी के तौर पर पहचाना जाता। इसलिए अरविन्द केजरीवाल की पार्टी ने इस बार संतुलित रणनीति अपनाई है, और हिमाचल का मैदान कांग्रेस के लिए लगभग खुला छोड़ दिया है। जबकि अपने हित को साधने के लिए गुजरात में पूरे मनोबल से चुनाव लड रही है।
गुजरात में उसका लक्ष्य क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करना है, ताकि चार राज्यों में मान्यता होते ही उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल जाए। इसके बाद विपक्षी मोर्चे में उसकी हैसियत बढ़ जाएगी।
कोई माने या नहीं माने, लेकिन धीरे धीरे आम आदमी पार्टी का ग्राफ बढ़ रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अरविन्द केजरीवाल आम जनता को फायदा पहुँचाने वाली नीति बना रहे हैं। जबकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों ने केन्द्रीय राजनीति पर सत्तारूढ़ होने के कारण राष्ट्रव्यापी नीतियाँ बनाते समय बड़े उद्योगपतियों के हितों का ध्यान रखा। वह इन दोनों दलों की मजबूरी भी थी और विकास को गति देने के लिए वक्त की जरूरत भी थी।
अरविन्द केजरीवाल का कार्यक्षेत्र अभी बहुत छोटा है, इसलिए उन्हें बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुँचाने का अवसर ही नहीं मिला। अरविन्द केजरीवाल ने अपनी सारी नीतियाँ सिर्फ वोट बैंक को ध्यान में रख कर बनाई।
कांग्रेस और भाजपा की व्यापक राष्ट्रीय सोच के कारण मध्यम और निम्न वर्ग के हितों की कई बार अनदेखी होती रही। अरविन्द केजरीवाल ने उसी का फायदा उठा कर निम्न और मध्यम वर्ग को सामने रख कर नीति परिवर्तन किया। यही दोनों वर्ग सरकारें बनाते और गिराते हैं।
भले ही भारतीय जनता पार्टी अरविन्द केजरीवाल की नीतियों को रेवड़ी कल्चर कहे, जिसके दूरगामी राष्ट्रीय नुकसान हो सकते हैं, लेकिन अभी केजरीवाल का कार्यक्षेत्र बहुत छोटा है, इसलिए राष्ट्रीय नुकसान की बात न वोटर के पल्ले पडती है, न वोटर का इससे सरोकार है। उस का जीवन आसान हो, उसे उसी से सरोकार है। इसलिए अरविन्द केजरीवाल जब चुनाव घोषणापत्रों में या ज़ुबानी रेवड़ियां बांटने वाले वायदे करते हैं, तो वे वोटरों को प्रभावित करते हैं।
इस असलियत को दोनों बड़ी पार्टियां महसूस भी करती हैं। इसलिए कांग्रेस ने भी इस बार हिमाचल विधानसभा चुनाव में रेवड़ियां बांटने के कई वायदे किए हैं। जो जनता को प्रभावित भी कर रहे हैं, खासकर पुरानी पेंशन योजना को लागू करने का वायदा।
केजरीवाल ने बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य को मूल मुद्दे बना कर एक रास्ता दिखाया है कि सरकारों को अपने वोटरों की जिंदगी को आसान बनाने के रास्ते खोजने चाहिए।
2013 से दिल्ली में अपनी पकड़ बनाने के बावजूद केजरीवाल 2017 में दिल्ली नगर निगम के चुनाव हार चुके हैं। लेकिन इस बार दिल्ली में भी पासा पलटता दिखाई देता है। केजरीवाल की ओर से दिल्ली में बिछाई गई चुनावी गोटियों को देखेंगे, तो पाएंगे कि उनके दस चुनावी वादे लोगों को राहत देने वाले हैं।
दिल्ली नगर निगम चुनाव में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। चारों नगर निगमों पर भाजपा का कब्जा होने के बावजूद नरेंद्र मोदी या नीचे के भाजपा प्रभारी भ्रष्टाचार खत्म तो क्या, कम भी नहीं कर सके। दिल्ली में कोई ऐसा मोहल्ला नहीं जहां अवैध निर्माण नहीं हुआ और कोई ऐसा अवैध निर्माण नहीं, जो एमसीडी अधिकारियों और बीट कांस्टेबल को रिश्वत दिए बिना हुआ हो।
रिश्वत का हिस्सा अगर चुने हुए निगम पार्षदों को नहीं पहुंच रहा होता, तो वे अवैध निर्माण होने ही नहीं देते। ऐसा नहीं है कि अरविन्द केजरीवाल उन अवैध निर्माणों को तुडवा देंगे, बल्कि केजरीवाल उन अवैध निर्माणों को वैध बना देंगे। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पहले भी उन्हें अवैध निर्माणों को वैध बनाने के लिए कोसती रही है, आगे भी कोसती रहेगी, लेकिन वह वही काम कर रहे हैं, जो उनके वोट पक्के करते हैं।
अरविन्द केजरीवाल के दस वायदे दिल्ली की जनता की दुश्वारियां खत्म करने वाले हैं। दिल्ली की आबोहवा खराब हुई है, जिसका ठीकरा पंजाब और दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार पर फूटता है। लेकिन केजरीवाल ने इसे दूसरी तरफ मोड़ दिया है, भाजपा के बहुमत वाली चारों एमसीडी के चलते दिल्ली में कई जगह कूड़े के पहाड़ बन गए हैं।
केजरीवाल ने इन कूड़े के पहाड़ों को आबोहवा खराब करने का कारण साबित करने की मुहिम छेड़ रखी है और अब उनका पहला चुनावी वायदा ही यही है कि वह इन कूड़े के पहाड़ों को खत्म करके दिल्ली को साफ़ सुथरा बनाएंगे। उनका दूसरा वायदा एमसीडी की अवैध वसूली खत्म करने है, जो दिल्ली की सभी समस्याओं का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है।
दिल्ली की तीसरी सबसे बड़ी समस्या पार्किंग की है। दिल्ली के सभी मोहल्लों की सडकें कारों से भरी पड़ी हैं। कई बार पार्किंग को लेकर खून खराबे की नौबत भी आ चुकी है। भाजपा की एमसीडी ने इस समस्या का निदान करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। जबकि कनाट प्लेस की तरह सभी मोहल्लों के नजदीकी पार्कों में अंडरग्राऊंड मल्टीलेवल पार्किंग बना कर इस समस्या का निदान किया जा सकता है।
इसके अलावा बाकी के सातों वायदे भी दिल्ली के वोटरों को लुभाने वाले हैं। इसलिए दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस का किला ढहाने और उसी की कीमत पर राष्ट्रीय पार्टी बनने के बाद अब केजरीवाल दिल्ली में भाजपा का एमसीडी का किला ढहाने की तरफ आगे बढ़ रहे हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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