'सिलेंडर की कीमतों से लेकर चारधाम यात्रा तक', जानिए उत्तराखंड में कैसे धरे रहे गए कांग्रेस के बड़े-बड़े वादे
कांग्रेस की रणनीति और वादे हुए फेल
देहरादून, 12 मार्च। उत्तराखंड में एक बार फिर कांग्रेस मुख्य विपक्ष की भूमिका निभाएगी। कांग्रेस को इस बार 19 सीटों पर जीत हासिल हुई है। जो कि 2017 के चुनाव से 8 सीट ज्यादा हैं। कांग्रेस को 2017 में 11 सीटों पर ही जीत मिली थी। ऐसे में कांग्रेस की रणनीति इस बार भी फेल हो गई है। जबकि कांग्रेस के घोषणा पत्र और वादों में कई घोषणां जनता से जुड़ी हुई और प्रदेश के हित के लिए की गई थी। जिसमें सिलेंडर की कीमत 500 रुपए से कम करने और चारधाम-चारकाम जैसे नारे की बातों को भी पूरा करना था। ऐसे में कांग्रेस की पूरी रणनीति को जनता ने नकार दिया। कांग्रेस के चुनाव अभियान की कमान संभाल रहे पूर्व सीएम हरीश रावत और प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने हार की जिम्मेदारी लेने की बात की है।

रोजगार, महंगाई, राजधानी, गैरसेंण, पुलिस ग्रेड पे और भू कानून थे चुनावी मुद्दे
2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तराखंड में हुए चुनाव से कांग्रेस को खासा उम्मीदें थी। उत्तराखंड में कांग्रेस को सरकार आने की उम्मीद भी नजर आ रही थी। लेकिन उत्तराखंड की जनता ने एक बार फिर भाजपा सरकार पर भरोसा जताया है। कांग्रेस ने लंबे समय से रोजगार, महंगाई, राजधानी, गैरसेंण, पुलिस ग्रेड पे और भू कानून जैसे बड़े मुद्दों को उठाकर जनता का विश्वास जीतने की कोशिश की लेकिन जनता ने इन सभी मुद्दों को पीछे छोडते हुए भाजपा पर ही विश्वास जताया। कांग्रेस ने 4 लाख युवाओं को रोजगार देने का भी वादा किया लेकिन जनता को ये सभी लुभावने वादे पंसद नहीं आए। इसके पीछे की वजह कांग्रेस भी समझ नहीं पाई है। हालांकि कांग्रेस अब मान रही है कि भाजपा ने स्थानीय मुद्दों को छोड़कर मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा। जिसका फायदा भाजपा को हुआ है।
नेतृत्व पर उठ रहे सवाल, हो सकता है बड़ा बदलाव
कांग्रेस चुनाव अभियान की कमान संभाल रहे हरीश रावत ने पहले ही दिन परिणाम आते ही हार की पूरी जिम्मेदारी लेने की बात की। लेकिन कांग्रेस के अंदरखाने अब हरीश रावत के सीएम फेस को लेकर खुद को प्रोजेक्ट करने और टिकट बंटवारे को लेकर हुए विवाद को भी हार का कारण बताया जाने लगा है। हरीश रावत ने चुनाव के ठीक बीच में हाईकमान से मिलकर खुद को फ्री हैंडल करने की मांग की थी। जिसको लेकर प्रदेश प्रभारी और नेता प्रतिपक्ष से उनकी दूरी भी सामने आई थी। इसके बाद हाईकमान ने हरीश रावत को फ्री हैंड कर दिया। टिकट बंटवारे में भी हरीश रावत को लेकर आरोप लगने लगे। जिस कारण खुद हरीश रावत समेत कई प्रत्याशियों के टिकट बदल दिए गए। हरीश रावत पहले रामनगर फिर लालकुंआ से मैदान में उतर गए। इस तरह कांग्रेस की लिस्ट भी कई बार विवादों में फंसती हुई नजर आई। अब कांग्रेस के अंदर युवा चेहरों को आगे लाने की मांग उठने लगी है। जिसका असर नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश कांग्रेस संगठन में दिखना तय है। हालांकि नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह ने अपनी सीट बचाकर एक बार फिर रिकॉर्ड बनाया है। ऐसे में प्रीतम की जगह नेता प्रतिपक्ष कोई दूसरा विधायक बने, ऐसा करना आसान नहीं होगा। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष से लेकर संगठन में बड़ा फेरबदल होना तय माना जा रहा है।












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