नेताजी के पोते चंद्र बोस के बीजेपी छोड़ने से बंगाल की राजनीति पर होगा क्या असर ?
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पोते चंद्र बोस ने बुधवार को यह कहते हुए बीजेपी से इस्तीफा दिया कि पार्टी में उनकी बातों को सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। वे अपने दादा शरत चंद्र बोस और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आदर्शों पर चलते रहना चाहते हैं, लेकिन उनके लिए अब बीजेपी में 'रहना असंभव' हो गया है।
चंद्र बोस की आगे की राजनीति क्या होगी, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन, इतना स्पष्ट है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के लिए पहले से ही बढ़ी संभावित चुनौती के बीच उनका इस तरह से पार्टी से जाना अच्छा संकेत बिल्कुल नहीं है।

नेताजी के परिवार से जुड़ी है बात
चंद्र कुमार बोस अपने राजनीतिक हैसियत के दम पर पार्टी को कितना नुकसान पहुंचा सकेंगे यह सवाल हो सकता है, लेकिन इस बात में कोई शक नहीं है कि वे उस परिवार से जुड़े हुए हैं, जिसकी प्रतिष्ठा सिर्फ बंगाल की अस्मिता से नहीं, बल्कि पूरे देश के सम्मान के साथ जुड़ी हुई है।
2020 में पार्टी ने उपाध्यक्ष पद से हटाया था
भाजपा छोड़कर उन्होंने पार्टी को जितना नुकसान पहुंचाया है, उससे ज्यादा उन्होंने इसके जो कारण बताए हैं, वह उसे ज्यादा परेशान कर सकते हैं। बीजेपी ने 2020 में उन्हें उपाध्यक्ष पद से हटा दिया था। तथ्य ये है कि 2019 में उन्होंने सीएए का विरोध किया था,जो पार्टी के आधिकारिक लाइन से अलग था।
बीजेपी को परेशान कर सकते हैं उनके बयान
उन्होंने कहा है कि पार्टी में उनका मुख्य उद्देश्य 'नेताजी की विचारधारा के अनुसार काम करना था, जिन्होंने सभी धर्मों को भारतीय की तरह देखा और विभाजन और सांप्रदायिकता का विरोध किया।' उनकी जुबान से निकली ये बातें बीजेपी को बंगाल में राजनीतिक तौर पर चुभ सकती हैं।
चंद्र बोस के मुताबिक 2016 में जब उन्होंने बीजेपी ज्वाइन की थी तो उन्हें यही लगा था कि इस पार्टी के माध्यम से वह अपने दादा के आदर्शों और विचारों को आगे बढ़ा पाएंगे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के नेतृत्व को तो प्रेरक बताया है, लेकिन यह भी कहा है कि जिस तरह से उन्हें नजरअंदाज किया गया है, उससे उनका मोहभंग हुआ है।
2021 के विधानसभा में भाजपा को लगा झटका
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी पश्चिम बंगाल में 42 में से 18 सीटें जीत गई थी और उसे 40.6% वोट मिले थे। यह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए सबसे मुश्किल लड़ाई साबित हुई थी। 2021 के विधानसभा चुनाव में उनकी नेतृत्व वाली टीएमसी के हौसले नरम पड़े हुए थे। जबकि, भाजपा बहुत ही ज्यादा उत्साहित और आक्रामक नजर आ रही थी। लेकिन, पार्टी 295 में से सिर्फ 77 सीट ही जीत सकी और उसके वोट शेयर भी घटकर 37.97% रह गए।
बीजेपी की छवि के लिए है बड़ी चुनौती
ऐसे में चंद्र कुमार बोस जैसे नेता का बीजेपी में होना अभी समय की जरूरत थी। क्योंकि, टीएमसी हो या कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां बोस परिवार के सदस्य का किसी पार्टी से जुड़ा होना ही एक बड़ी बात है। बंगाल के समाज में नेताजी आज भी जाति-धर्म से कहीं ऊपर हैं, लगभग उसी तरह जैसा सम्मान उन्हें पूरे देश में हासिल है।
उन्होंने अभी किसी दूसरे दल में जाने की बात नहीं की है। इसलिए उनके बीजेपी छोड़ने का फायदा किसको मिलेगा यह कहना मुश्किल है। लेकिन, इतना तो तय है कि विधानसभा चुनावों के बाद अपने कई विधायकों को भी गंवा चुकी भारतीय जनता पार्टी के लिए उसकी बंगाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर बहुत बड़ा आघात है।
बोस ने कहा है कि पार्टी में बने रहने को लेकर अपनी मजबूरियां वे बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा तक को बता चुके हैं। शायद बीजेपी कोई प्लान बी तैयार कर चुकी हो, जो बोस की कमी पूरी कर सके। लेकिन, फिलहाल तो यही लगता है कि बंगाल में भाजपा को कम से कम राजनीतिक धारणा के स्तर पर बहुत गहरी चोट लग चुकी है।
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