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‘विकास का काम, मोदी का नाम और गुजरात में विपक्ष का काम तमाम’

नरेंद्र मोदी की काबिलियत के कसीदे पढ़ने वालों में कांग्रेसियों की कोई कमी नहीं है। खासकर गुजरात में तो जितने कांग्रेसी उनके विरोध में है, उससे कई गुना ज्यादा मोदी के मुरीद है। इसीलिए, इस बार के विधानसभा चुनाव से ऐन पहले अपने गुजरात दौरे में प्रधानमंत्री मोदी को खुलकर खेलने को मैदान मिल गया। कांग्रेस का कोई भी नेता मोदी के दौरे पर कुछ भी नहीं बोला। और अगर कोई बोला भी होगा, तो किसी ने सुना नहीं।

bjp narendra Modi initiatives campaign for Gujarat elections

दरअसल, इस मामले में मोदी का कोई सानी नहीं है कि जिस बात को वे सीधे लोगों के दिलों में दर्ज करना चाहते हैं, उसे पूरी होशियारी के साथ सही तरीके से दर्ज कर जाते हैं। एक दौर था जब गुजरात को दंगों के नाम पर देश और दुनिया में बहुत बदनाम करके मोदी को किनारे करने की कोशिश की गई थी, फिर भी उन सारी बातों को दरकिनार करते हुए मोदी ने पिछले चुनाव में विकास के गुजरात मॉडल को इस तरह से पेश किया कि वही मॉडल उनकी चुनावी जीत का साधन बन गया। इस बार भी मोदी उसी राह पर हैं।

इसीलिए यह खबर महत्त्वपूर्ण नहीं है कि भुज में 'स्मृति वन' स्मारक के उद्घाटन, वहीं पर 3 किलोमीटर लंबा रोड शो और तकरीबन 4400 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं के शुभारंभ के साथ-साथ अहमदाबाद में अटल ब्रिज का उद्घाटन करने के लिए प्रधानमंत्री गुजरात आए थे। असल में तो मोदी का दौरा गुजरात में अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा को दो तिहाई बहुमत दिलाने के लक्ष्य पर केंद्रित था।

नरेंद्र मोदी प्रतीकों की राजनीति के जरिए दुनिया वालों के दिलों में अपनी जगह बनाने की ललित कला में माहिर हैं। इसीलिए कच्छ में इस बार उनके रोड शो में जो लोग मौजूद थे, उनमें बहुत बड़ी संख्या में मुसलमान थे। टीवी पर देश ने देखा कि इस रोड शो में शामिल सभी लोगों ने, खासकर मुसलमानों ने भी, भारत माता की जय और नरेंद्र मोदी जिंदाबाद के नारे लगाए।

संदेश साफ है कि बिलकिस बानो की कहानी के बावजूद मोदी की स्वीकार्यता मुसलमानों में भी तेजी से बढ़ी है। जिनके दिलों में दंगों के जख्म जिंदा होने की बात प्रचारित की जाती है, और यह भी कहा जाता है कि इसी वजह से गुजरात को देश और दुनिया में बदनामी मिली, लेकिन मोदी के गुजरात दौरे में उन्हीं मुसलमानों की उपस्थिति तो इस बात की गवाही कतई नहीं देती।

सवाल उठ सकता है कि गुजरात दौरे के लिए मोदी ने कच्छ को ही क्यों चुना? तो उनके लिए ये बताना जरूरी है कि कच्छ में सन 2001 में भूकंप आया था और यह मोदी ही थे जिन्होंने बतौर मुख्यमंत्री पहली बार अपने प्रशासनिक कौशल और पुनर्निमाण की क्षमताओं का परिचय दिया था। मोदी जानते हैं कि इतिहास की घटनाएं इतिहास की तरह ही लोगों के दिल और दिमाग में बनी रहती हैं इसलिए स्वयं को उन घटनाओं के हिस्सों में किस्सों की तरह पिरोकर रखने के लिए वो एक बार फिर गुजरात चुनाव से ठीक पहले कच्छ आये थे।

आंकड़े बताते हैं कि उस भीषण भूकंप में 16,927 लोगों की मौत हुई और 1,66,836 लोग घायल हुए थे। इसके अलावा 1,47,499 लोग घर से बेघर हुए थे। कच्छ जिले के भुज, अंजार, भचाऊ और नखत्राणा में अधिक तबाही हुई थी। इसी विभीषिका की याद में अत्याधुनिक 'स्मृति वन भूकंप संग्रहालय' व करीब 470 एकड़ क्षेत्र में बने स्मृति वन और एक संग्रहालय का उद्घाटन भी किया। इस स्मारक पर उन सभी लोगों के नाम लिखे गए हैं, जिनको भूकंप ने लील लिया था।

प्रधानमंत्री के दौरे के बीच में भले ही यह बहुत प्रचार किया गया कि अहमदाबाद में मोदी अचानक बीजेपी दफ्तर पहुंच गए, और वहां जाकर गुजरात के नेताओं को चुनाव में जीत का मंत्र दिया। लेकिन कौन मानेगा कि देश का प्रधानमंत्री कहीं भी अचानक से पहुंच जाए और वहां सारे नेताओं की उपस्थिति के साथ साथ सब कुछ पहले से ही उनके अनुरूप व्यवस्थित हो।

दरअसल, मोदी जानते हैं कि पंजाब में जीत के बाद केजरीवाल और उनकी पार्टी का आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया है, उसी आत्मविश्वास से लबरेज केजरीवाल जिस तरह से गुजरात में सक्रियता दिखा रहे हैं, और मुफ्त में या फिर सस्ते में बहुत कुछ बांटने की एक के बाद जो गारंटी दे रहे हैं, वे घोषणाएं लोगों को लुभा रही हैं। लेकिन उस हालात से कैसे निपटा जाए, वही सीख देने मोदी गुजरात आए थे। साथ में यह समझाने भी कि कैसे गुजरात में केजरीवाल को केवल कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने तक ही सीमित रखा जा सके। प्रधानमंत्री ने बीजेपी नेताओं, सांसदों, विधायकों व पदाधिकारियों को सीख दी कि वे केजरीवाल की हर रणनीति का माकूल जवाब कैसे दें।

मोदी ने गुजरात के नेताओं को जो सलाह दी, उसकी सबसे प्रमुख बात यह थी कि बीजेपी नेता 'विकास के काम पर और मोदी के नाम पर' जनता के बीच जाएं और जीत का माहौल बनाएं। लेकिन मोदी यह जानते हैं कि माहौल का क्या, वह तो कभी भी बदल सकता है, इसीलिए वे सतर्क भी हैं, सावधान भी और सजग भी।

सजगता तो खैर इतनी है कि इस बार वे गुजरात विधानसभा की 182 में से 150 सीटों पर जीत का परचम लहराने की कोशिश में है। प्रधानमंत्री का यह ताजा दौरा उसी लक्ष्य को हासिल करने का रास्ता बनाने और बीजेपी को मजबूती देने की शुरुआत है। आखिर 2024 में गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटों पर फिर से कब्जा करना भी तो अगला लक्ष्य है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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