इंडिया गेट से: हवाई घोड़े पर सवार केजरीवाल फिर बन रहे हैं मुंगेरीलाल
केजरीवाल फिर से 2014 जैसी हवा में है, जब वह वाराणसी में नरेंद्र मोदी के सामने चुनाव लड़ने गए थे और बुरी तरह हारे थे। उन्हें सिर्फ 2 लाख वोट मिले थे और मोदी को पौने छह लाख से भी ज्यादा। 2019 में केजरीवाल ने दोनों कान पकड़ लिए और फिर वाराणसी नहीं गए। 2014 में हवा ऐसी बनाई थी कि कुमार विश्वास राहुल गांधी को हराने अमेठी चले गए थे। चुनाव के दौरान केजरीवाल ने अमेठी में कहा था कि एक सर्वे के मुताबिक़ कुमार विश्वास को 47 फीसदी वोट मिलेंगे। जब नतीजा आया तो कुमार विश्वास की जमानत जब्त थी।

दिल्ली से महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी, पत्रकार आशुतोष और आशीष खेतान, प्रोफेसर आनन्द कुमार को चुनाव मैदान में उतारा था और सभी सीटें जीतने का दावा था। ये सभी हारे भी और आज इनमें से कोई भी आम आदमी पार्टी में नहीं है। सभी केजरीवाल को मक्कार कहते हुए पार्टी छोड़ कर जा चुके हैं। पंजाब से तीन सीटें जीत कर आम आदमी पार्टी ने केजरीवाल की इज्जत बचा ली थी। तब 2014 की हवा निकलने के बाद केजरीवाल ने केंद्र की राजनीति से तौबा कर ली थी। लेकिन अब पंजाब में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद केजरीवाल एक बार फिर काल्पनिक उड़ने वाले हवाई घोड़े पर सवार हैं।
लोकसभा में आप का एक भी सांसद नहीं
इस समय आम आदमी पार्टी का लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है। 2019 के चुनाव में सिर्फ भगवंत मान जीते थे। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उप-चुनाव में वह सीट भी आम आदमी पार्टी हार गयी। यानि कुछ महीनों के अंदर ही पंजाब की जनता को गलती का अहसास होना शुरू हो चुका है। हालांकि विधानसभा चुनावों में पंजाब की जनता भ्रष्ट अकाली दल और कांग्रेस के कुशासन और आपसी सिर फुटौवल से खफा थी, जिसका फायदा आम आदमी पार्टी को मिल गया था।लेकिन पंजाब की जीत के बाद से केजरीवाल फिर से गलतफहमी का शिकार हो गए हैं। उत्तराखंड और गोवा विधानसभा चुनावों में भी इसी तरह की हवा बनाई गई थी, जैसी अब 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बनाई जा रही है। इन दोनों राज्यों में सरकार बनाने का दावा था।
उत्तराखंड में एक भी सीट नहीं मिली और गोवा में केवल दो सीटें मिलीं। 2022 के उतर प्रदेश विधानसभा चुनाव में तो केजरीवाल की पार्टी को नोटा से भी कम सिर्फ 0.32 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा को 41.29 प्रतिशत ,सपा को 32.06, रालोद को 2.85 और कांग्रेस को 2.33 प्रतिशत वोट मिले। अब जिस पार्टी का लोकसभा में एक भी सांसद नहीं, जिस पार्टी का यूपी में एक प्रतिशत भी वोट आधार नहीं, जो अभी क्षेत्रीय पार्टी है, वह 2024 में मोदी के मुकाबले केजरीवाल को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बता रही है?
केजरीवाल असल में मोदी को नहीं, राहुल गांधी, शरद पवार, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, केसीआर और अखिलेश यादव को चुनौती दे रहे हैं। ये सभी लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों और वोटों के हिसाब से आम आदमी पार्टी से कहीं ऊपर हैं। अखिलेश यादव ने खुद को आउट करते हुए शरद पवार, केसीआर और ममता का नाम लिया है। यानि केजरीवाल न तीन में हैं, न तेरह में। आम आदमी पार्टी ने जहां जहां भी सफलता पाई है, वह कांग्रेस के वोट काट कर पाई है। दिल्ली में वह 15 साल पुरानी कांग्रेस सरकार को हरा कर सत्ता में आई और पंजाब में भी कांग्रेस को हरा कर सत्ता में आई। भाजपा का वोट कहीं भी नहीं काट सकी।
केजरीवाल की हवा इसी साल अक्टूबर और दिसंबर के बाच हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों में ही निकल जाएगी, जहां भाजपा की सरकार है। अगर आम आदमी पार्टी गुजरात और हिमाचल में कुछ वोट प्रतिशत की वृद्धि करती है, तो वह कांग्रेस को नुक्सान पहुंचा कर ही कर पाएगी, जैसे कि गोवा में भी उसने कांग्रेस को नुक्सान पहुंचाया था। लोकसभा चुनाव से पहले केजरीवाल की लोकप्रियता का इम्तिहान दो कांग्रेस शासित राज्यों राजस्थान और छतीसगढ़ में भी हो जाएगा। कहने का मतलब है कि केजरीवाल जो गुब्बारा फुला रहे हैं, वह लोकसभा चुनाव से पहले ही फूट जाएगा।
नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात के विकास का मॉडल पेश करके जनता को लुभाया था, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मोदी की असली ताकत हिंदुत्व है, जो आज भी बरकरार है। केजरीवाल के पास तो दिखाने के लिए दिल्ली माडल भी नहीं है। आम आदमी पार्टी इस गलतफहमी में है कि पंजाब की जनता ने दिल्ली मॉडल के कारण उसे वोट दिया है, जबकि वह वहां इस लिए जीती है, क्योंकि वहां की जनत के पास और कोई विकल्प नहीं था। जिन स्कूलों और अस्पतालों को वर्ल्ड क्लास बता कर केजरीवाल दिल्ली मॉडल बता रहे हैं, वे सिर्फ इमारतें हैं, अंदर खोखलापन है।
दिल्ली के किसी भी विधायक का बेटा-बेटी या पोता पोती किसी भी सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ता। किसी अफसर का बच्चा सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ता। दिल्ली का कोई मंत्री या विधायक सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं करवाता। खुद केजरीवाल अपनी खांसी का इलाज करवाने बेंगलुरु जाते हैं। मनीष सिसौदिया के अपोलो और मैक्स अस्पतालों में पिछले पांच साल का बिल 20 लाख रुपया दिल्ली सरकार ने लोगो के टैक्स से अदा किया है।
दिल्ली के विकास का मॉडल या बर्बादी का?
दिल्ली के विकास की असलियत जानना जरूरी है। केजरीवाल के सत्ता में आने से पहले दिल्ली का सालाना रेवेन्यू 10,000 करोड़ रूपए सरप्लस हुआ करता था जबकि अब सिर्फ 1000 करोड़ रूपए सरप्लस रह गया है। सालाना 9000 करोड़ रूपए कहां गायब हुए हैं? यह जो 1000 करोड़ रुपया सरप्लस है, वह भी केंद्र सरकार की ओर से मिले अनुदान की वजह से है। अगर केंद्र सरकार का फंड निकाल दिया जाए तो शीला दीक्षित ने केजरीवाल को जो दिल्ली 10,000 करोड़ रूपए मुनाफे के रिवेन्यू वाली सौंपी थी, वह 2000 करोड़ रूपए घाटे में पहुंच गई है।
इस साल के बजट में तो पहली बार दिल्ली 3000 करोड़ के घाटे में चली ही जाएगी। यानि केजरीवाल ने मुफ्त बिजली पानी की राजनीति से दिल्ली को श्रीलंका जैसी स्थिति में ला कर खड़ा कर दिया है। एक और दिलचस्प बात गौर करने लायक है। शीला दीक्षित ने सरप्लस रिवेन्यू को विकास की भागीरथी बहा कर खर्च किया था। शीला दीक्षित सरकार का आख़िरी साल में भी विज्ञापन पर खर्च 11 करोड़ रूपए था, जबकि केजरीवाल 880 करोड़ रुपया विज्ञापन पर खर्च कर चुके हैं। उनका इस साल का ही विज्ञापन का बजट 488 करोड़ रूपए है, जो देश दुनिया में अपने व्यक्तिगत और आम आदमी पार्टी के प्रचार पर खर्च हो रहा है।
शराब के ठेकों को अपने चहेतों के हाथों में सौंप कर केजरीवाल और सिसौदिया ने जो करोड़ों रूपए के वारे न्यारे किए हैं, जब उसका हिसाब मांगने का वक्त आया तो रातों रात शराब नीति बदल दी गई। जब शराब मंत्री सिसोदिया के घर सीबीआई का छापा पड़ने वाला था, तो न्यूयार्क टाइम्स और खलीज टाइम्स में दिल्ली की तथाकथित शिक्षा क्रान्ति की खबर का जुगाड़ किया गया| देश की जनता को गुमराह करने के लिए शराब के ठेकों की काली कमाई के आगे ढाल बना कर स्कूल खड़े कर दिए गए। शिक्षा की आड़ में शराब से कमाई के दावे करने वाले अनोखे नेता केजरीवाल ही हैं। यह भी कितनी हैरानी की बात है कि जो शिक्षा मंत्री है, वही शराब मंत्री भी है।
फोर्ड फाउंडेशन और केजरीवाल का रिश्ता
यह सब जानते हैं कि केजरीवाल का अमेरिका से पुराना रिश्ता है। अमेरिका के फोर्ड फाउंडेशन की केजरीवाल पर हमेशा ही कृपा रही है। फोर्ड फाउंडेशन ने 2011 में केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की संस्था कबीर को दो लाख अमेरिकी डॉलर दिए थे। इसी फोर्ड संस्था ने केजरीवाल को मैगसेसे अवार्ड दिलवाया था। यानी भारत में केजरीवाल को राजनीतिक तौर पर स्थापित करना, उसका प्रचार करना और उसका बचाव करने का सारा काम फोर्ड फाउंडेशन ने अपने हाथ में लिया हुआ है।
2012 में अरुंधती राय ने कहा था कि भले ही अन्ना हजारे को जनता के संत के रूप में प्रचारित किया गया, लेकिन वह आन्दोलन के संचालक नहीं थे। फिर कौन था आन्दोलन का संचालक? जिस समय भारत में अन्ना आन्दोलन चल रहा था उस समय फोर्ड फाउंडेशन से जुडी एक महिला शिमरित ली चार महीने भारत में रही थीं। उसने ही केजरीवाल को मोहल्ला सभा और स्वराज का कांसेप्ट दिया था, जो लम्बे समय तक केजरीवाल का यूएसपी बना रहा।
अब आप समझ गए होंगे कि क्यों न्यूयार्क टाइम्स सफाई देता है और कैसे खबर छापने का जुगाड़ होता है। खबर भले ही न्यूयार्क टाइम्स के रिपोर्टर करनदीप सिंह ने लिखी है, जो इससे पहले भी भारत विरोधी खबरें लिखता रहा है, लेकिन यह खबर सीधे न्यूयार्क टाइम्स से ही प्लांट करवाई गई थी। यानी खबर के तार केजरीवाल की संरक्षक फोर्ड फाउंडेशन से जुड़े हैं। ऐसा संदिग्ध व्यक्ति अगर देश का प्रतिनिधित्व करने का दावा करेगा तो देश का लाभ पहुंचाने की बजाय नुकसान ही करेगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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