Nag Panchami 2023: उत्तराखंड में नागधाम, नागतीर्थ में मिलती है कालसर्प दोष से मुक्ति, दूसरी नागों की भूमि

उत्तराखंड देवभूमि होने के साथ ही यहां कई नाग धाम भी है। जिनमें कई प्रसिद्ध नाग देवता के मंदिर हैं। सेम मुखेम प्रसिद्ध नागतीर्थ, शेषनाग देवता मंदिर उत्तरकाशी के कुपड़ा गांव में स्थित, पिथौरागढ़ को नागों की भूमि कहा जाता है।

21 अगस्त को नाग पंचमी है। इस दिन भक्त नाग मंदिरों में पूजा अर्चना करते हैं। हिंदूओं में नाग देवता की गहरी आस्था होती है। खासकर जिनके कुंडली में नाग सर्प दोष होता है, वो लोग नाग पंचमी को पूजा करना नहीं भूलते। इस दिन नाग मंदिर में दूध और खीर चढ़ाने की परंपरा है। उत्तराखंड देवभूमि होने के साथ ही यहां कई नाग धाम भी है। जिनमें कई प्रसिद्ध नाग देवता के मंदिर हैं।

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उत्तराखंड में सेम मुखेम प्रसिद्ध नागतीर्थ है, जो कि उत्तराखंड में पांचवे धाम के रूप में विख्यात है। जो कि उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिला में है। श्रद्धालुओं में यह सेम नागराजा के नाम से प्रसिद्ध है। मान्यता है कि द्वारिका डुबने के बाद श्री कृष्ण यहां नागराज के रूप मे प्रकट हुए थे। मंदिर में नागराज फन फैलाये हैं और भगवान कृष्ण नागराज के फन के ऊपर वंशी की धुन में लीन हैं।

मन्दिर के गर्भगृह में नागराजा की स्वयं भू शिला है। ये शिला द्वापर युग की बतायी जाती है। मन्दिर के दांयी तरफ गंगू रमोला के परिवार की मूर्तियां स्थापित की गयी हैं। सेम नागराजा की पूजा करने से पहले गंगू रमोला की पूजा की जाती है। यह माना जाता है कि इस स्थान पर भगवान श्री कृष्ण कालिया नाग का उधार करने आये थे। इस स्थान पर उस समय गंगु रमोला का अधिपत्य था, श्री कृष्ण ने उनसे यंहा पर कुछ भू भाग मांगना चाहा लेकिन गंगु रमोला ने यह कह के मना कर दिया कि वह किसी चलते फिरते राही को जमीन नही देते।

फिर श्री कृष्ण ने अपनी माया दिखाई, जिसके बाद गंगु रमोला ने शर्त के साथ कुछ भू भाग श्री कृष्ण को दे दिया। जिस शर्त के अनुसार एक हिमा नाम की राक्षस का वध किया। यह भी मान्यता है कि द्वापर युग मे भगवान श्रीकृष्ण की बालरूप में एक दिन उनकी गेंद यमुना नदी में गिरी। इस नदी में कालिया नाग निवास करता था।।

जब भगवान श्रीकृष्ण गेंद लेने के लिए नदी में उतरे तो कालिया नाग ने उन पर आक्रमण किया, श्रीकृष्ण ने उसका सामना किया और कालिया नाग हार गया। तब भगवान ने कालिया नाग को वहां से भागकर सेम मुखेम में जाने को कहा, कालिया नाग ने उनसे सेम मुखेम में दर्शन देने की विनती की । अंत समय मे भगवान कृष्ण ने द्वारिका छोड़कर उत्तराखण्ड के रामोलागढ़ी में आकर कालिया नाग को अपने दर्शन दिए ओर वहीं पत्थर में स्थापित हो गए । तभी से यह मंदिर सेम मुखेम नागराज मंदिर के नाम से जाना जाता है।

शेषनाग देवता मंदिर उत्तरकाशी बड़कोट तहसील के कुपड़ा गांव में स्थित है। मंदिर यमुना घाटी के स्यानाचट्टी से 6 किमी वाहन द्वारा और लगभग 3 किलोमीटर पैदल चलने के बाद पहुंचते हैं। यह मंदिर सुंदर वास्तुकला का उदाहरण पेश करता है। यहां नागपंचमी को भक्ति और श्रद्धा का अगाध सैलाब उमड़ता है। पंचमी के दिन नागपंचमी पर्व के उपलक्ष में भव्य मेले का आयोजन होता है। देवडोलियों के साथ लोकनृत्य तांदी की धूम रहती है। गावं के साथ साथ बाहर के लोग भी यहाँ मेले में हर्षोउल्लास से भाग लेते हैं। मेले में दूध दही की होली खेली जाती है। गांव के लोग अपनी गाय और भैसों का दूध ,दही ,मख्खन और छास नाग देवता को चढ़ाते हैं। यहाँ मेले के दिन पारम्परिक लोक नृत्यों और लोकगीतों का आयोजन भी किया जाता है। इस अवसर पर भक्त देवता के साथ साथ जाखेश्वेर महादेव और शमेंश्वेर देवता का आशीर्वाद भी लेते हैं।

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ को नागों की भूमि कहा जाता है। पिथौरागढ़ से 87 किलोमीटर दूर बेरीनाग तहसील है, यहां बेणीनाग मंदिर है, जहां नाग देवता की पूजा की जाती है और इसी के नाम पर इस जगह का नाम बेरीनाग पड़ा। यहां पर नागों के अलग-अलग मंदिर हैं. इन प्रमुख मंदिरों में बेरीनाग, धौली नाग, फेणी नाग, पिंगली नाग, काली नाग और सुंदरी नाग मंदिर है। यहां तक कि कुछ पहाड़ों का नाम भी नागों के नाम पर रखा गया है। ये नाग मंदिर आज इस क्षेत्र के लोगों के ईष्ट देवताओं के मंदिर हैं। इन क्षेत्रों में सिर्फ नाग के मंदिर हैं। इसके अलावा मान्यता तो यह भी है कि काकेशियन आर्यों के इस क्षेत्र में आने से पहले यहां पर नाग वंश का शासनकाल था। इन सब कारणों से बेरीनाग आज नागों के क्षेत्र के लिए जाना जाता है।

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