पूर्व सीएम हरीश रावत ने खोला राज, क्यों 21 साल में नहीं रहीं स्थिर सरकारें, छिड़ सकती है बड़ी जंग
हरीश रावत ने की उत्तराखंड में राजनैतिक स्थिरता के लिए 21 सदस्यीय विधानपरिषद की मांग
देहरादून, 23 नवंबर। उत्तराखंड में चुनावी साल में हर दल अपने-अपने विजन सामने ला रहे हैं। कुछ जनहित के तो कुछ प्रदेश हित के। ऐसे में उत्तराखंडियत को लेकर भी लगातार नई बहस छिड़ी हुई है। अब कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व सीएम हरीश रावत ने प्रदेश में राजनैतिक स्थिरता को लेकर बड़ा मुद्दा छेड़ दिया है। हरीश रावत ने उत्तराखंड में राजनैतिक स्थिरता के लिए 21 सदस्यीय विधानपरिषद की मांग उठाई है। जो कि चुनावी साल में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।

उत्तराखंड में राजनैतिक अस्थिरता बड़ा मुद्दा
उत्तराखंड में 21 साल में 10 मुख्यमंत्री सत्ता संभाल चुके हैं। आए दिन उत्तराखंड में राजनैतिक अस्थिरता खड़ी हो जाती है। जिससे प्रदेश का विकास भी प्रभावित होता रहा है। ऐसे में पूर्व सीएम हरीश रावत ने एक बड़ा मुद्दा छेड़ दिया है। हरीश रावत का कहना है कि उत्तराखंड में राजनैतिक स्थिरता होना जरुरी है। जिससे राजनैतिक दलों में आंतरिक संतुलन और स्थिरता पैदा हो। रावत ने कहा कि जब स्थिरता नहीं होती है तो विकास नहीं होता है, केवल बातें होती हैं। उन्होंने कहा कि पिछले 21 साल के इतिहास में उत्तराखंड के अंदर राजनैतिक अस्थिरता पहले दिन से ही हावी है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में प्रत्येक राजनैतिक दल में इतने लोग हैं कि सबको समन्वित कर चलना उनके लिये कठिन है और कांग्रेस व भाजपा जैसे पार्टियों के लिए तो यह कठिनतर होता जा रहा है। केंद्र सरकार का यह निर्णय कि राज्य में गठित होने वाले मंत्रिमंडल की संख्या कितनी हो, उससे छोटे राज्यों के सामने और ज्यादा दिक्कत पैदा होनी है। अब उत्तराखंड जैसे राज्यों में मंत्री 12 बनाए जा सकते है, मगर विभाग तो सारे हैं जो बड़े राज्यों में है, सचिव भी उतने ही हैं जितने सब राज्यों में हैं। मगर एक-एक मंत्री, कई-2 विभागों को संभालते हैं, किसी में उनकी रूचि कम हो जाती है तो किसी में ज्यादा हो जाती है और छोटे विभागों पर मंत्रियों का फोकस नहीं रहता है और उससे जो छोटे विभाग हैं उनकी ग्रोथ पर विपरीत असर पड़ रहा है, जबकि प्रशासन का छोटे से छोटा विभाग भी जनकल्याण के लिए बहुत उपयोगी होता है।

2002 के घोषणापत्र में किया गया था जिक्र
हरीश रावत ने इस समस्या के समाधान के लिए राय देते हुए कहा कि उत्तराखंड जैसे राज्य के अंदर हमें कोई न कोई रास्ता ऐसा निकलना पड़ेगा, जिस रास्ते से राजनैतिक दल चाहे वो सत्तारूढ़ हो या विपक्ष हो उसमें राजनैतिक स्थिरता रहे और एक परिपक्व राजनैतिक धारा राज्य के अंदर विकसित हो सके और एक निश्चित सोच के आधार पर वो राजनैतिक दल आगे प्रशासनिक व्यवस्था और विकास का संचालन करें। हरीश रावत ने आगे कहा कि कांग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र में 2002 में विधान परिषद का गठन का वादा किया था, तो कालांतर में कतिपय कारणों के कारण गठित नहीं हो पाई और उसके बाद के जो अनुभव रहे हैं, वो अनुभव कई दृष्टिकोणों से राज्य के हित में नहीं रहे हैं। इसलिये मैं समझता हूं कि फिर से इस प्रश्न पर विचार करने की आवश्यकता पड़ रही है कि विधान परिषद होनी चाहिए या नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 21 सदस्यीय विधान परिषद उपयोगिता के दृष्टिकोण से उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए बहुत लाभदायी हो सकती है, राजनैतिक स्थिरता पैदा करने वाला कारक बन सकती है। इससे राज्य में नेतृत्व विकास भी होगा।

हरदा ने दिया नया चुनावी मुद्दा
हरीश रावत के इस सियासी दांव से आने वाले दिनों में राजनैतिक दलों के अंदर नई बहस शुरू होना तय है। खासकर पुराने नेताओं के लिए जो भाजपा, कांग्रेस में अब तक टिकट की दौड़ से बाहर रहें हो या फिर अब तक विधानसभा में नहीं पहुंच पाएं हो। लेकिन हरीश रावत की इस सोच को लेकर एक बड़ा सवाल ये भी खड़ा होता है। कि उत्तराखंड की तरह 21 साल पहले झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य भी बनें। इन राज्यों में भी समय-समय के अंदर राजनैतिक अस्थिरता पैदा होती रही तो क्या इन राज्यों में भी विधानपरिषद की मांग नहीं उठ सकती है। ऐसे में यह मुद्दा बड़ी बहस का मुद्दा बन सकता है। उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत पूर्व सीएम हरीश रावत के इस विचार से सहमत नहीं हैं। जय सिंह रावत ने कहा कि सरकार अपने विधायकों के खर्चे नहीं उठा पा रही है। विधानसभा की 60 मीटिंग होनी चाहिए, जबकि यहां 10 से 15 ही हो पाती है। जनता विधायकों से नाराज हैं। जय सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड को इससे बेहतर केन्द्र शासित राज्य बना दिया जाता तो बेहतर होता। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सिर्फ नेताओं की तरक्की हो रही है। प्रदेश कर्ज में डूब रहा है।
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