Bhojshala Court Verdict: भोजशाला में अब मुसलमानों को नमाज पर रोक, मुस्लिम पक्ष बोला- सुप्रीम कोर्ट जाएंगे

Dhar Bhojshala Court Verdict: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने धार की ऐतिहासिक भोजशाला-कमाल मौला विवादित परिसर को मां वाग्देवी (सरस्वती) का प्राचीन मंदिर घोषित कर दिया। शुक्रवार (15 मई) को दिए गए इस ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने हिंदू पक्ष को नियमित पूजा-अर्चना का अधिकार दे दिया, जबकि मुस्लिम पक्ष को परिसर में नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं रहेगी। कोर्ट ने 2003 के ASI आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दोनों समुदायों को तय समय पर इबादत की अनुमति थी।

यह फैसला न केवल भोजशाला विवाद का महत्वपूर्ण मोड़ है, बल्कि अयोध्या, ज्ञानवापी और मथुरा जैसे अन्य मामलों की श्रृंखला में पुरातात्विक साक्ष्यों, ASI सर्वे और Places of Worship Act 1991 की व्याख्या पर नई बहस छेड़ता है। मुस्लिम पक्ष ने फैसले को स्वीकार नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की है।

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सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे

वकील विष्णु शंकर जैन (हिंदू पक्ष) ने कहा, 'यह ऐतिहासिक फैसला है। कोर्ट ने भोजशाला को राजा भोज का मंदिर माना। ASI का 2003 का ऑर्डर रद्द हो गया। अब यहां सिर्फ हिंदू पूजा होगी। कोर्ट ने सरकार को साइट मैनेजमेंट और मूर्ति वापसी पर विचार करने को कहा है।' धार शहर काजी वकार सादिक ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 'हम फैसले का रिव्यू करेंगे और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। हम इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं।'

भोजशाला का ऐतिहासिक बैकग्राउंड कैसा है?

परमार वंश का स्वर्ण युग: 11वीं शताब्दी में राजा भोज (1010-1055 ई.) ने धार को राजधानी बनाया। वे विद्वान शासक थे जिन्होंने समरांगण सूत्रधार जैसे ग्रंथ लिखे। भोजशाला को सरस्वती सदन या वाग्देवी मंदिर के रूप में स्थापित किया गया, जो प्राचीन भारत का प्रमुख विद्या और संस्कृत अध्ययन केंद्र था।

13वीं-14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों (अलाउद्दीन खिलजी, दिलावर खान आदि) के दौरान कई हिंदू संरचनाएं क्षतिग्रस्त हुईं। 15वीं शताब्दी में मालवा सल्तनत के दौरान सूफी संत कमाल मौला की दरगाह बनी। मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है।

1875: खुदाई में वाग्देवी प्रतिमा मिली, जो आज ब्रिटिश म्यूजियम में है। हिंदू पक्ष इसे वापस लाने की मांग करता रहा।

कानूनी संघर्ष: 1995 से 2026 तक

  • 1995: छोटे विवाद के बाद प्रशासन ने मंगलवार को हिंदू पूजा और शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी।
  • 1997: दिग्विजय सिंह सरकार के समय प्रतिबंध और फिर शर्तों के साथ अनुमति।
  • 2003: ASI ने संरक्षित स्मारक घोषित किया। दोनों समुदायों को अलग-अलग दिनों पर इबादत की अनुमति।
  • 2013 और 2016: वसंत पंचमी और शुक्रवार के संयोग पर तनाव, हिंसा और पुलिस कार्रवाई।
  • 2022: रंजना अग्निहोत्री और हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका - पूर्ण पूजा अधिकार, नमाज पर रोक, ट्रस्ट गठन और मूर्ति वापसी।
  • 2024: हाईकोर्ट ने ASI को 98 दिनों का वैज्ञानिक सर्वे (GPR, कार्बन डेटिंग, खोदाई आदि) का आदेश। सुप्रीम कोर्ट ने भी समर्थन किया।
  • जनवरी 2026 (वसंत पंचमी): सुप्रीम कोर्ट ने दिनभर पूजा की अनुमति।
  • अप्रैल-मई 2026: रोजाना सुनवाई। 12 मई को फैसला सुरक्षित रखा गया।
  • 15 मई 2026: हिंदू पक्ष के पक्ष में फैसला।

यह फैसला अयोध्या 2019 के बाद ASI रिपोर्ट पर आधारित दूसरा बड़ा फैसला है। ज्ञानवापी, मथुरा शाही ईदगाह जैसे मामलों में हिंदू पक्ष को बल मिलेगा। Places of Worship Act 1991 की बहस फिर तेज हो गई। आलोचक कहते हैं कि 15 अगस्त 1947 की स्थिति फ्रीज करने वाला कानून पुरातात्विक साक्ष्यों को नजरअंदाज नहीं कर सकता। समर्थक कहते हैं कि यह सांप्रदायिक सद्भाव की रक्षा करता है।

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