DIWALI 2022: उत्तराखंड के इस जिले में एक माह मनाई जाती है दिवाली, पहाड़ों में खास है मंगसीर बग्वाल

पहाड़ों में एक माह बाद दिवाली मंगसीर बग्वाल मनाए जाती है

DIWALI 2022 आज पूरा देश दीपोत्सव यानि दिवाली मना रहा है। लेकिन पहाड़ों में कई जगह इसके एक माह बाद दिवाली मनाई जाएगी। जिसे मंगसीर बग्वाल कहा जाता है। सीमांत जिले में मंगसीर बग्वाल की तैयारियां खास अंदाज में की जाती है। जिसके लिए दिवाली से ही लोग तैयारियों में जुट जाते हैं। पहाड़ों में मनाई जाने वाली मंगसीर बग्वाल पर पटाखे नहीं हाथ से बनाए गए भैलो से खेला जाता है। जो कि रोशनी का प्रतीक है। इस दिन पहाड़ी व्यंजन भी परोसे जाते हैं। इसके पीछे खास परंपरा है।

DIWALI 2022 celebrated for a month in this district Uttarakhand UTTARAKASHI Mangseer Bagwal mountains

कार्तिक अमावस्या से ठीक एक माह बाद दिवाली यानी मंगसीर की बग्वाल

सीमांत जनपद उत्तरकाशी में कार्तिक अमावस्या से ठीक एक माह बाद दिवाली यानी मंगसीर की बग्वाल मनाई जाएगी। लोगों का मानना है कि मंगसीर की बग्वाल गढ़वाली सेना की तिब्बत विजय का उत्सव है। इस बार यह उत्सव 24 व 25 नवंबर को मनाया जाएगा। वर्ष 1627-28 के बीच गढ़वाल नरेश महिपत शाह के शासनकाल के दौरान जब तिब्बती लुटेरे गढ़वाल की सीमाओं पर लूटपाट करते थे। इस लूटपाट को रोकने के लिए राजा ने माधो सिंह भंडारी व लोदी रिखोला के नेतृत्व में चमोली के पैनखंडा और उत्तरकाशी के टकनौर क्षेत्र से सेना भेजी।
लुटेरों का दमन करते हुए सेना तिब्बत तक पहुंच गई थी। तब युद्ध के कारण कार्तिक मास की दिवाली के लिए माधो सिंह भंडारी घर नहीं पहुंच पाए थे। उस दौरान उन्होंने गांव में संदेश पहुंचाया कि जब वह जीतकर लौटेंगे तब ही दिवाली मनायी जाएगी। एक माह के बाद माधो सिंह अपने गांव मलेथा पहुंचे। तब उत्सव पूर्वक दिवाली मनायी गई। तब से इसी दिन बग्वाल मनाई जाती है। बग्वाल के दिन स्थानीय लोग एक जगह इकट्ठा होकर रात भर भैलो नृत्य के साथ रासों तांदी नृत्य करते हैं। खुले मैदान में देवदार और चीड़ की लकड़ी से बनाए भैलो को जलाकर मंगशीर की बग्वाल खेली जाती है। रात में स्थानीय वाद्य यंत्र के साथ स्थानीय वेश भूषा में लोग बग्वाल उत्सव मनाते हैं। समय के साथ स्थानीय लोग इस परंपरा को जिंदा रखने के लिए प्रयास में जुटे हैं। जिसके लिए कई सामाजिक संगठन भी अब सामने आकर अपनी परंपरा को बचाने में जुटे हैं।

भैलो
तिल, भंगजीरे, हिसर और चीड़ की सूखी लकड़ी के छोटे-छोटे गठ्ठर बनाकर इन्हें विशेष रस्सी से बांधकर भैलो तैयार किया जाता है। बग्वाल के दिन भैलो का तिलक किया जाता है। फिर ग्रामीण एक स्थान पर एकत्रित होकर भैलो खेलते हैं। भैलो पर आग लगाकर इसे चारों ओर घुमाया जाता है। कई ग्रामीण भैलो से करतब भी दिखाते हैं। पहाड़ों में उत्साह और उत्सव दोनों समय भैलो खेला जाता है। जो रोशनी और उत्साह दोनों का प्रतीक है।

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