उत्तराखंड: क्यों मनाया जाता है सेलकू पर्व, जहां होता है डोलियों का नृत्य और सोमेश्वर देवता की पूजा

व्‍यापार, दीपावली और किसानों के उत्‍साह में मनाया जाता है सेलकू

देहरादून, 22 सितंबर। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां की संस्कृति और पौराणिक विरासत को स्थानीय लोगों ने आज भी संभाल रखा हैै। जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी आगे चल रही है। ऐसी ही एक संस्कृति और विरासत की झलक देखने को मिलती है, उत्तराखंड के सीमांत जनपद उत्तरकाशी के टकनौर क्षेत्र में। जहां इन दिनों सेलकू पर्व की धूम रहती है। करीब 15 दिनों तक टकनौर के अलग-अलग गांवों में अलग- अलग तरीके से मनाया जाता है। उद्देश्य भी अलग होता है लेकिन एक समान होती है तो वो ही पूर्वजों की परम्परा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी। सेलकू पर्व में स्थानीय लोगों की आस्था जुड़ी रहती है। सेलकू शब्द का अर्थ है सोएगा कौन?

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    उत्तराखंड: क्यों मनाया जाता है सेलकू पर्व, जहां होता है डोलियों का नृत्य और सोमेश्वर देवता की पूजा
    व्यापार और दीपावली पर्व का प्रतीक है सेलकू

    व्यापार और दीपावली पर्व का प्रतीक है सेलकू

    उत्तरकाशी जिले के उपला टकनौर क्षेत्र में सेलकू पर्व को मनाने के दो कारण प्रमुख है। पहला है मां गंगा के शीतकालीन पड़ाव मुखवा में सेलकू पर्व को मनाने का उद्देश्य है भारत तिब्बत व्यापार का प्रतीक और स्थानीय लोगों का दीपावली का पर्व भी सेलकू के रूप में मनाया जाता है। सेलकू के बाद स्थानीय लोग ग्रामीण इलाकों को छोड़कर अपने दूसरे ठिकानों की तरफ चले जाते हैं। क्योंकि शीतकाल में ये पूरा इलाका बर्फ से ढक जाते हैं। इसलिए स्थानीय लोग सेलकू को धूमधाम से मनाते हैं।

     ऐसे मनाते हैं सेलकू

    ऐसे मनाते हैं सेलकू

    गंगोत्री मंदिर समिति के सचिव पंडित दीपक सेमवाल ने बताया कि सेलकू का पर्व हिंदू पंचाग के अनुसार भाद्रपद के समाप्त और आश्विन के शुरूआत शेक और संक्रांति को मनाया जाता है। इसकी तैयारी के लिए 15 दिन पहले ही स्थानीय लोग उच्च हिमालयी क्षेत्र से पूजा के लिए ब्रह्मकमल समेत कई तरह के फूल लाते हैं और चीड़ व देवदार की लकड़ियों के छिल्लों से भैलो तैयार करते हैं। त्योहार में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें मक्की के आटे से द्यूड़ा, स्वाले, पकौड़े आदि पकवान बनाते हैं। और रात भर चीड़ व देवदार की लकड़ियों के छिल्लों से बना भैलो खेला जाता है। इस दौरान सोमेश्वर देवता की डोली का नृत्य और ग्रामीणों का रासो व तांदी नृत्य भी आकर्षक का केन्द्र होता है। सेलकू पर्व पूरी रात और अगले दिन सोमेश्वर देवता के पशुवा (एक व्यक्ति जिस पर देवता अवतरित होते हैं) आते हैं, जो लोगों की आस्था के अनुरूप उनकी समस्याओं और उनकी मन्नतें पूरी करते हैं। इस दौरान पशुवा नुकीली और धारदार डांगरा (एक तरह की तलवार)पर नंगे पांव चलते हैं। ​जो कि सबसे आकर्षण का केन्द्र रहता है।

     किसानों के लिए उत्साह का पर्व है सेलकू

    किसानों के लिए उत्साह का पर्व है सेलकू

    दूसरा पक्ष है उपला टकनौर के दूसरे गांवों जैसे गोरशाली, रैथल, स्याबा, सारी, सौरा आदि गांवों में सेलकू के बाद धान की कटाई शुरू हो जाती है। गोरशाली गांव के प्रधान नवीन राणा ने बताया कि पूरे टकनौक क्षेत्र में सेलकू पर्व का समापन गोरशाली में पूर्णिमा के दिन से होता है। इस क्षेत्र में सेलकू पर्व मनाने के पीछे पूर्वजों की परंपरा और किसानों का उत्साह है। सेलकू पर्व पर ग्रामीण अपने देवी देवताओं से अपने खेती और किसानी बेहतर होने की भी मन्नतें मांगते हैं। इसके बाद ग्रामीण अपने ​खेती और किसानी का काम में व्यस्त हो जाते हैं। इससे पहले वे सेलकू में डोलियों का नृत्य और उत्तरकाशी का नृत्य रासो और तांदी नृत्य कर उत्साह पूर्वक सभी गांवों के लोगों के साथ खुशियां बांटते हैं। जिसमें गांवों की बेटियां और बाहर रहने वाले लोग भी सम्मिलित होते हैं।

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