Bengal Election:हाई वोल्टेज चुनाव प्रचार के बावजूद इसबार चुप क्यों हैं बंगाल के वोटर ? जानिए
कोलकाता: बंगाली राजनीतिक तौर पर हमेशा से जागरूक रहे हैं। राजनीतिक बातों में उनकी खूब दिलचस्पी रहती है। लोकल ट्रेन हो या कोलकाता का ट्राम वह राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर बातें करते हैं। वैचारिक मतभेदों पर कभी-कभी कहा-सुनी भी हो जाती है। लेकिन, फिर भी वो चर्चा से परहेज नहीं करते। अपनी राजनीतिक समझ को लोगों से शेयर करने से बचने की कोशिश नहीं करते। लेकिन, इसबार के बंगाल चुनाव में साइलेंट वोटर सभी चुनावी पंडितों को परेशानी में डाल रहे हैं। पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति पर पकड़ रखने वाले कहते हैं कि ऐसा तो 2011 के विधानसभा चुनाव में भी नहीं हुआ था। बोल सिर्फ वही रहा है, जिसकी किसी ना किसी राजनीतिक पार्टी से सीधा जुड़ाव नजर आता है। बाकी, जिनका किसी भी दल से कोई लेना-देना नहीं है, वह फिलहाल चुप रहने में ही भलाई समझ रहे हैं।

इसबार चुप क्यों हैं बंगाल के वोटर ?
2011 के बंगाल विधानसभा चुनाव की ओर नजर कीजिए तो उस समय में राज्य में ऐसा माहौल था कि लेफ्ट फ्रंट का सत्ता में वापस लौटना आसान नहीं लग रहा था। लेकिन, फिर भी अपना गढ़ सुरक्षित रखने के लिए तत्कालीन सत्ताधारी दलों के दबंग एजेंट अपने-अपने इलाकों में घूमते नजर आ जाते थे। उनकी मौजूदगी के बावजूद कई लोग ऐसे थे, जो खुलकर टीएमसी के समर्थन में बोलते थे। वो ममता बनर्जी को लेकर अपनी भावना दबा नहीं पाते थे। लेकिन, आज आम मतदाताओं की चुप्पी पॉलिटिकल पंडितों को बहुत ही ज्यादा चौंका रही है। मसलन, सीएनएन न्यूज18 में छपी एक खबर के मुताबिक राज्य के एक वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक का कहना है, 'लोगों को पता नहीं है कि आखिरी परिणाम क्या आएगा। इसलिए वह चुप रहने में ही भलाई समझ रहे हैं, वह नहीं चाहते कि चुनाव नतीजों के बाद वह किसी परेशानी में पड़ जाएं, क्योंकि बंगाल में राजनीति प्रतिशोध की परंपरा उन्हें डरा रहा है। चुप्पी की एक वजह बदलाव के लिए जनता के अंदर छिपा गुस्सा भी हो सकता है।'

भवानीपुर में भी खुलकर बोलने से बच रहे हैं वोटर
जिस चुनाव में टीएमसी ने लेफ्ट फ्रंट को बंगाल की सत्ता से बेदखल किया था, उसमें पार्टी समर्थकों के बीच एक नारा खूब पसंद किया जा रहा था- 'चुपे-चाप, फूले छाप'(टीएमसी का चुनाव निशान फूल और पत्तियां)। कहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में सीपीएम से भाजपा की ओर मुड़े उसके पुराने कैडरों ने भी इसी तर्ज पर 'चुपे-चाप, कमल छाप' के नारे का खूब उपयोग किया था। लेकिन, लोकसभा चुनाव के अभी दो साल भी नहीं हुए हैं, लेकिन बंगाल के मतदाताओं ने लगता है कि जैसे अपना मुंह बंद रखने का फैसला कर रखा है। उन्होंने अपने चुनावी फैसले को अपने दिल में छिपाए रखना तय कर रखा है। ममता के पुराने चुनाव क्षेत्र दक्षिण कोलकाता के भवानीपुर के एक वोटर ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा है, 'हम यहां कुछ भी नहीं कहना चाहते। हम नहीं जानते कि चुनाव वाले दिन क्या होगा, लेकिन दोनों पार्टियों के समर्थक यहां घूम रहे हैं......हम किसी परेशानी में नहीं पड़ना चाहते।' भवानीपुर टीएमसी का गढ़ रहा है, क्योंकि यहां के हरीश मुखर्जी लेन में ही ममता का घर है। लेकिन, यहां के लोगों की चुनावी चुप्पी आने वाले चुनाव परिणाम को और भी पेंचीदा बना रही है। मसलन, एक बुजुर्ग वोटर ने भी इस सवाल को बहुत ही चतुराई से टालने की कोशिश की। उन्होंने कहा, 'ममता बनर्जी के बिना यहां टीएमसी को दिक्कत हो सकती है। लेकिन, कोई इसपर क्यों बात करेगा? वो आएंगे और लड़ेंगे। हम किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते।'

'टीएमसी-बीजेपी दोनों के लोग देख रहे हैं'
कमाल की बात ये है कि यह स्थिति सिर्फ राजधानी कोलकाता या बड़े शहरों की ही नहीं है, दूर-दराज के गांवों और जंगलमहल के जंगलों तक में इसबार वोटरों की चुप्पी उनके मन को पढ़ने में मुश्किलें पैदा कर रही हैं। मसलन, झारग्राम राज कॉलेज के बाहर चाय की दुकान पर लोग चाय की चुस्कियों का लुत्फ तो उठा रहे हैं, लेकिन जब बात चुनावी चुस्की की आती है तो जैसे उनकी जुबान पर अचानक से ताला लग जाता है। ऐसे ही एक ग्रामीण ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, 'हम चुनाव के दिन फैसला करेंगे (कि किसे वोट देंगे) लेकिन, अभी हम कुछ भी नहीं कहना चाहते हैं।....टीएमसी और बीजेपी दोनों के कार्यकर्ता देख रहे हैं। आपके जाने के बाद वो आएंगे और पूछना शुरू कर देंगे कि किस बारे में बात हो रही थी।'

किसका खेल बिगाड़ेंगे बंगाल के साइलेंट वोटर?
कई सारी रिपोर्ट आ चुकी है कि बंगाल की 49 फीसदी महिला वोटर इसबार ममता को तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने महिला वोटरों को लुभाने के लिए वादों का पिटारा भी खूब खोला है। लेकिन, बिहार के चुनाव नतीजों के बाद भाजपा को बंगाल में महिला वोटरों से भी पूरी उम्मीद है। लेकिन, सच्चाई ये है कि महिला वोटर भी अभी तक अपने पत्ते नहीं खोल रही हैं। साइलेंट वोटरों को लेकर भाजपा के एक नेता का कहना है कि 'वह टीएमसी के गुंडों से डरते हैं। इसलिए वो इसके बारे में बात नहीं कर रहे......।' लेकिन, ममता के समर्थक भाजपा की दलीलें मानने को तैयार नहीं होते। भवानीपुर मे पार्था मंडल नाम के एक शख्स का कहना है, 'बंगाल में किसी दूसरे के सत्ता में आने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। हां, कुछ गलतियां हुई हैं, लेकिन दीदी उससे निपट लेंगी।' असल में ये साइलेंट वोटर आखिर क्या गुल खिलाने वाले हैं, यह जानने के लिए 2 मई तक इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिख रहा है।(अंतिम तस्वीर-फाइल)
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