उत्तराखंड में नगर निकायों के चुनाव तय समय पर होने पर सस्पेंस, लोकसभा चुनाव तक टालने की संभावना, जानिए वजह
उत्तराखंड में नगर निकायों के चुनाव तय समय पर होंगे या नहीं, इस पर अब भी सस्पेंश बरकरार है। निकायों में ओबीसी आरक्षण के दृष्टिगत एकल समर्पित आयोग से रिपोर्ट भी शासन को उपलब्ध नहीं हुई है। इसके अलावा अभी तक नगर निकायों की मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण नहीं हो पाया है और इस कार्य में कम से कम से तीन माह का समय लगता है। ऐसे में चुनाव आगे खिसक सकते हैं। ऐसा हुआ तो निकाय चुनाव लोकसभा चुनाव के बाद हो सकते हैं।

उत्तराखंड में नगर निकायों (नगर निगम, नगर पालिका परिषद व नगर पंचायत) की संख्या 110 है। इनमें से तीन में चुनाव नहीं होते, जबकि दो का कार्यकाल अगले वर्ष पूर्ण होना है। शेष निकायों का कार्यकाल नवंबर में खत्म होने जा रहा है। इनमें चुनाव होने हैं। निकाय अधिनियम में निकायों का कार्यकाल खत्म होने से 15 दिन पहले अथवा बाद में चुनाव कराने का प्राविधान है। चुनाव न होने की स्थिति में उनमें छह माह के लिए प्रशासक बैठाए जा सकते हैं। हालांकि राज्य सरकार समय पर ही चुनाव कराने की बात कर रही है। लेकिन अभी जिस तरह की कसरत हो रही है। ऐसे में समय रहते रिपोर्ट और सर्वे होना आसान नहीं है। नवंबर तक ये सारे काम पूरे होना आसान नहीं है।
मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के लिए घर-घर सर्वेक्षण के बाद अनंतिम मतदाता सूची तैयार की जाती है। इसके पश्चात छूटे व्यक्तियों के नाम शामिल करने के साथ ही नामों आदि में सुधार को आपत्तियां व दावे प्रस्तुत करने को समय दिया जाता है। इनके निस्तारण के बाद ही अंतिम मतदाता सूची तैयार होती है। निकायों में ओबीसी आरक्षण का निर्धारण भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। निकायों में ओबीसी की वास्तविक स्थिति के गठित एकल सदस्यीय वर्मा आयोग अपने कार्य में जुटा है। कुछ समय पहले ही सरकार ने आयोग का कार्यकाल बढ़ाया था। बता दें कि उत्तराखंड में अक्टूबर-नवंबर में प्रस्तावित नगर निकायों के चुनाव आगे खिसकाने की चर्चा पर शहरी विकास मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल इनकार कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि निकाय चुनाव की तैयारियां चल रही हैं। लेकिन जो वर्तमान में हालात हैं, उसमें लगता नहीं कि समय पर चुनाव हो पाएंगे।












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