Kashi Masaan Holi: क्यों खेली जाती है 'मसान की होली'? बहुत कम लोग जानते हैं इसकी सच्चाई
Kashi Masaan Holi: धर्म की नगरी काशी में यूं तो कई अलग-अलग पर्व मनाए जाते हैं। लेकिन काशी में मनाए जाने वाली मसान की होली भी काफी प्रसिद्ध है। इस होली में लाखों की संख्या में लोग शामिल होते हैं।
होली में शामिल होने वाले लोग विश्व प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं की राख से होली खेलते हैं। मसान की होली में न केवल काशी के लोग बल्कि उत्तर प्रदेश और भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी लोग शामिल होते हैं।

काशी में आयोजित होने वाली यह होली फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी के अगले दिन मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस होली में खुद भगवान भोलेनाथ अपने गणों के साथ शामिल होते हैं और होली खेलते हैं।
वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर आयोजित होने वाली इस होली को खेलने के लिए आने वाले अधिकतर लोगों को इस होली के पौराणिक महत्व के बारे में जानकारी नहीं होती है। ऐसे में आज हम बात करते हैं कि क्यों खेली जाती है मसान की होली?
विवाह के बाद भोलेनाथ ने खोली थी होली
कहा जाता है कि भगवान भोलेनाथ ने पार्वती की तपस्या और समर्पण को देखकर उनके विवाह का निमंत्रण स्वीकार किया था। उन्होंने अपनी बारात में भूत-प्रेत, यक्ष, गंधर्व और प्रेतों को भी आमंत्रित किया था।
ऐसी मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की शादी संपन्न हो जाने के बाद भगवान भोलेनाथ मां पार्वती को लेकर काशी में भ्रमण करने के लिए आए थे। इस दौरान उनके गण भी काशी आए थे।
काशी आकर रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव ने माता पार्वती को गुलाल लगाकर होली खेली थी। भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती की होली देखकर उनके गण काफी प्रसन्न हुए थे।
मां पार्वती और भगवान भोलेनाथ के होली खेलने के बाद भगवान भोलेनाथ के भक्तों ने उनसे अनुरोध किया कि वह भी उनके साथ होली खेलना चाहते हैं। ऐेसे में भगवान भोलेनाथ रंग भरी एकादशी के अगले दिन मसान की राख को हवा में उड़ा दिया।
उसके बाद से ही लोग होली खेलने लगे और मशान घाट पर जलती हुई चिताओं की राख के साथ हर साल काफी संख्या में लोग रंगभरी एकादशी के अगले दिन होली खेलने के लिए जुटते हैं।












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