नवरात्र स्पेशल: उत्तराखंड के सिद्धपीठों में से एक है चंद्रबदनी का मंदिर, यहां गिरा था माता सती का शरीर
उत्तराखंड के सिद्धपीठों में से एक है चंद्रबदनी का मंदिर
देहरादून, 29 सितंबर। उत्तराखंड के सिद्धपीठों में से एक है चंद्रबदनी का मंदिर। जहां साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। नवरात्र में सबसे ज्यादा भक्त पहुंचते हैं। चंद्रबदनी मंदिर में सती के धड़ की पूजा की जाती है, हालांकि श्रद्वालुओं को धड़ के दर्शन नहीं कराए जाते हैं। यहां माता की मूर्त नहीं यंत्र रूप में पूजा होती है। चंद्रबनी मंदिर टिहरी जिले के देवप्रयाग में हिंडोलाखाल मोटर मार्ग पर लगभग 22 किमी दूरी पर है।

पौराणिक कथा के अनुसार, चंद्रकूट पर्वत पर सती का बदन ,शरीर, गिरा
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता सती के पिता राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने भगवान शंकर को छोड़ सभी को आमंत्रित किया। सती ने भगवान शंकर से वहां साथ जाने की इच्छा जाहिर की। भगवान शंकर ने उन्हें वहां न जाने की सलाह दी, लेकिन सती अकेले ही वहां चली गई। सती की मां के अलावा किसी ने भी वहां सती का स्वागत नहीं किया। यज्ञ मंडप में भगवान शंकर को छोड़कर सभी देवताओं का स्थान था। सती ने भगवान शंकर का स्थान न होने का कारण पूछा तो राजा दक्ष ने उनके बारे में अपमानजनक शब्द सुना डाले। जिस पर गुस्से में सती यज्ञ कुंड में कूद गईं। सती के भस्म होने का समाचार पाकर भगवान शिव वहां आए और दक्ष का सिर काट दिया। भगवान शिव विलाप करते हुए सती का जला शरीर कंधे पर रख कर तांडव करने लगे। सभी देवता शिव को शांत करने के लिए भगवान विष्णु से आग्रह करने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपना अदृश्य सुदर्शन चक्र शिव के पीछे लगा दिया। जहां जहां सती के अंग गिरे वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए। मान्यता है कि चंद्रकूट पर्वत पर सती का बदन ,शरीर, गिरा। इसलिए यहां का नाम चंद्रबदनी पड़ा। कहते हैं कि आज भी चंद्रकूट पर्वत पर रात में गंधर्व, अप्सराएं मां के दरबार में नृत्य और गायन करती हैं।












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