'तिहाड़ जेल में 30 बार कपड़े उतरवाए गए, मैं मरना चाहती थी', एक्ट्रेस ने सुनाई यातनाओं की दास्तां
Tihar Jail Trauma: 'मैं मर जाना चाहती थी'...मेरी जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे गुजरा। चार महीने का वह समय आज भी मेरे लिए किसी बुरे सपने जैसा है। जब मैं उस दौर को याद करती हूं तो आज भी डर, अपमान और घुटन महसूस होने लगती है। सबसे ज्यादा जिसने मुझे तोड़ा, वह था बार-बार निर्वस्त्र करके की जाने वाली जांच। मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरी इंसानियत और सम्मान धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा हो। चेकिंग के नाम पर उन्हें 25-30 बार निर्वस्त्र किया गया, जिससे उनका मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया।
पंजाबी अभिनेत्री और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर संदीपा विर्क ने एक पॉडकास्ट में अपनी ज़िंदगी के सबसे अंधेरे पन्ने खोले हैं। उन्होंने जेल में उनके साथ क्या-क्या हुआ विस्तार से बताया। आइए आपको भी रूबरू कराते हैं, उस दर्द से, जिसने सभी के दहला दिया...

Who Is Sandeepa Virk: संदीपा विर्क कौन हैं?
संदीपा विर्क ने अपने करियर की शुरुआत एक मॉडल के रूप में की। पंजाबी सिनेमा में एंट्री के बाद उन्होंने कुछ फिल्मों में काम किया, लेकिन उन्होंने खुलासा किया कि कास्टिंग काउच की संस्कृति का सामना करने के बाद उन्हें शूटिंग बीच में छोड़नी पड़ी। बाद में वे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और कॉस्मेटोलॉजिस्ट बनीं। उनके इंस्टाग्राम पर 12 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स थे, जहां वे ब्यूटी प्रोडक्ट्स और लाइफस्टाइल कंटेंट शेयर करती थीं।
Sandeepa B Virk Tihar Jail Trauma:कैसे पहुंची तिहाड़ जेल?

संदीपा की जिंदगी में उथल-पुथल तब शुरू हुई, जब प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत ईडी ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। आरोप था कि वे ₹6 करोड़ के फ्रॉड में शामिल थीं, जिसमें एक महिला को फिल्म में लीड रोल दिलाने के झांसे में पैसे ठगे गए। ईडी के अनुसार, फंड्स उनके अकाउंट्स से गुजरे, प्रॉपर्टी खरीदी गई और एक फर्जी ई-कॉमर्स वेबसाइट के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग की गई। मुख्य आरोपी अमित गुप्ता फरार है। संदीपा ने इन आरोपों से इनकार किया है और खुद को निर्दोष बताती हैं।
अगस्त 2025 में गिरफ्तारी के बाद उन्हें तिहाड़ जेल भेजा गया। दिल्ली हाईकोर्ट ने दिसंबर 2025 में उन्हें जमानत दे दी, जिसमें चार महीने से ज्यादा की हिरासत का हवाला दिया गया।
जेल की वो भयावह रातें: निर्वस्त्र करने की यातना

एक पॉडकास्ट में संदीपा ने भावुक होकर अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि जेल में प्रवेश से लेकर अदालती पेशी तक बार-बार चेकिंग होती थी। 'जेल से निकलकर अदालत जाते हो, कपड़े उतरवाते हैं। वापस जेल आते हो, फिर उतरवाते हैं। दिन में तीन बार तक यह हो सकता है।
उनके अनुसार, महीने में छह बार निर्वस्त्र होने की प्रक्रिया को चार महीने में 27-30 बार पहुंचाया गया। उन्होंने रोते हुए बताया कि 'यह भयानक था। मैं मानसिक रूप से पूरी तरह टूट गई थी। जेल की पहली रात का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सोते वक्त उनके चेहरे पर कीड़े रेंग रहे थे। खाना, रहन-सहन और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने उनकी हालत और खराब कर दी।

संदीपा ने कहा कि वे इतनी टूट चुकी थीं कि आत्महत्या के बारे में सोचने लगीं। उन्होंने कहा कि मैं प्रार्थना करती थी कि मौत आ जाए और मुझे ले जाए। तिहाड़ वह जगह है जिसे मैं अपने दुश्मन को भी नहीं देना चाहूंगी। सबसे दर्दनाक पल तब आता जब उनके माता-पिता मुलाकात के लिए आते। मैं उनसे माफी मांगती थी कि मेरी वजह से उन्हें यहां आना पड़ा।
चेकिंग के नाम पर स्ट्रिप सर्च दर्दनाक

संदीपा का अनुभव जेलों में महिलाओं के साथ होने वाली व्यवहार की व्यापक समस्या को दर्शाता है। भारतीय जेलों में, खासकर तिहाड़ जैसी बड़ी जेलों में, सुरक्षा चेकिंग के नाम पर स्ट्रिप सर्च (निर्वस्त्र जांच) एक मानक प्रक्रिया है। इसका मकसद हथियार, नशीले पदार्थ या प्रतिबंधित वस्तुएं रोकना होता है, लेकिन आलोचक इसे अत्यधिक आक्रामक और अपमानजनक मानते हैं।
महिलाओं के मामले में यह और संवेदनशील हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन भी स्ट्रिप सर्च को यातना के रूप में देखते हैं, खासकर उन महिलाओं के लिए जिनका पहले से यौन शोषण या ट्रॉमा का इतिहास होता है। संदीपा का मामला इस बात की याद दिलाता है कि जेल सुधार की जरूरत कितनी गहरी है। जहां सुरक्षा के साथ-साथ कैदियों की मानवीय गरिमा भी सुरक्षित रहे।
भारत में जेल सुधार पर कई रिपोर्ट्स आई हैं, जिनमें महिलाओं के लिए अलग वार्ड, बेहतर स्वच्छता, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और लिंग-संवेदनशील प्रक्रियाओं की मांग की जाती रही है। तिहाड़ जेल, जो एशिया की सबसे बड़ी जेलों में से एक है, पहले भी भीड़, सुविधाओं की कमी और कैदियों की शिकायतों के लिए चर्चा में रही है।
इंडस्ट्री में 'कॉम्प्रोमाइज कल्चर'
संदीपा ने पॉडकास्ट में फिल्म इंडस्ट्री की 'कॉम्प्रोमाइज कल्चर' का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सम्मान के साथ काम करने की कोशिश में उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जेल जाने के बाद सोशल मीडिया और इंडस्ट्री से 'अनफॉलो' होने का दर्द भी उन्होंने साझा किया।
यह घटना महिलाओं के खिलाफ सोशल मीडिया ट्रायल और जेंडर बायस की भी मिसाल है। एक आरोपी महिला होने पर समाज अक्सर पूर्वाग्रह से देखता है, जबकि पूरी कहानी अदालत तय करेगी।
जमानत के बाद संदीपा की जिंदगी
जमानत मिलने के बाद संदीपा दवाओं के सहारे मानसिक स्वास्थ्य संभाल रही हैं। उन्होंने कहा कि यह अनुभव उन्हें कभी नहीं भूलेगा, लेकिन परिवार के सहयोग से वे आगे बढ़ रही हैं। उनका केस अभी अदालत में चल रहा है।
सुधार की जरूरत
संदीपा विर्क की दास्तां व्यक्तिगत पीड़ा से कहीं आगे है। यह भारतीय जेल व्यवस्था में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और सुधार की मांग करती है। सुरक्षा जरूरी है, लेकिन उसे मानवीय बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। महिलाओं के लिए विशेष प्रोटोकॉल, कैमरा निगरानी, महिला स्टाफ की बढ़ोतरी और मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
जब कोई व्यक्ति जेल जाता है, तो सजा उसकी गरिमा छीनने की नहीं होनी चाहिए। संदीपा की कहानी हमें याद दिलाती है कि न्याय की प्रक्रिया में भी इंसानियत बरती जाए। तिहाड़ जैसी जेलों को सिर्फ सजा का केंद्र नहीं, बल्कि सुधार का केंद्र बनाना होगा।













Click it and Unblock the Notifications