मातृ भूमि की महानायिका - कर्मयोगिनी अहिल्याबाई होल्कर

भारत की समयरेखा पर हमारे गौरवशाली इतिहास की नायिकाएं अपने अदम्य साहस, परिपक़्वता और शक्ति की मिसाल देती हैं। अहिल्याबाई होल्कर की गाथा एक ऐसे आदर्श शासक की जीवनी है जो तीस वर्षों तक, आज के मध्य भारत में मालवा राज्य की शासक रहीं। उनके ३०० वें जन्मवर्ष पर देश भर में उनकी शासन पद्धति , उदार और दानी प्रवर्ति और कुशल कूटनीति जानने वाली शासिका के रूप में उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है।

होल्कर सामराज्य में चौदह शासक हुए जिनमें एक अहिल्याबाई होल्कर थीं। 21वीं शताब्दी में समाज अहिल्याबाई को उनके स्त्री होने के कारण ही नहीं अपितु उनके पुरुषार्थ और वर्तमान सन्दर्भ में एक अनुकरणीय शासक होने की प्रेरणा से स्तुति: कर रहा है। कर्नल जी बी मलेसन ने अपनी पुस्तक 'अ हिस्टोरिकल स्केच ऑफ़ नेटिव स्टेट्स ऑफ़ इंडिया ' में लिखा '- भारत के किसी भी भाग में लोग इतने खुश और संतुष्ट नहीं थे जितने कि अहिल्याबाई होलकर के राज्य में थे। मध्य भारत के मालवा राज्य पर 1765 से 1795 तक शासन अभिलिखित करने वाली अहिल्याबाई अपनी बुद्धिमता, साहस और न्यायप्रिय शासन के कारण अपने समसामियक शासकों से इतर अट्ठारवीं शताब्दी की चुनौती भरी भूराजनैतिक परिस्थितियों में भी सशक्त रहीं।

मुग़ल साम्राज्य के पतन और ब्रिटिश शासन के भारत में फैलते जाल के बीच मालवा को मराठा साम्राज्य की महत्वपूर्ण और समृद्ध सूबे के रूप में स्थापित करने वाली शासिका अहिल्याबाई आज के सामाजिक राजनैतिक सन्दर्भ में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। आज के महाराष्ट्र में चौंडी नामक गाँव के चरवाहा समुदाय में अहिल्या बाई का जन्म, माणिक जी शिंदे और सुशीला बाई के घर में 1725 में हुआ। पुणे पेशवा के सूबेदार और मालवा के राजा, मल्हार राव होल्कर चौंडी गाँव की यात्रा के दौरान अहिल्याबाई के सेवा भाव और विलक्षण स्मरण शक्ति देख प्रभावित हुए और अहिल्या को अपनी पुत्र खांडेराव की वधू के रूप में इंदौर लाने का निश्चय किया ।

अहिल्याबाई ने राज्य व्यवस्था की संभाल और शस्र प्रशिक्षण सीख , मालवा की शासन व्यवस्था में स्वयं को पारंगत किया। पुत्र माले राव और पुत्री मुक्ताबाई का स्नेह अहिल्याबाई के जीवन में संतोष देने वाला था। परन्तु नियति ने अहिल्याबाई के जीवन में चुनौतियों का पहाड़ खड़ा कर दिया। उनकी आखों के सामने ससुर, पति , बेटा ,बेटी समेत पूरा परिवार मृत्यु को प्राप्त हुए। ऐसी विषम पारिवारिक परिस्थितियों में अहिल्याबाई ने मालवा राज्य की बागड़ोर संभाली। मालवा का राज्य मिलना इतना सरल भी नहीं था। मराठा साम्राज्य के पेशवा के रिश्तेदार रघुनाथ राव (राघोबा) की दृष्टि मालवा पर थी। अपनी सेना ले जब राघोबा मालवा की ओर कूच कर रहे थे, तब अहिल्या बाई ने महिलाओं की सैन्य टुकडी तैयार की और अपने सेनापति तुकोजी होल्कर को मालवा की सेना ले कर कूच करने को कहा।

शिप्रा नदी के दोनों ओर जब राघोबा और अहिल्याबाई क़ी सेना खड़ी थी तब अहिल्या बाई ने अत्यंत चतुराई और निति निपुणता दिखाते हुए राघोबा को पत्र भेजा और उसमे उन्हें यह ध्यान दिलाया कि मालवा को जीतने के लिए आपको मेरी महिलाओं के सैन्य टुकड़ी से युद्ध करना होगा। रानी ने लिखा कि आप पंजाब जीत कर आ रहे हैं और अगर आप मुझ से हार गए तो आप का अपमान होगा और साथ ही एक अबला पर आक्रमण का पाप भी लगेगा। अहिल्याबाई की राजनैतिक दूर दर्शिता ने राघोबा को वापस लौटने पर मजबूर कर दिया। मराठा साम्राज्य के पेशवा की पत्नी रमाबाई भी अहिल्याबाई को शासन देने के पक्ष में थीं और अपनी सम्मति उन्होंने पेशवा से सांझा करी । यह दर्शाता है कि18 वीं शताब्दी के मध्य भारत में महिलाओं का हस्तक्षेप राज्य व्यवस्था में था ।

राज्य पर बाह्य चुनौतियों का अहिल्याबाई ने अलग अलग समय पर सामना किया। ग्वालियर के राजा और मराठा साम्राज्य के महत्वपूर्ण अंग, महाद जी शिंदे जो कि सिंधिया साम्राज्य के संस्थापक रहे, 1787 में लालसोट का युद्ध हार गए जिसमे मालवा राज्य का निम्बाहेड़ा इलाक़ा भी खोना पड़ा । शिंदे का मराठा साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण स्तंभ होने के कारण, यह हार उत्तर भारत में मराठा साम्राज्य के स्थापत्य को कमज़ोर करती थी। ऐसे समय में अहिल्याबाई होल्कर ने स्वयं युद्ध की बागड़ोर अपने हाथ में ली। सेना में भर्ती, शत्र निर्माण, सेना नायकों की सामरिक उपस्थिति का ध्यान अहिल्याबाई के द्वारा किया गया। 5000 घोड़ों के साथ अहिल्याबई के तत्वावधान में युद्ध लड़ा गया और अहिल्याबाई ने विजय प्राप्त की।

अहिल्याबाई ने अपनी बुद्धिमता,साहस और कर्मठता से मराठा साम्राज्य की विजय पताका फहराई। पुणे दरबार में इस जीत ने उत्सव का वातावरण कर दिया और एक विशेष कार्यक्रम आयोजित कर पेशवा के दरबार में अहिल्याबाई का यशोगान हुआ, तोपों की सलामी दी गयी। नाना फडणवीस जो पुणे दरबार में एक महत्वपूर्ण भूमिका रखते थे उन्होंने कहा कि अभी तक रानी अहिल्याबाई के विषय में धर्म -कर्म और पूजा पाठ की बातें सुनते आ रहे थे पर अब उनकी शूर - वीरता का भी पता लग गया; पुणे शासन का पुण्य द्वार नर्मदा तट पर बसा महेश्वर है। महाद जी शिंदे ने पत्र लिख अहिल्याबाई को विजय की बधाई दी और लिखा कि भविष्य में वह उनकी गुरु रहेंगीं। 1761 में अहमद शाह अब्दाली के हाथों मराठा पानीपत का तीसरा युद्ध हारे थे।

मराठा साम्राज्य को पुनः शक्तिशाली बनाने में महाद जी शिंदे की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने कहा - अहिल्या बाई होल्कर एक फर्स्ट क्लास राजनीतिकार थी और इसलिए वे महाद जी शिंदे को पूर्ण रूप से समर्थन देती थीं। मुझे यह कहने में बिलकुल भी शंका नहीं है कि अहिल्याबाई के समर्थन के कारण ही महाद जी शिंदे उत्तर भारत के राजनैतिक परिपेक्ष्य में प्रासंगिक और शक्तिशाली बन पाए। अहिल्याबाई ने मराठा साम्राज्य को सैन्य और संसाधन से सशक्त करने के लिए महाद जी शिंदे को 30 लाख रूपये दिए जो कभी वापस नहीं मांगें।

अहिल्याबाई के शासन काल में मालवा की सेना ने 1780 में महाद जी शिंदे के साथ मिल गुजरात में कर्नल गोडार्ड को चुनौती दी और 1786 में गजेन्द्रगढ़ के युद्ध में सवनूर के नवाब की मदद कर, उसे टीपू सुल्तान के आधिपत्य से मुक्त कराया।

अहिल्याबाई अपने उदार ह्रदय, लोक समर्पण,सेवा भाव,प्रजा की भलाई और समृद्धि के लिए कार्य करने वाली रानी के रूप में इतिहास में अलंकृत हैं। उनकी शासिका के रूप में भूमिका भारतीय समाज में पश्चिम से प्रभावित भ्रमित स्त्री विमर्श जो भारतीय समाज व्यवस्था में महिलाओं की निर्णय लेने की भूमिका को नगण्य मानता है, उसे तोड़ती है। अपनी प्रजा के लिए ममता और वात्सल्य से भरी अहिल्याबाई जिन्हें उनकी प्रजा ने 'लोकमाता','देवी' के रूप में पूजा, एक कुशल प्रशासिका और रणनीतिज्ञ थीं। मातृभूमि की रक्षा के लिए समर्पित दृढ निश्चयी, स्वाभिमानी अहिल्याबाई उपासना परायण,आध्यात्मिक और अनुशासित जीवन शैली जीने वाली महान शासिका थी। विभिन्न दायित्वों का दक्षता से निर्वाह करने वाली अहिल्याबाई 21 वीं शतब्दी में भी अपने अद्वितीय व्यक्तित्व से प्रेरणा देती हैं।

हाल ही में भारत पर पाकिस्तान समर्थक आतंकी हमले का करारा ज़वाब 'ऑपरेशन सिन्दूर ' से दिया गया जिसे देश के सम्मुख सेना की महिला अफ़सर कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने उजागर किया। यह दर्शाता है कि भारत की परंपरा में लोकमाता अहिल्याबाई से कर्नल कुरैशी तक वीरांगनायें और स्त्री नेतृत्व देश की एकता , अखंडता और सम्प्रभुता की रक्षा के लिए समर्पित रही हैं।

- प्रो. गीता भट्ट

लेखिका निदेशक , नॉन - कॉलेजिएट महिला शिक्षा बोर्ड , दिल्ली विश्वविद्यालय के रूप में कार्यरत हैं ।

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