उस विधानसभा सीट की कहानी जिसने पश्चिम बंगाल में भाजपा को दिया जीतने का हौंसला

कोलकाता, अप्रैल 16: भाजपा को पश्चिम बंगाल जीतने की प्रेरणा कब और कैसे मिली थी ? बशीरहाट दक्षिण विधानसभा सीट वह चुनाव क्षेत्र है जिसने पश्चिम बंगाल में भाजपा की उम्मीदों का चिराग जलाया था। कमजोर संगठन के बाद भी भाजपा को जीत का हौसला दिया था। बशीरहाट दक्षिण सीट उत्तर 24 परगना जिले में आती है। बशीरहाट बांग्लादेश बोर्डर (पेट्रापोल) से करीब 64 किलीटर दूर है। इस सीट पर 17 अप्रैल को चुनाव है। मुख्य मुकाबला तृणमूल के डॉ. सप्तर्षी बनर्जी, भाजपा के तारकनाथ घोष और कांग्रेस के अमित मजुमदार के बीच है। यह सीट तृणमूल की है। लेकिन इस बार भाजपा ने भी यहां पूरा जोर लगाया है। चूंकि भाजपा इस सीट को प्रेरणाश्रोत मानती है इसलिए खुद गृहमंत्री अमित शाह ने यहां चुनावी मोर्चा संभाला था।

विधानसभा चुनाव में भाजपा की पहली जीत
2011 के विधानसभा चुनाव में बशीरहाट दक्षिण सीट पर सीपीएम के नारायण मुखर्जी जीते थे। 2014 में नारायण मुखर्जी का निधन हो गया तो इस सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा। भाजपा ने यहां से समिक भट्टाचार्या को उम्मीदवार बनाया। समिक का मुकाबला तृणमूल के दीपेंदु विश्वास के साथ था। उस समय नरेन्द्र मोदी लोकसभा का चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री बन चुके थे। नमो की लोकप्रियता उफान पर थी। दूसरी तरफ तृणमूल कंग्रेस उस समय मुश्किलों का सामना कर रही थी। तृणमूल के कई नेता सारधा घोटला में सीबीआइ के रडार पर थे। उनसे लगातार पूछताछ चल रही थी। सितम्बर 2014 में उप चुनाव हुआ। कांटे का मुकबला हुआ। भाजपा के समिक भट्टाचार्या ने करीब 11 हजार वोटों से यह चुनाव जीत कर तहलका मचा दिया। अगर जनसंघ की बात छोड़ दें तो पश्चिम बंगाल में यह भाजपा की पहली जीत (विधानसभा चुनाव) थी। 294 सदस्यों के बीच भाजपा के पहले विधायक को विधानसभा में बैठने का दुर्लभ मौका मिला। बशीरहाट दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों की तादात करीब 46 फीसदी है। 2014 के उपचुनाव में जब वोटों की गिनती हो रही थी तब सातवें राउंड तक भाजपा के समिक भट्टाचार्या पिछड़ रहे थे। लेकिन इसके बाद जब उन्होंने एक बार बढ़त बनायी तो फिर आखिर तक कायम रखा। इस जीत ने भाजपा में इस बात का आत्मविश्वास पैदा किया कि वह पश्चिम बंगाल में भी जीत सकती है। यहां तक कि मुस्लिम बहुल इलाके में भी।

समिक भट्टाचार्या से आगे की राजनीति
हालांकि भाजपा बशीरहाट दक्षिण सीट पर जीत का सिलसिला जारी नहीं रख सकी। 2016 के चुनाव में समिक भट्टाचार्या चुनाव हार गये। तृणमूल के दीपेंदु विश्वास जीते। लेकिन तब तक पश्चिम बंगाल में भाजपा की उम्मीदों का दिया जल चुका था। इसकी रौशनी मंद जरूर थी लेकिन दीया जल रहा था। 2018 के पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव में भाजपा ने पहली बार अपनी चमक बिखेरी। उसने करीब 32 हजार पंचायत सीटों में 5636 पर जीत हासिल की। इस तरह भाजपा, कांग्रेस और सीपीएम को पछाड़ कर राज्य में दूसरे नम्बर की पार्टी बन गयी। 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीत कर भाजपा ने दिनोंदिन अपनी बढ़ती ताकत का अहसास करा दिया। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने भाग्यशाली उम्मीदवार समिक भट्टाचार्या को दमदम सीट से खड़ा किया था। लेकिन वे तृणमूल के सौगात राय से चुनाव हार गये थे। समिक भट्टाचार्या भले चुनाव हार गये लेकिन वे वही नेता हैं जिन्होंने बंगाल में कमल के खिलने का रास्ता तैयार किया। अभी वे पश्चिम बंगाल में भाजपा के शीर्ष नेताओं में एक हैं और प्रदेश प्रवक्ता के पद पर तैनात हैं।

बशीरहाट दक्षिण की चुनावी बयार किस तरफ ?
इस सीट पर 17 अप्रैल को चुनाव है। खुद अमित शाह ने यहां भाजपा के लिए चुनाव प्रचार किया था। इस बार मुकाबला बहुत कठिन है। प्रत्यक्ष रूप से तो कोई कुछ नहीं कह रहा। लेकिन यह महसूस किया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल का विधनसभा चुनाव धीरे-धीरे हिंदू-मुसलमान के आधार पर दोतरफा होता जा रहा है। अधिकांश वोटरों की यही राय है कि इसबार का चुनाव बिल्कुल अलग है। यह सीट तृणमूल कांग्रेस की है। लेकिन भाजपा के पक्ष में भी एक बड़ा जनसमर्थन है। हिंदू और मुस्लिम टोलों के आधार पर लोग बंटे हुए हैं। 2016 के चुनाव में भाजपा के समिक भट्टाचार्या ने 64 हजार से अधिक वोट लाकर इस इलाके में भाजपा की मजबूत स्थिति को बतला दिया था। भारतीय फुटबॉल टीम के चर्चित स्ट्राइकर रहे दीपेंदु विश्वास 2016 में पहली बार यहां से तृणमूल के टिकट पर विधायक बने थे। लेकिन 2021 में ममता बनर्जी ने उनका टिकट काट दिया था। अब वे भाजपा में शामिल हैं। वे राज्य के प्रतिष्ठित फुटबाल खिलाड़ी रहे हैं। उनके चाहने वालों की एक बड़ी संख्या है। मौजूदा राजनीतिक हालात और वोटरों की राय में इस बार भाजपा के लिए यहां बेहतर परिस्थितियां हैं।












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