Petrol-Diesel: 2014 से अब तक कितने बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम? कब-कब कीमतों ने बिगाड़ा आम आदमी का बजट
Petrol Diesel Price 2014 to 2026: पश्चिम एशिया (West Asia) में युद्ध की आग और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज होर्मुज (Strait of Hormuz) की घेराबंदी ने आखिरकार भारतीय रसोई और सड़क की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) ने दो साल के लंबे इंतजार के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में ₹3 प्रति लीटर से ज्यादा की बढ़ोतरी कर दी है।
दिल्ली में अब पेट्रोल की कीमत ₹94.77 से बढ़कर ₹97.77 और डीजल ₹87.67 से बढ़कर ₹90.67 प्रति लीटर पर पहुंच गया है। आइए जानतें हैं 2014 से अब तक तेल की कीमतों में आए इस ऐतिहासिक बदलाव का पूरा लेखा-जोखा क्या है?

2014 से 2026: एक दशक का सफर
साल 2014 में जब केंद्र की सत्ता बदली थी, तब दिल्ली में पेट्रोल करीब ₹72.26 प्रति लीटर मिल रहा था, लेकिन आज 12 साल बाद यह ₹97 के पार पहुंच चुका है। इस लंबे सफर के दौरान देश ने तेल की कीमतों से जुड़े कई बड़े बदलाव देखे हैं।
2014 से अब तक कितने बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम- साल दर साल

2014 से 2026: डी-रेगुलेशन से हॉर्मुज संकट तक, कब-कब बेकाबू हुआ तेल?
- मोदी सरकार का आगमन (अप्रैल 2014): जब केंद्र में सत्ता बदली, तब पेट्रोल ₹72.26 और डीजल ₹55.48 पर था। इसी साल डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त (De-regulate) करने का बड़ा फैसला लिया गया।
- डेली प्राइस रिवीजन की शुरुआत (जुलाई 2017): तेल की कीमतों के लिए नया नियम लागू हुआ, जिसके तहत हर 15 दिन के बजाय हर रोज सुबह 6 बजे दाम बदलना तय किया गया।
- डीजल पेट्रोल से महंगा (जून 2020): देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ जब डीजल की कीमतें पेट्रोल से भी ऊपर (₹79.88) निकल गईं। यह एक बहुत बड़ा उलटफेर था।
- पेट्रोल ₹100 के करीब (जुलाई 2021): अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और टैक्स में बढ़ोतरी के कारण पेट्रोल पहली बार ₹100 के मनोवैज्ञानिक आंकड़े के बेहद करीब पहुँच गया।
- यूक्रेन युद्ध का असर (अप्रैल 2022): रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से सप्लाई चैन बाधित हुई, जिससे पेट्रोल की कीमतें अब तक के सबसे उच्चतम स्तर ₹105.41 पर पहुँच गईं।
- हॉर्मुज संकट और हालिया उछाल (मई 2026): हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के चलते 2 साल से रुकी हुई कीमतों में एक बार फिर बड़ा उछाल आया और दाम ₹97.77 (पेट्रोल) तक पहुँच गए।
चुनाव खत्म होते ही कीमतों पर लगा 'करंट'
दिलचस्प बात यह है कि कीमतों में यह बढ़ोतरी असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव खत्म होने के ठीक 16 दिन बाद हुई है। इन राज्यों में चुनावी प्रक्रिया 29 अप्रैल को समाप्त हुई थी। हालांकि तकनीकी रूप से तेल कंपनियां हर दिन दाम बदलने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण कीमतें लंबे समय से रुकी हुई थीं।
तेल कंपनियों का भारी घाटा
सरकार के अनुसार, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण भारी नुकसान हो रहा था। कंपनियों को पेट्रोल पर करीब ₹20 और डीजल पर ₹100 प्रति लीटर तक का घाटा (under-recovery) उठाना पड़ रहा था। इस दबाव को कम करने के लिए वित्त मंत्रालय ने मार्च में एक्साइज ड्यूटी में ₹10 प्रति लीटर की कटौती भी की थी, ताकि जनता पर तुरंत बोझ न पड़े।
प्राइवेट कंपनियों ने पहले ही बढ़ा दिए थे दाम
सरकारी कंपनियों से पहले नायरा (Nayara) और शेल (Shell) जैसी प्राइवेट तेल कंपनियों ने अपनी कीमतों में इजाफा कर दिया था। मार्च में नायरा ने पेट्रोल ₹5 और डीजल ₹3 महंगा किया था, वहीं शेल ने अप्रैल में पेट्रोल ₹7.41 और डीजल ₹25 प्रति लीटर तक बढ़ा दिया था। बेंगलुरु में शेल का पेट्रोल ₹119.85 प्रति लीटर तक बिक रहा है।
क्यों अनिवार्य थी यह बढ़ोतरी?
वित्त मंत्रालय के आर्थिक समीक्षा विभाग के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण दामों में बढ़ोतरी 'अनिवार्य' (Inevitable) थी। मार्च में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत 113 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अप्रैल में बढ़कर 115 डॉलर तक पहुंच गई। मंत्रालय का मानना है कि जब सप्लाई में दिक्कत हो, तो मांग को नियंत्रित करना जरूरी होता है, वरना देश को ऊर्जा आपूर्ति के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
अर्थव्यवस्था और महंगाई पर असर
ईंधन की कीमतों में इस इजाफे का सीधा असर महंगाई और देश की जीडीपी (GDP) ग्रोथ पर पड़ने की आशंका है। Live Mint की रिपोर्ट के मुताबिक, बैंक ऑफ बड़ौदा के अनुमान के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल 1 डॉलर की बढ़ोतरी से देश के वार्षिक आयात बिल में ₹16,000 करोड़ का इजाफा होता है। वित्त वर्ष 2026 में भारत का तेल आयात बिल करीब 121.8 अरब डॉलर रहा है।
प्रधानमंत्री की जनता से अपील
देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 मई को नागरिकों से पेट्रोल और डीजल के सीमित और समझदारी से उपयोग की अपील की थी। उन्होंने कहा कि चूंकि वैश्विक स्तर पर ईंधन बहुत महंगा हो गया है, इसलिए यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम सार्वजनिक परिवहन (Public Transport) का इस्तेमाल करें या 'वर्क फ्रॉम होम' को बढ़ावा दें ताकि तेल पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा बचाई जा सके।













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